असफलताएं अक्सर इंसान को अंदर से तोड़ देती हैं, लेकिन अगर हौसला बुलंद हो, तो वही असफलताएं सफलता की सबसे मजबूत सीढ़ी बन जाती हैं। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के जटपुरा गांव के रहने वाले भुवनेश कुमार ने इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। महज 21 साल की उम्र में एसएससी सीजीएल जैसी देश की बेहद कठिन प्रतियोगी परीक्षा को पास करना कोई आम बात नहीं होती है। उन्होंने केंद्रीय सचिवालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर यानी एएसओ के रूप में अपनी जगह बनाकर यह साबित कर दिया कि अगर आपके इरादे पक्के हैं, तो संसाधनों की कमी कभी भी आपके रास्ते में रुकावट नहीं बन सकती है।
भुवनेश कुमार का पूरा जीवन संघर्षों और कठिनाइयों की एक लंबी दास्तां बयां करता है। एक वक्त ऐसा भी आया था जब वे चपरासी यानी एमटीएस की परीक्षा में भी असफल हो गए थे। लोग तरह-तरह के ताने मारते थे और यह कहते थे कि बिना दिल्ली गए कोई भी बड़ी परीक्षा नहीं निकाली जा सकती है। उनके पिता का एक गंभीर एक्सीडेंट हो गया था, जिसके बाद घर की सारी आर्थिक जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने मात्र 25 रुपये में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। लगातार करीब 13 से 14 परीक्षाओं में असफलता का सामना करने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आखिरकार एसएससी सीजीएल में शानदार सफलता हासिल कर एक नई इबारत लिख दी।
तानों ने बदली जिंदगी और बनाई सरकारी नौकरी की जिद
करीब 18 साल की उम्र में भुवनेश कुमार को कई सरकारी परीक्षाओं में लगातार निराशा हाथ लगी थी। उनके गांव के ही एक व्यक्ति ने उन्हें ताना मारते हुए कहा था कि बिना दिल्ली जाए एसएससी सीजीएल परीक्षा को पास करना पूरी तरह से नामुमकिन है। यह ताना उनके दिल पर किसी तीर की तरह चुभ गया था। उन्होंने इस बात को अपनी प्रतिष्ठा पर लिया और एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया। उन्होंने उसी वक्त ठान लिया कि वे बिना दिल्ली गए, अपने गांव में ही रहकर इस परीक्षा को क्रैक करके दिखाएंगे। आखिरकार उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और पक्के संकल्प के दम पर ताने देने वाले हर शख्स को बेहद करारा जवाब दे दिया है।
पिता के एक्सीडेंट ने कम उम्र में छीना बचपन
भुवनेश कुमार की जिंदगी में असली और बड़ा संघर्ष मात्र 13 साल की उम्र में ही शुरू हो चुका था, जब वे नौवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे। उनके किसान पिता का एक भयानक एक्सीडेंट हो गया था, जिसके कारण उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आ गई और वे पूरी तरह से बिस्तर पर आ गए। उनके पिता ने खुद 45 साल की उम्र तक सरकारी नौकरी पाने के लिए कड़ी तैयारी की थी, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए थे। इस हादसे के बाद परिवार की आर्थिक हालत पूरी तरह से चरमरा गई। घर का खर्च चलाने और अपनी पढ़ाई के लिए कॉपी-किताबों का इंतजाम करने के वास्ते छोटे से भुवनेश ने अन्य बच्चों को मात्र 25-25 रुपये फीस लेकर ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था।
चपरासी परीक्षा में फेल होने का लगा सबसे गहरा सदमा
सफलता की लंबी राह में असफलताएं उनका लगातार पीछा कर रही थीं। एसएससी सीजीएल 2022 से लेकर सीएचएसएल, डीडीए और ईपीएफओ जैसी कई अन्य परीक्षाओं में वे कभी टाइपिंग टेस्ट में, कभी कंप्यूटर टेस्ट में तो कभी बेहद मामूली अंकों से बाहर हो जाते थे। हालांकि, सबसे गहरा और मानसिक आघात उन्हें चपरासी स्तर की एसएससी एमटीएस परीक्षा में असफल होने पर लगा था। उस रात वे पूरी तरह टूट गए थे और अपनी मां के पास जाकर फूट-फूटकर रोए थे कि क्या वे एक चपरासी बनने के भी लायक नहीं हैं? तब उनकी मां ने उन्हें प्यार से संभाला और ढांढस बंधाते हुए कहा कि बेटा, तुम्हारी किस्मत में इससे भी कहीं बेहतर और बड़ी सफलता लिखी है।
उसी रात आया सीजीएल का रिजल्ट और पलट गई किस्मत
मां के उन हौसले से भरे शब्दों का जादू कुछ ऐसा चला कि उसी रात एक चमत्कार हो गया। एसएससी एमटीएस परीक्षा के रिजल्ट घोषित होने के ठीक तीन घंटे बाद, रात के ठीक बारह बजे एसएससी सीजीएल 2024 का फाइनल रिजल्ट भी जारी कर दिया गया। जब उन्होंने अपने कांपते हाथों से पीडीएफ फाइल में अपना रोल नंबर सर्च किया, तो उनके नाम के आगे 'एएसओ इन सीएसएस' यानी लेवल-7 गजेटेड ऑफिसर लिखा हुआ दिखाई दिया। महज 21 साल की उम्र में उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत आखिरकार रंग लाई और आज वे हर महीने 81,000 रुपये से अधिक की शानदार सैलरी पा रहे हैं।
असफलता से तय किया सफलता तक का कठिन सफर
भुवनेश कुमार की यह प्रेरणादायक कहानी देश के करोड़ों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है। यह हमें सिखाती है कि असफलता कभी भी जीवन का अंत नहीं होती है। घर के तनावपूर्ण माहौल और पिता के दर्द के बीच उनकी पढ़ाई डिस्टर्ब न हो, इसके लिए उन्होंने अपने गांव से 10 किलोमीटर दूर एक लाइब्रेरी जाने का पक्का फैसला किया था। बस के लंबे सफर के दौरान भी वे अपने मोबाइल फोन और पर्चों की मदद से अंग्रेजी की वोकैबुलरी याद करते रहते थे। यदि आप भी किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं, तो छोटी-छोटी असफलताओं से कभी घबराएं नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों पर काम करें और सेल्फ-स्टडी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाएं।

















