न्यूजीलैंड दौरे पर देवदत्त पडिक्कल का शानदार शतक, साई सुदर्शन सिर्फ 8 रन से चुकेनेपाल प्रीमियर लीग में पाकिस्तानी क्रिकेटरों की राह में अड़चन, NOC को लेकर खड़ी हुई बड़ी मुश्किलशादाब खान के ऐतिहासिक शतक से इंग्लैंड चित, पाकिस्तान ने दर्ज की रोमांचक जीतउड़ता तीर बॉक्स ऑफिस कलेक्शन डे 3: आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की फिल्म ने पहले वीकेंड पर कमाए इतने करोड़अशोक सेन: नोबेल से तीन गुना बड़े इनाम वाले भारतीय वैज्ञानिक, जिनकी सादगी आज भी साइकिल पर टिकी हैमुंबई में कृष्णा दास के कीर्तन में भक्तिमय हुए अनुष्का शर्मा और विराट कोहलीभारत और न्यूजीलैंड के बीच तीसरे टी20 मुकाबले की तारीख, समय और वेन्यू की पूरी जानकारीन्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट स्क्वाड में देवदत्त पडिक्कल ने मजबूत की अपनी दावेदारी, 199 रनों की खेली शानदार पारीरजनीकांत की 'धर्मन' में हुई नयनतारा की एंट्री, पांच साल बाद दोनों कलाकार आएंगे साथ नजरआरआरआर की छोटी मल्ली का बदल गया है पूरा अंदाज, 160 लड़कियों को पीछे छोड़कर मिला था रोल
जहानाबाद में सरकारी नौकरी छोड़कर 1978 में शुरू हुआ लोक प्रिया स्टूडियो, जानें कैसे डार्क रूम से डिजिटल तक तय किया शानदार सफरसक्सेस स्टोरी
13 सित॰ 2026, 4:09 pm (46 दिन पहले)· 0

जहानाबाद में सरकारी नौकरी छोड़कर 1978 में शुरू हुआ लोक प्रिया स्टूडियो, जानें कैसे डार्क रूम से डिजिटल तक तय किया शानदार सफर

स्वास्थ्य विभाग की नौकरी छोड़कर कौशल कुमार और अरुण कुमार ने 1978 में जहानाबाद के मलहचक मोड़ पर लोक प्रिया स्टूडियो की शुरुआत की थी। पहला ग्राहक पाने के लिए एक महीने का इंतजार करने वाले इस स्टूडियो ने केमिकल डार्क रूम से लेकर आधुनिक डिजिटल फोटोग्राफी तक का लंबा सफर तय किया है।

बिहार के जहानाबाद जिले में फोटोग्राफी के क्षेत्र में अपनी खास पहचान बनाने वाले लोक प्रिया स्टूडियो की कहानी कड़ी मेहनत, दूरदर्शिता और वक्त के साथ खुद को बदलने की प्रेरणादायक मिसाल है। वर्ष 1978 में शुरू हुए इस स्टूडियो ने फोटोग्राफी तकनीक के शुरुआती दौर से लेकर आज के आधुनिक डिजिटल युग तक का सफर देखा है। वर्तमान में इसे संभालने वाले वीरभद्र कुमार, जिन्हें लोग प्यार से गप्पू भी कहते हैं, अपने पिता स्वर्गीय कौशल कुमार और चाचा अरुण कुमार के उस संघर्षपूर्ण फैसले को याद करते हैं जिसने इस प्रतिष्ठित संस्थान की नींव रखी थी।

सरकारी नौकरी त्यागकर रखी गई थी स्टूडियो की नींव

लोक प्रिया स्टूडियो की शुरुआत किसी आम कारोबारी फैसले से नहीं, बल्कि एक कड़े और साहसिक निर्णय से हुई थी। कौशल कुमार के पिता स्वास्थ्य विभाग में सरकारी सेवा में कार्यरत थे। हालांकि, सरकारी नौकरी के सिलसिले में घर और परिवार से लगातार दूर रहना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा था। इसी पारिवारिक दूरी से बचने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपने भाई अरुण कुमार के साथ मिलकर एक स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करने की योजना बनाई। दोनों भाइयों ने जुनून और दृढ़ निश्चय के साथ वर्ष 1978 में जहानाबाद के मलहचक मोड़ के पास लोक प्रिया स्टूडियो की स्थापना की।

ये भी पढ़ें

शुरुआती दौर में जब आम लोगों के बीच तस्वीरों और कैमरे की समझ बहुत सीमित थी, तब कौशल कुमार और अरुण कुमार ने बाकायदा पेंटिंग और चित्रकारी का काम सीखा। उस दौर में न तो हर किसी के पास कैमरे की सुविधा उपलब्ध थी और न ही फोटो खींचने या उसे तैयार करने की सही तकनीक आसानी से मिलती थी। ऐसे अनिश्चित माहौल में एक नया व्यवसाय शुरू करना बेहद जोखिम भरा कदम माना जाता था।

पहले ग्राहक के लिए एक महीने का लंबा इंतजार

स्टूडियो खोलने के बाद शुरुआती दिन बेहद कठिन और निराशाजनक साबित हुए। दुकान की शुरुआत से लेकर पूरे एक महीने तक एक भी ग्राहक वहां फोटो खिंचवाने नहीं पहुंचा। उस दौर को याद करते हुए बताया जाता है कि हर दिन सुबह 10 बजे घर से निकलकर दुकान का शटर उठाना और दिनभर इंतजार करने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौट जाना नियम बन चुका था। हालांकि, दोनों भाइयों ने अपना धैर्य बनाए रखा और लगातार अपने काम पर डटे रहे।

एक महीने का लंबा वक्त बीत जाने के बाद जब पहला ग्राहक दुकान पर पहुंचा, तो परिजनों के लिए वह पल किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं था। उस पहले ग्राहक के आगमन के साथ ही लोक प्रिया स्टूडियो के व्यवसाय का कारवां चल पड़ा। इसके बाद दोनों संस्थापकों ने अपनी अटूट मेहनत और बेहतरीन सेवा के दम पर स्थानीय लोगों का दिल जीतना शुरू कर दिया, जिससे धीरे-धीरे यह स्टूडियो जहानाबाद के लोगों के परिवारों का हिस्सा बन गया।

केमिकल और डार्क रूम से लेकर दिल्ली से कंप्यूटर लाने तक का सफर

फोटोग्राफी के शुरुआती दौर में तस्वीरें तैयार करने की प्रक्रिया आज के मुकाबले बहुत जटिल और मेहनत भरी होती थी। उस समय केमिकल का जमाना था, जहां रसायनों को वजन से तौलकर इस्तेमाल किया जाता था। तस्वीरों को पूरी तरह से घने अंधेरे वाले कमरों यानी डार्क रूम में निगेटिव से पॉजिटिव में बदला जाता था। जरा सी चूक से पूरी फोटो खराब हो जाती थी, लेकिन लोक प्रिया स्टूडियो ने इस कला में महारत हासिल की।

जब फोटोग्राफी की दुनिया में कंप्यूटर और आधुनिक उपकरणों की आहट हुई, तो लोक प्रिया स्टूडियो ने समय के साथ खुद को बदलने में देर नहीं की। पिता और चाचा दोनों विशेष रूप से दिल्ली गए और वहां से ₹50000 का भारी-भरकम निवेश करके एक कंप्यूटर और एप्सन का प्रिंटर खरीदकर जहानाबाद लाए। उस समय सभी स्टूडियो में मुख्य रूप से DOS ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता था। विंडोज पर काम करना किसी के लिए आसान नहीं था, लेकिन दोनों भाइयों ने धीरे-धीरे इस नई तकनीक को सीखा और अपने काम में शामिल किया।

डिजिटल कैमरे का दौर और नई पीढ़ी की एंट्री

तकनीक आगे बढ़ी तो स्टूडियो में कोडक 2.0 डिजिटल कैमरा शामिल किया गया। तकनीकी दक्षता को बढ़ाने के लिए परिवार के ही सदस्य ने पटना स्थित एरेना संस्थान से फोटोशॉप का एडवांस कोर्स किया। वहां सीखे गए नए तरीकों और संपादन तकनीकों को जहानाबाद आकर स्टूडियो के कर्मचारियों और परिवार को सिखाया गया। इस प्रकार आधुनिक सॉफ्टवेयर और डिजिटल संपादन के साथ लोक प्रिया स्टूडियो ने इलाके में अपनी बढ़त बनाए रखी।

आज के समय में जब हर हाथ में मोबाइल फोन है और ऑटोमैटिक कैमरों का चलन बढ़ चुका है, तब भी लोक प्रिया स्टूडियो की साख बरकरार है। जिस मलहचक मोड़ पर 1978 में सन्नाटा पसरा रहता था और आसपास कोई दुकानें नहीं थीं, आज वह इलाका एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका है। आज भी दूर-दूर से लोग पूरे परिवार के साथ इस स्टूडियो में आकर फोटो खिंचवाना पसंद करते हैं, जो इसके 46 से अधिक वर्षों के विश्वास और निरंतर बदलाव का परिणाम है।

सवाल-जवाब

लोक प्रिया स्टूडियो की शुरुआत किस वर्ष हुई थी?
लोक प्रिया स्टूडियो की शुरुआत जहानाबाद में वर्ष 1978 में हुई थी।
स्टूडियो के संस्थापकों ने सरकारी नौकरी क्यों छोड़ी थी?
स्वास्थ्य विभाग की नौकरी में घर और परिवार से दूर रहना पड़ता था, इसी वजह से नौकरी छोड़कर स्टूडियो शुरू किया गया।
शुरुआत में पहला ग्राहक पाने में कितना समय लगा था?
दुकान खोलने के बाद पहला ग्राहक आने में पूरे एक महीने का समय लगा था।
डिजिटल दौर में प्रवेश करने के लिए संस्थापक कितना निवेश करके कंप्यूटर लाए थे?
संस्थापक दिल्ली जाकर ₹50000 में कंप्यूटर और एप्सन का प्रिंटर खरीदकर लाए थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp