दुनिया के सबसे प्रभावशाली मंचों में से एक ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कैमरों की नजरें मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे शीर्ष वैश्विक नेताओं पर टिकी थीं। हालांकि, उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ताओं की तस्वीरों में एक भारतीय अधिकारी लगातार प्रधानमंत्री के ठीक बगल में मौजूद नजर आए। ये अधिकारी हैं भारतीय विदेश सेवा (IFS) के सदस्य सिद्धार्थ बाबू, जो प्रधानमंत्री के आधिकारिक राजनयिक अनुवादक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वैश्विक नेताओं की बंद कमरे में हुई गोपनीय वार्ताओं के दौरान भाषा की दूरी को मिटाने वाले सिद्धार्थ बाबू की तस्वीरें सामने आने के बाद उनके करियर और पृष्ठभूमि को लेकर लोगों में खासी दिलचस्पी देखने को मिल रही है।
कॉर्पोरेट दुनिया से सिविल सेवा का सफर
केरल के तटीय शहर कोच्चि के रहने वाले सिद्धार्थ बाबू की शुरुआती पढ़ाई और करियर कूटनीति से काफी अलग क्षेत्र में शुरू हुआ था। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की और इसके बाद निजी क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय और ई-कॉमर्स कंपनियों में कार्यरत रहे। कॉर्पोरेट जगत में काम करने के बावजूद उनके मन में देश सेवा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रति गहरा आकर्षण था। इसी प्रेरणा से उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी शुरू की। साल 2016 की सिविल सेवा परीक्षा में सिद्धार्थ बाबू ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए पूरे देश में 15वीं रैंक (AIR 15) हासिल की।
आईएएस का विकल्प छोड़कर क्यों चुनी विदेश सेवा?
यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया 15वीं रैंक प्राप्त करने के कारण सिद्धार्थ बाबू के पास भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) चुनने का पूरा अवसर उपलब्ध था। सिविल सेवा अभ्यर्थियों के बीच आईएएस सबसे लोकप्रिय विकल्प माना जाता है, लेकिन सिद्धार्थ बाबू ने अपने व्यक्तिगत रुझान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में रुचि के कारण भारतीय विदेश सेवा (IFS) को प्राथमिकता दी। वह 2017 बैच के आईएफएस अधिकारी बने। वर्तमान में वह विदेश मंत्रालय (MEA) में यूरोप और यूरेशिया मामलों के उप सचिव के पद पर कार्यरत हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम मोदी के बीच बातचीत का अनुवाद करते हुए उनकी तस्वीरों ने उन्हें इंटरनेट पर चर्चा का केंद्र बना दिया।
आईएएस और आईएफएस के काम और वेतन में अंतर
सिविल सेवा के इन दो शीर्ष पदों को लेकर अक्सर लोगों के मन में कार्यशैली और सुविधाओं को लेकर उत्सुकता रहती है। आईएएस अधिकारी मुख्य रूप से देश के भीतर रहकर जिला प्रशासन, राज्य के विभागों, कानून व्यवस्था और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को संभालते हैं। उनका सीधा जुड़ाव आम जनता और घरेलू प्रशासनिक व्यवस्था से होता है। इसके विपरीत, आईएफएस अधिकारी विदेशों में भारत के दूतावासों और उच्चायोगों में राजदूत या राजनयिक के रूप में कार्य करते हैं। उनका मुख्य काम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के हितों की रक्षा करना, दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को रूप देना और कूटनीतिक संबंध मजबूत करना होता है।
वेतन और भत्तों की बात करें तो दोनों सेवाओं के अधिकारियों की शुरुआती बेसिक सैलरी 7वें वेतन आयोग के लेवल 10 से शुरू होती है और पदोन्नति के साथ कैबिनेट सचिव या विदेश सचिव जैसे शीर्ष पदों (लेवल 18) तक पहुंचती है। इस प्रकार दोनों का मूल वेतनमान एक समान रहता है। हालांकि, जब आईएफएस अधिकारियों की तैनाती विदेश में होती है, तो उन्हें भारत सरकार द्वारा 'फॉरेन अलाउंस' यानी विदेशी भत्ता प्रदान किया जाता है। विदेशी मुद्रा दर, संबंधित देश में रहने के खर्च और राजनयिक आवश्यकताओं को देखते हुए यह भत्ता दिया जाता है, जिसके कारण विदेशों में पदस्थ आईएफएस अधिकारियों का कुल वेतन और सुविधाएं काफी अधिक हो जाती हैं।



















