प्रतापगढ़ जिले में स्थित देवाक माता मंदिर अपनी खास परंपराओं और गहरी लोक मान्यताओं के कारण देश और क्षेत्रभर में विशेष स्थान रखता है। जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह पवित्र स्थल केवल स्थानीय निवासियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, निंबाहेड़ा, छोटीसादड़ी, मंदसौर, रतलाम और नीमच जैसे विभिन्न इलाकों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। एक पहाड़ी की ऊंचाई पर बने इस मंदिर में साल के बारह महीने भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में यहां का धार्मिक माहौल और भी अधिक जीवंत हो जाता है जब विशेष अनुष्ठान और आयोजन किए जाते हैं।
त्रिशूल पर चढ़ती हैं जंजीरें और हथकड़ियां
देवाक माता मंदिर की सबसे अलग और अनोखी पहचान वहां रखे उस त्रिशूल से जुड़ी है जिस पर पुरानी हथकड़ियां, बेड़ियां और लोहे की जंजीरें लटकी हुई दिखाई देती हैं। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में जेल से फरार होने वाले अपराधी और बदमाश माता के दरबार में हाजिरी लगाने आते थे और अपनी बेड़ियां उस त्रिशूल पर अर्पित कर देते थे। यह अजीब परंपरा रियासतकाल के समय की लोककथाओं से उपजी है और आज भी मंदिर आने वाले हर व्यक्ति के लिए हैरानी और कौतूहल का मुख्य विषय बनी हुई है। क्षेत्र की लोककथा के मुताबिक, रियासतकाल के दौरान डाकू पृथ्वी राणा ने जेल के अंदर बंद रहते हुए देवाक माता से विशेष मन्नत मांगी थी। किंवदंती है कि उसने प्रार्थना की थी कि अगर वह जेल की चारदीवारी से बाहर निकलने में कामयाब हो गया, तो सबसे पहले सीधे माता के दर्शन करने आएगा। माना जाता है कि जेल से छूटने के बाद वह वास्तव में मंदिर पहुंचा और अपनी बेड़ियां माता के त्रिशूल पर चढ़ा दीं, जिसके बाद से ही यहां हथकड़ियां और जंजीरें चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो गया।
कानूनी परेशानियों से मुक्ति की कामना
बीते दौर में जहां बदमाश और कैदी जेल से भागने या पुलिस के शिकंजे से बचने की मन्नत लेकर यहां आते थे, वहीं वर्तमान समय में इस परंपरा का स्वरूप काफी बदल चुका है। अब आम श्रद्धालु कानूनी उलझनों से राहत पाने, अदालती मामलों और कचहरी के चक्करों से छुटकारा पाने की मनोकामना लेकर माता के दरबार में आते हैं। हालांकि, यह पूरी परंपरा और इससे जुड़ी कथाएं लोक मान्यताओं पर ही आधारित हैं। वक्त के साथ इस ऐतिहासिक मंदिर की व्यवस्थाओं और प्रथाओं में कई सकारात्मक सुधार भी देखने को मिले हैं। पहले के समय में मनोकामना पूरी हो जाने पर मंदिर परिसर में पशु बलि देने की कुप्रथा प्रचलित थी, जिसे मंदिर समिति ने पूरी तरह से प्रतिबंधित और समाप्त करवा दिया है। अब भक्तजन माता को श्रद्धा के साथ चूड़ी, बिंदी, मेहंदी और नारियल अर्पित करते हैं। इसके अलावा, माता को सुंदर वस्त्र अर्पित करने की परंपरा भी बहुत लोकप्रिय है।
नवरात्र के विशेष आयोजन और परिक्रमा
साल में आने वाले दोनों नवरात्र के अवसरों पर मंदिर में विशेष और भव्य पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान भक्त अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार मंदिर में ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करवाते हैं। इन दिनों पूरे मंदिर परिसर में अद्भुत आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है और दूर-दूर से लोग माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर के परिसर में परिक्रमा करने के लिए भी एक निर्धारित और विशेष स्थान बनाया गया है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, शरीर के विभिन्न हिस्सों जैसे हाथ, पैर, पीठ या सामान्य दर्द से परेशान कुछ श्रद्धालु गहरी आस्था के साथ इस स्थान की परिक्रमा करते हैं। स्थानीय लोगों का ऐसा विश्वास है कि इस प्रकार परिक्रमा करने से शारीरिक पीड़ाओं में काफी आराम मिलता है। इन सभी अनूठी और प्राचीन परंपराओं के कारण लोग अपनी समस्याओं के निदान और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस पावन स्थल पर खिंचे चले आते हैं।
प्राकृतिक सुंदरता और घना जंगल
धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं के अलावा इस मंदिर के आसपास का भौगोलिक परिवेश भी इसे बेहद खास बनाता है। मंदिर परिसर के चारों तरफ फैला हुआ घना जंगल और सागवान के बड़े-बड़े पेड़ इस पूरे क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति कड़े नियमों के चलते यहां पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह से सख्त पाबंदी लगाई गई है। इस तरह से देवाक माता मंदिर गहरी धार्मिक आस्था, पुरानी रोचक लोककथाओं और अद्भुत प्राकृतिक हरियाली का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो इसे प्रतापगढ़ जिले के नक्शे पर एक बिल्कुल अलग पहचान दिलाता है।

















