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चंबल के बीहड़ों से निकली सफलता की दास्तान, देव प्रभाकर तोमर ने विदेशी नौकरी छोड़ पास की यूपीएससीसक्सेस स्टोरी
3 अक्तू॰ 2026, 1:27 pm (20 मिनट पहले)· 0

चंबल के बीहड़ों से निकली सफलता की दास्तान, देव प्रभाकर तोमर ने विदेशी नौकरी छोड़ पास की यूपीएससी

चंबल के बागी परिवार की पृष्ठभूमि से निकलकर देव प्रभाकर सिंह तोमर ने पहले आईआईटी और नीदरलैंड में नौकरी की, फिर तीसरे प्रयास में यूपीएससी क्रैक कर इतिहास रच दिया।

मध्य प्रदेश का चंबल क्षेत्र दशकों से बीहड़ों, हथियारों की गूंज और खूंखार डकैतों की कहानियों के लिए चर्चा में रहा है। जब भी इस अंचल की बात होती है, लोगों के जेहन में अपराध और संघर्ष की पुरानी तस्वीरें तैरने लगती हैं। लेकिन सामाजिक बदलाव की बयार अब इन घाटियों की तस्वीर पूरी तरह बदल रही है। जिस परिवार का अतीत कभी पुलिस रिकॉर्ड और बंदूकों की साये में बीता था, उसी की नई पीढ़ी ने कलम और किताबों की ताकत से पूरे देश में मिसाल कायम की है। यह प्रेरक दास्तान है देव प्रभाकर सिंह तोमर की, जिन्होंने अपनी लगन के दम पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा में शानदार मुकाम हासिल किया है।

देव प्रभाकर सिंह तोमर के दादा किसी जमाने में चंबल के कुख्यात बागी माने जाते थे। प्रशासन और सरकारी तंत्र के साथ उनके तीखे वैचारिक मतभेदों ने ऐसा मोड़ लिया कि वे व्यवस्था की नजरों में बागी और डकैत बन गए। उस समय परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर में भुखमरी जैसी नौबत आ गई थी और दो वक्त की रोटी जुटाना भी बेहद कठिन हो गया था। लेकिन देव के पिता ने अपराध और तंगहाली के इस दुष्चक्र को तोड़ने की ठानी। उन्होंने अपना पुश्तैनी गांव छोड़ दिया और मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर का रुख किया। वहां उन्होंने विपरीत हालात में दिन-रात एक करके पढ़ाई की और आखिरकार एक शिक्षक बनकर परिवार की जिंदगी को नई दिशा दी।

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ग्वालियर से स्कूली शिक्षा और आईआईटी का सपना

पिता के अध्यापक बनने के बाद घर के आर्थिक हालात धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगे। देव प्रभाकर सिंह तोमर की शुरुआती तालीम मध्य प्रदेश बोर्ड के स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद उनके पिता ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में उनका दाखिला सीबीएसई बोर्ड के अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया। हिंदी माध्यम की पृष्ठभूमि से अचानक अंग्रेजी माध्यम में आने की वजह से देव को शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। भाषा की इस दीवार ने उन्हें कई बार असहज किया, मगर उन्होंने हार मानने के बजाय सीखने की जिद को अपना हथियार बना लिया।

स्कूली दिनों के दौरान जब उनके सहपाठियों ने प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों और आईआईटी की चर्चा शुरू की, तो देव के दिल में भी देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा जाग उठी। उन्होंने इस सपने को साकार करने के लिए पूरी लगन झोंक दी। अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत उन्होंने पहले ही प्रयास में संयुक्त प्रवेश परीक्षा (JEE) पास कर ली और आईआईटी रोपड़ में बीटेक पाठ्यक्रम में दाखिला हासिल कर लिया।

नीदरलैंड में कॉर्पोरेट करियर छोड़कर दिल्ली का रुख

आईआईटी रोपड़ से इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद देव प्रभाकर के सामने संभावनाओं के नए द्वार खुल गए। उनका चयन नीदरलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फिलिप्स में हो गया। यूरोप में लाखों रुपये के सालाना पैकेज, आधुनिक सुख-सुविधाओं और आरामदायक जीवनशैली के बावजूद उनका मन वहां नहीं लगा। उन्हें लगातार यह अहसास होता रहा कि उनका असली मकसद अपने वतन लौटकर समाज और राष्ट्र निर्माण में सीधी भागीदारी निभाना है।

देश सेवा की इसी तड़प के चलते उन्होंने विदेश की आलीशान जिंदगी और आकर्षक नौकरी को अलविदा कह दिया और भारत वापस आ गए। नई दिल्ली पहुंचकर उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का फैसला किया। आर्थिक आत्मनिर्भरता बनाए रखने और अपने खर्च पूरे करने के लिए उन्होंने दिल्ली की गलियों में बच्चों को कोचिंग और ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। दिन में अध्यापन और रात में घंटों तक गंभीर अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी तैयारी को धार दी।

शुरुआती असफलताओं के बाद रेलवे सेवा में चयन

सिविल सेवा परीक्षा की राह देव प्रभाकर के लिए आसान नहीं रही। अपने शुरुआती दो प्रयासों में उन्हें असफलता का कड़वा घूंट पीना पड़ा। लगातार दो बार चयन न होने के बावजूद उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया। उन्होंने अपनी पिछली गलतियों का बारीकी से विश्लेषण किया, कमजोर विषयों पर नए सिरे से काम किया और तीसरे प्रयास में पूरी ताकत झोंक दी।

उनकी यह अटूट साधना यूपीएससी 2025 की परीक्षा में रंग लाई, जहां उन्होंने 629वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल कर सफलता का परचम लहरा दिया। इस शानदार उपलब्धि के साथ उनका चयन प्रतिष्ठित इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) के लिए हुआ। आज वे भारत सरकार के रेल मंत्रालय में एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं और साबित कर चुके हैं कि इंसान का भविष्य उसके पुरखों के अतीत से नहीं, बल्कि उसकी अपनी मेहनत और फैसलों से तय होता है।

सवाल-जवाब

देव प्रभाकर सिंह तोमर कौन हैं?
देव प्रभाकर सिंह तोमर चंबल पृष्ठभूमि से आने वाले एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, जिन्होंने यूपीएससी 2025 में 629वीं रैंक हासिल की है।
देव प्रभाकर के परिवार का चंबल से क्या नाता रहा है?
उनके दादा सरकारी अधिकारियों से विवादों के चलते चंबल के बागी बन गए थे, जिसके बाद परिवार को भारी गरीबी और संकट झेलना पड़ा।
देव के पिता ने परिवार की स्थिति कैसे बदली?
उनके पिता ने पैतृक गांव छोड़कर ग्वालियर का रुख किया, जहां उन्होंने दिन-रात पढ़ाई कर शिक्षक की नौकरी हासिल की और परिवार को संभाला।
देव प्रभाकर ने उच्च शिक्षा कहां से हासिल की?
उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में जेईई परीक्षा पास की और आईआईटी रोपड़ से बीटेक की डिग्री प्राप्त की।
विदेश में वे किस कंपनी में कार्यरत थे?
आईआईटी के बाद उनका चयन नीदरलैंड में प्रसिद्ध इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फिलिप्स में हुआ था, जहां वे लाखों के पैकेज पर काम कर रहे थे।
दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी के दौरान उन्होंने क्या काम किया?
दिल्ली में अपने खर्च उठाने और तैयारी जारी रखने के लिए वे स्कूली बच्चों को ट्यूशन और कोचिंग पढ़ाया करते थे।
यूपीएससी परीक्षा में उन्हें किस प्रयास में सफलता मिली?
शुरुआती दो प्रयासों में असफल रहने के बाद उन्हें अपने तीसरे प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 629 के साथ सफलता मिली।
वर्तमान में वे किस सेवा में पदस्थ हैं?
वे इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) में चयनित हुए हैं और रेल मंत्रालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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