उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के अंतर्गत आने वाले वजीरगंज विकासखंड की निवासी मीरा तिवारी ने सीमित संसाधनों के बीच एक मिसाल पेश की है। घरेलू जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने महज 500 रुपये की शुरुआती पूंजी से अचार तैयार करने का काम शुरू किया था। आज उनका यह घरेलू प्रयास एक बढ़ते हुए ग्रामीण उद्यम में तब्दील हो चुका है। साल 2021 में स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद मीरा ने अपने बचपन के शौक को आजीविका का जरिया बनाया, जिसके चलते अब उनके उत्पाद गोंडा के अलावा बलरामपुर, बहराइच और अयोध्या जैसे पड़ोसी जिलों तक नियमित रूप से पहुंच रहे हैं।
घरेलू शौक को बनाया स्वरोजगार की बुनियाद
मीरा तिवारी ने केवल हाईस्कूल तक की औपचारिक शिक्षा हासिल की थी। इसके उपरांत उनका विवाह हो गया और उनका अधिकांश समय परिवार व गृहस्थी संभालने में व्यतीत होने लगा। उन्हें बचपन के दिनों से ही तरह-तरह के अचार बनाने और पारंपरिक स्वाद चखने का बेहद शौक था। जब गांव में उन्हें स्वयं सहायता समूह की गतिविधियों और महिला सशक्तिकरण की योजनाओं के बारे में जानकारी मिली, तो वह तुरंत समूह की सदस्य बन गईं। यहीं से उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न अपने पुराने हुनर को एक व्यावसायिक रूप दिया जाए। इसके बाद उन्होंने बिना किसी बड़े वित्तीय जोखिम के केवल 500 रुपये लगाकर बुनियादी सामग्रियां खरीदीं और पहला बैच तैयार किया।
आरंभिक अड़चनें और कच्चे माल की समझ
व्यापार की शुरुआती राह मीरा के लिए कतई सरल नहीं थी। उनके पास न तो किसी उत्पाद के विपणन का अनुभव था और न ही उन्हें यह मालूम था कि बड़े पैमाने पर टिकाऊ व उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा माल कहां से खरीदा जाए। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और धीरे-धीरे स्थानीय मंडियों, मसालों के चयन और सही अनुपात की जानकारी एकत्र करनी शुरू की। अपनी गलतियों से सीखते हुए उन्होंने रेसिपी को परिष्कृत किया। जैसे-जैसे लोगों ने उनके उत्पाद का स्वाद चखा, मांग में लगातार इजाफा होने लगा। वर्तमान समय में मीरा करीब 10 से 15 अलग-अलग किस्मों के अचार तैयार कर रही हैं। उनके मेन्यू में मिर्च चटनी का अचार, भरवां अचार, लहसुन का अचार, आम का अचार, नींबू का अचार, मिक्स अचार और पारंपरिक मिर्च का अचार प्रमुखता से शामिल हैं। ग्राहकों के बीच मिर्च चटनी वाले अचार की मांग सबसे ज्यादा देखी जाती है।
पारंपरिक विधि, स्वच्छता और केमिकल मुक्त उत्पाद
मीरा के अनुसार उनके काम की सबसे बड़ी खासियत स्वच्छता और प्रामाणिक स्वाद है। वह किसी भी प्रकार के कृत्रिम स्वाद बढ़ाने वाले या नुकसानदेह केमिकल का इस्तेमाल नहीं करती हैं। उत्पाद की शुद्धता ही उनके ब्रांड की पहचान बनी है। इस बढ़ते काम में उन्हें अपने परिवार का मजबूत संबल मिला हुआ है। उनकी दोनों बेटियां, काली तिवारी और सृष्टि तिवारी, अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ मां का हाथ बंटाती हैं। इंटरमीडिएट की छात्रा काली पढ़ाई के बाद अचार के लिए खड़े मसाले कूटने, मिलाने और डिब्बों की पैकिंग में सहयोग देती हैं। वहीं दूसरी बेटी सृष्टि भी अपनी नियमित पढ़ाई जारी रखते हुए पैकिंग, लेबलिंग और दूसरे छोटे-बड़े कार्यों में पूरी मुस्तैदी से जुटी रहती हैं।
विपणन में पति की भूमिका और वित्तीय संतुलन
घरेलू उत्पादन को बाजार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण जिम्मा मीरा के पति संभालते हैं। जहां मीरा और दोनों बेटियां रसोई के भीतर निर्माण, गुणवत्ता जांच और पैकिंग का सारा दारोमदार देखती हैं, वहीं उनके पति स्थानीय बाजारों में संपर्क साधने, दुकानों तक माल पहुंचाने और बिक्री की निगरानी का काम पूरा करते हैं। इसी सामूहिक प्रयास का नतीजा है कि गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और अयोध्या के व्यापारी सीधे उनसे माल मंगा रहे हैं। वर्तमान समय में प्रति माह इस काम में करीब 15 से 20 हजार रुपये की लागत आती है, जिसके मुकाबले हर महीने करीब 40 से 50 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हो रही है।
राष्ट्रीय और वैश्विक विस्तार का लक्ष्य
मीरा तिवारी अब अपने इस उद्यम को केवल क्षेत्रीय बाजारों तक सीमित नहीं रखना चाहतीं। उनका सपना अपने उत्पादों को देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशी बाजारों तक पहुंचाने का है। वह लगातार नई किस्मों के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उनकी बेटी सृष्टि भी इस सपने को साझा करती हैं और चाहती हैं कि उनकी मां की पहचान पूरे देश और दुनिया में बने। साथ ही सृष्टि अपनी मां के संघर्ष और सफलता से प्रेरित होकर भविष्य में स्वयं का व्यवसाय शुरू करने की योजना बना रही हैं।


















