सफलता प्राप्त करने के लिए किसी बड़े पारिवारिक बैकग्राउंड की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सही दिशा और खुद पर अटूट विश्वास होना सबसे महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में स्थित 50 परिवारों वाले एक छोटे से कृषि प्रधान गांव के रहने वाले शैलेश शिंदे ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। वह अपने 50 सदस्यों वाले बड़े कुनबे में उच्च शिक्षा पूरी करने वाले पहले व्यक्ति बने हैं। शैलेश के पिता एक साधारण किसान हैं और मां घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ खेती-किसानी के काम संभालती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए उनके दो बड़े भाइयों ने 10वीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी थी। इन कठिन परिस्थितियों के बीच शैलेश ने अपनी लगन और मेहनत से सफलता की नई कहानी लिखी है।
शैक्षणिक रिकॉर्ड और शुरुआती करियर का असमंजस
शैलेश बचपन से ही पढ़ाई में काफी होनहार रहे। उन्होंने अपनी 10वीं की बोर्ड परीक्षा में 84.40 प्रतिशत और 12वीं साइंस में 67.83 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। इसके बाद उन्होंने स्नातक स्तर पर BCA की डिग्री हासिल की, जिसमें उन्हें 8.31 CGPA मिला। कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिग्री होने के बावजूद शैलेश को सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट या कोडिंग का काम पसंद नहीं आता था। पिता की इच्छा थी कि वह एक सुरक्षित सरकारी नौकरी प्राप्त करें, इसलिए शैलेश ने बैंकिंग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। हालांकि, लगातार बढ़ते कॉम्पिटीशन और सीमित भर्तियों के कारण उन्हें बार-बार निराशा हाथ लगी, जिससे उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगा।
एक गूगल सर्च ने खोला सफलता का नया द्वार
बैंकिंग परीक्षाओं में मनमुताबिक सफलता न मिलने और कोडिंग से दूरी बनाए रखने के बावजूद शैलेश ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने लिए नए विकल्प तलाशने का फैसला किया और गूगल पर सर्च किया, "Career options after BCA without coding" (BCA के बाद बिना कोडिंग के करियर विकल्प)। इस एक ऑनलाइन सर्च ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। इसी दौरान उन्हें डिजिटल मार्केटिंग क्षेत्र की संभावनाओं और क्राफ्टशाला के 'मार्केटिंग लॉन्चपैड' प्रोग्राम के बारे में पता चला। बिना कोडिंग वाले इस व्यावहारिक क्षेत्र में करियर बनाने का विचार उन्हें काफी पसंद आया और उन्होंने इसी दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
नांदेड़ शहर में 6 महीने का कठिन संघर्ष
डिजिटल मार्केटिंग के इस कोर्स में प्रवेश लेना शैलेश के लिए आसान नहीं था, क्योंकि उनका परिवार पहले ही प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग पर काफी पैसे खर्च कर चुका था। इसके बावजूद शैलेश के पिता और मामा ने उन पर पूरा भरोसा जताया और उनकी आगे की पढ़ाई का इंतजाम किया। गांव में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने के कारण ऑनलाइन क्लासेस लेना संभव नहीं था। इसलिए शैलेश ने अपने गांव से निकलकर नांदेड़ शहर में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। लगातार 6 महीनों तक वे वहां अकेले रहे, खुद खाना बनाया, दिनभर पढ़ाई की और शाम को रिवीजन किया। हिंदी और मराठी भाषी पृष्ठभूमि से आने के कारण उन्होंने अपनी इंग्लिश और कम्यूनिकेशन स्किल्स को सुधारने के लिए भी दिन-रात मेहनत की।
पहले ही इंटरव्यू में पाई सफलता और मुंबई का सफर
क्राफ्टशाला के माध्यम से गूगल ऐड्स, मेटा ऐड्स, प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स और इंटरव्यू की तैयारी ने शैलेश के आत्मविश्वास को बहुत बढ़ा दिया। इस कड़ी मेहनत का सकारात्मक परिणाम तब मिला जब उन्होंने अपने करियर का पहला ही इंटरव्यू क्रैक कर लिया। उनका चयन पब्लिसिस मीडिया में ट्रेनी एनालिस्ट के पद पर हो गया। जब शैलेश अपनी कंपनी का ऑफिशियल ऑफर लेटर लेकर गांव पहुंचे, तो उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। अब शैलेश अपने पैतृक गांव से लगभग 700 किलोमीटर दूर मुंबई शहर में अपनी पहली कॉर्पोरेट जॉब शुरू करने जा रहे हैं, जिसने उनके गांव के अन्य युवाओं को भी आगे बढ़ने की नई प्रेरणा दी है।



















