तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के ऐतिहासिक पुराने शहर स्थित मीर चौक इलाके में निवास करने वाला चौहान कुनबा आज समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। इस परिवार के 11 से अधिक सदस्य एक दुर्लभ जेनेटिक स्थिति के साथ अपनी दिनचर्या बिताते हैं, जिसे चिकित्सा विशेषज्ञ एकोंड्रोप्लेसिया कहते हैं। यह स्थिति शारीरिक हड्डियों के सामान्य विकास को रोक देती है। इसके बावजूद, परिवार के सदस्यों ने अपनी इस शारीरिक बनावट को कभी अपनी लाचारी या बाधा नहीं बनने दिया और दृढ़ संकल्प के साथ जीवन में आगे बढ़ रहे हैं।
सामाजिक उपेक्षा और दैनिक जीवन के व्यावहारिक संघर्ष
परिवार के मुख्य अभिभावक राम राज चौहान और उनके भाइयों सहित पूरा कुनबा जब भी घर से बाहर निकलता है, तो उन्हें कई तरह की सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आम बाजारों या सार्वजनिक स्थलों पर लोग अक्सर उन्हें कौतूहल और अचरज की नजरों से देखते हैं। कई मौकों पर लोगों की तरफ से अनचाही टिप्पणियां भी सुनने को मिलती हैं। इसके अलावा, बस या सार्वजनिक परिवहन साधनों का इस्तेमाल करते समय भी उन्हें ढांचे से जुड़ी व्यावहारिक असुविधाएं झेलनी पड़ती हैं। हालांकि, इन सब नकारात्मक परिस्थितियों के बाद भी परिवार ने निराश होने के बजाय सकारात्मक सोच अपनाकर खुशहाल जीवन जीने का तरीका तलाश लिया है।
आत्मनिर्भरता की राह पर किराना दुकान और मांगलिक कार्य
इस परिवार का सबसे सशक्त पहलू किसी की दया, दान या सहानुभूति पर आश्रित न होना है। परिवार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार काम में योगदान देता है। घर की आजीविका चलाने के लिए परिवार एक किराना दुकान का संचालन करता है, जिसकी कमान नई पीढ़ी के युवा बड़ी कुशलता से संभाल रहे हैं। इसके साथ ही, राम राज चौहान विवाह समारोहों और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आने वाले मेहमानों के स्वागत की जिम्मेदारी निभाकर सम्मानजनक कमाई करते हैं। घर की महिलाएं भी घरेलू जिम्मेदारियों, भोजन पकाने और दुकान के कामकाज में बराबर का सहयोग देती हैं।
सहानुभूति की जगह समानता और स्वाभिमान का संदेश
चौहान परिवार का स्पष्ट मानना है कि उन्हें लोगों की बेजा सहानुभूति नहीं चाहिए, बल्कि वे समाज में बराबरी और सम्मान का अधिकार चाहते हैं। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामे रखना और चेहरे पर मुस्कान बनाए रखना ही इस परिवार की पहचान है। उनकी यह जीवनशैली यह साबित करती है कि इंसान की शारीरिक सीमाएं उसके बुलंद इरादों, कड़ी मेहनत और स्वाभिमान के आड़े कभी नहीं आ सकतीं।



















