बुंदेलखंड क्षेत्र का चित्रकूट जिला लंबे समय से पानी की भारी किल्लत और सिंचाई के पर्याप्त साधनों की कमी के कारण कृषि के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ माना जाता रहा है। इस पथरीली और पथरीले मिजाज वाली भूमि पर खेती करना किसी भी किसान के लिए एक बड़ी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन इसी कठिन परिस्थिति के बीच बैहार गांव के निवासी नथूराम ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से एक बिल्कुल अलग राह चुनी है। उन्होंने पारंपरिक रासायनिक खेती के नुकसान को समझते हुए उसे पूरी तरह त्याग दिया और जैविक खेती को अपना आधार बनाया। आज वे अपने 18 बीघे के विशाल खेत में नींबू की बागवानी के साथ-साथ कई प्रकार की अन्य फसलों को सफलतापूर्वक उगाकर क्षेत्र के किसानों के लिए एक मार्गदर्शक बन चुके हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद शुरू किया मिट्टी से जुड़ा नया सफर
नथूराम पहले एक सरकारी शिक्षक के रूप में शिक्षा क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे थे। सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने के बाद उन्होंने खाली बैठने के बजाय मिट्टी की सेवा करने का मन बनाया और खेती को ही अपना पूर्णकालिक कार्य चुन लिया। साल 2022 में उन्होंने अपनी करीब 18 बीघे कृषि भूमि पर जैविक तरीके से खेती करने की शुरुआत की। वर्तमान समय में उनके खेत में नींबू के 150 से अधिक पेड़ लहलहा रहे हैं। इस सफर की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वे बताते हैं कि उन्होंने इन नींबू के पौधों को महज 5 रुपये प्रति पौधे की बेहद किफायती दर पर खरीदा था। नींबू की इस शानदार बागवानी के अतिरिक्त उन्होंने खेत के बाकी हिस्सों में मौसम के अनुकूल कई अन्य फसलें भी लगा रखी हैं।
विशेष प्रशिक्षण से मिला जैविक खेती का व्यावहारिक ज्ञान
नथूराम के अनुसार, रासायनिक खादों को छोड़कर पूरी तरह प्राकृतिक तरीकों को अपनाने की प्रेरणा उन्हें झांसी के चिरगांव स्थित राजकीय कृषि विद्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम से मिली थी। वहां उन्होंने तीन दिनों के एक गहन कृषि प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया था। इस प्रशिक्षण के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने उन्हें जैविक खाद बनाने की प्रामाणिक विधियां सिखाईं, फसलों में प्राकृतिक खादों के उपयोग की तकनीक बताई और पर्यावरण के अनुकूल खेती करने के व्यावहारिक पहलुओं से परिचित कराया। इस शिक्षा से प्रभावित होकर उन्होंने अपने खेतों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का छिड़काव धीरे-धीरे कम करते हुए अंततः इसे पूरी तरह बंद कर दिया।
खेत पर ही प्राकृतिक जीवामृत का निर्माण
अपने खेतों को उपजाऊ बनाए रखने के लिए नथूराम को बाजार से महंगी खादें खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे अपनी जरूरत की पूरी जैविक खाद खुद अपने खेत पर ही तैयार करते हैं। इसके लिए वे देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का संतुलित मिश्रण बनाकर 'जीवामृत' तैयार करते हैं। इस तैयार जीवामृत का छिड़काव वे अपनी फसलों और नींबू के पौधों में नियमित रूप से करते हैं। उनका अनुभव है कि जैविक खेती के शुरुआती दौर में किसान को थोड़ी अतिरिक्त शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, मिट्टी की आंतरिक गुणवत्ता और बनावट में अद्भुत सुधार होता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और अंततः फसलों का उत्पादन भी तेजी से सुधरता है।
विविध फसलों और बागवानी से सालभर सुनिश्चित आय
नथूराम ने अपने 18 बीघे के खेत को किसी एक फसल के भरोसे नहीं छोड़ा है। वे सालभर मौसम के बदलाव के अनुसार विभिन्न प्रकार की फसलें उगाते हैं। रबी के सीजन में वे अपने खेतों में गेहूं, सरसों और चना की अच्छी पैदावार ले चुके हैं। वहीं, खरीफ के सीजन के दौरान वे मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर और तिल की खेती करते हैं। मुख्य फसलों के अलावा उनके खेत में नींबू के पेड़ों के साथ-साथ आम, मुसंबी और सेब जैसे कई अन्य फलदार पौधे भी लगाए गए हैं, जो अब धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं। इन सभी बहुआयामी फसलों और बागवानी के मिश्रण से उन्हें सालाना लगभग 4 लाख रुपये की शानदार आमदनी प्राप्त हो रही है।
समाज को जहर मुक्त भोजन देने का संकल्प
नथूराम का कहना है कि जैविक विधि से तैयार किए गए फलों और अनाजों की बाजार में अत्यधिक मांग रहती है और लोग इनके लिए अच्छे दाम देने को भी तैयार रहते हैं। अपनी इस सफलता के बाद वे केवल खुद तक ही सीमित नहीं रहे हैं। वे आसपास के गांवों के अन्य किसानों को भी जैविक खेती की ओर मोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। वे किसानों को मुफ्त में जैविक खाद बनाने की विधि सिखाते हैं और उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनका मानना है कि रसायन मुक्त शुद्ध अनाज और फलों का सेवन करने से मानव शरीर को कई गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है, इसलिए वे समाज के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।



















