उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित इटियाथोक विकासखंड के एक किसान ने यह साबित कर दिखाया है कि खेती में सफलता हासिल करने के लिए ऊंची डिग्री से ज्यादा सही रणनीति, कड़ी मेहनत और सही समय पर सही फैसले लेना जरूरी होता है। केवल कक्षा एक तक शिक्षित किसान जोत नारायण ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों से आगे बढ़ते हुए सब्जी उत्पादन की राह चुनी। आज वे मचान तकनीक का इस्तेमाल करके लौकी की उन्नत खेती कर रहे हैं और रोजाना बेहतरीन मुनाफा कमा रहे हैं।
पारंपरिक फसलों से सब्जी उत्पादन की ओर बदलाव
बचपन से ही कृषि कार्यों में गहरी रुचि रखने वाले जोत नारायण ने अपनी शुरुआती पढ़ाई छूट जाने के बाद खेती-किसानी को ही अपने जीवन का मुख्य आधार बना लिया था। शुरुआती दौर में वे अन्य आम किसानों की तरह गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों की ही पैदावार करते थे। हालांकि, पारंपरिक खेती में सीमित बचत को देखते हुए उन्होंने अपनी कृषि कार्यशैली में बदलाव करने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने सब्जियों की खेती पर ध्यान केंद्रित किया और विशेष रूप से लौकी की फसल उगाने का प्रयोग शुरू किया।
डेढ़ बीघा खेत में मचान विधि का कमाल
वर्तमान समय में जोत नारायण लगभग एक से डेढ़ बीघा जमीन पर मचान विधि के जरिए लौकी की खेती कर रहे हैं। इस आधुनिक कृषि तकनीक में बांस और तारों के सहारे एक मजबूत मचान ढांचा तैयार किया जाता है, जिस पर लौकी की बेलें ऊपर की ओर चढ़ती हैं। बेलों के जमीन पर न फैलने के कारण फल मिट्टी और नमी के सीधे संपर्क में नहीं आते, जिससे फसल की गुणवत्ता बनी रहती है और फल सड़ने या खराब होने से बच जाते हैं। इस व्यवस्था के चलते पौधों की देखभाल, सिंचाई और फलों की तुड़ाई का काम भी बेहद आसान हो जाता है।
लागत, कमाई और समय चक्र का गणित
लौकी की खेती में लगने वाले खर्च और उससे मिलने वाले रिटर्न के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। एक से डेढ़ बीघा क्षेत्र में मचान ढांचे के निर्माण, बीज, खाद और शुरुआती देखभाल को मिलाकर कुल लागत लगभग 15,000 से 20,000 रुपये तक आती है। एक बार फसल तैयार हो जाने पर रोजाना करीब 1,000 से 2,000 रुपये तक की लौकी बाजार में बिक जाती है। हालांकि, बाजार में सब्जियों के भाव में उतार-चढ़ाव बना रहता है, इसलिए कुल दैनिक आमदनी मंडी के मौजूदा दामों पर निर्भर करती है।
तीन से चार महीने में तैयार होती है फसल
लौकी की यह फसल लगभग तीन से चार महीने की समय अवधि में पूरी तरह तैयार हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पौधों को सही समय पर पानी देना, उपयुक्त खाद का उपयोग करना, समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना और फसलों को विभिन्न कीटों व बीमारियों से सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि समय पर उचित देखभाल की जाए, तो प्रति बीघा लौकी का बंपर उत्पादन हासिल किया जा सकता है।
किसानों के लिए सफलता का मूलमंत्र
कृषि क्षेत्र में अपनी मेहनत से पहचान बनाने वाले जोत नारायण का मानना है कि खेती से बेहतर कमाई करने के लिए बाजार की मांग को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है। केवल पारंपरिक अनाज उगाने के बजाय अगर किसान सब्जियों की वैज्ञानिक और आधुनिक खेती अपनाते हैं, तो उनकी आमदनी में कई गुना इजाफा हो सकता है। कम पढ़ाई के बावजूद सही समय पर सही फसल का चुनाव और अनुभव के बल पर कृषि को एक अत्यधिक लाभदायक व्यवसाय में बदला जा सकता है।


















