बढ़ती कृषि लागत और रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों के बीच उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से एक बेहद सकारात्मक बदलाव की कहानी सामने आई है। आज के इस दौर में जब खेती-किसानी काफी खर्चीली और जटिल होती जा रही है, तब ग्रामीण महिलाएं खुद आगे बढ़कर इस चुनौती का मुकाबला कर रही हैं। जिले के तेजवापुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मिर्जापुर की निवासी लाल परी इस समय पूरे क्षेत्र में महिला आत्मनिर्भरता और रसायनमुक्त खेती के अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। उनके प्रयासों से न सिर्फ खेतों की सेहत सुधर रही है, बल्कि किसानों के खर्चों में भी भारी कटौती हो रही है।
कृषि सखी की रासायनिक खादों के खिलाफ जंग
लाल परी अपने क्षेत्र में कृषि सखी के रूप में सेवा दे रही हैं। वह निरंतर किसानों के बीच जाकर उन्हें जहरीले कीटनाशकों और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति सचेत कर रही हैं। वह किसानों को इस बात के लिए प्रेरित कर रही हैं कि वे यूरिया और डीएपी जैसी अत्यंत महंगी रासायनिक खादों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह समाप्त करें। इसकी जगह वे घर पर ही बहुत कम खर्च में प्राकृतिक तरीकों से अपनी फसलों के लिए पौष्टिक खाद तैयार कर सकते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता को बचाना और फसलों को विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियों से सुरक्षित रखना है। लाल परी के अनुसार, खेतों से रसायनों को हटाने के बाद किसान जीवामृत और घन जीवामृत जैसे प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो यूरिया और डीएपी की कमी को पूरी तरह पूरा करने में सक्षम हैं।
200 लीटर जीवामृत तैयार करने का आसान फॉर्मूला
प्राकृतिक रूप से जीवामृत तैयार करने की विधि काफी सरल है। इसके लिए सबसे पहले 200 लीटर की क्षमता वाले एक साफ प्लास्टिक ड्रम की आवश्यकता होती है। इस ड्रम में करीब 175 लीटर साफ पानी भरा जाता है। इसके बाद इसमें 10 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर और 10 लीटर गौमूत्र डाला जाता है। इस मिश्रण में पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए 2 किलोग्राम गुड़ और 2 किलोग्राम बेसन मिलाया जाता है। इसके साथ ही, इसमें 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी डाली जाती है। यह मिट्टी किसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे की हो सकती है या फिर किसी ऐसे खेत की मेढ़ से ऊपर की सूखी परत हटाकर निकाली जा सकती है जहां रसायनों का इस्तेमाल न हुआ हो। इन सभी सामग्रियों को ड्रम में अच्छी तरह मिला दिया जाता है।
मिट्टी के लिए वरदान साबित होते हैं सूक्ष्मजीव
इस तैयार किए गए घोल में कुछ ही दिनों के भीतर अनगिनत संख्या में गुड बैक्टीरिया यानी फसलों के अनुकूल लाभकारी सूक्ष्मजीव विकसित हो जाते हैं। जब इस जैविक घोल को खेतों की मिट्टी में डाला जाता है, तो ये सूक्ष्मजीव मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं। यह प्राकृतिक मिश्रण फसलों के विकास के लिए किसी अमृत से कम नहीं है, क्योंकि यह बिना किसी दुष्प्रभाव के पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
खेतों में जीवामृत डालने की आसान विधि
खेतों में इस प्राकृतिक खाद का उपयोग करना बेहद सरल और व्यावहारिक है। कृषि सखी के अनुसार, घन जीवामृत को खेत की अंतिम जुताई से ठीक पहले पूरे खेत में बिखेर दिया जाता है और फिर जुताई कराकर फसलों की रोपाई की जाती है। वहीं, तरल जीवामृत को खड़ी फसल में सिंचाई के पानी के साथ इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए पानी चलाने वाले स्थान पर किसी मटके या डिब्बे में एक छोटा सा छेद करके उसे लटका दिया जाता है, जिससे बूंद-बूंद करके यह घोल पानी के साथ मिलकर पूरे खेत में फैल जाता है। यदि कोई बर्तन उपलब्ध न हो, तो सिंचाई की नाली या पाइप के मुहाने के पास किसी लोटे से थोड़ा-थोड़ा करके इसे पानी में मिलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, किसान चाहें तो इस मिश्रण को छानकर स्प्रे मशीन की मदद से फसलों पर सीधे छिड़काव भी कर सकते हैं।



















