बिहार के समस्तीपुर जिले में कृषि का परिदृश्य अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर अत्याधुनिक तकनीकों की ओर तेजी से बदल रहा है। पूसा-वैंनी रोड के समीप स्थित करीब 12 से 13 कट्ठा भूमि पर डॉ. राधेश्याम गुप्ता ने एक विशाल और आधुनिक मशरूम उत्पादन प्लांट का निर्माण किया है। बाहर के मौसम में आने वाले उतार-चढ़ाव का फसलों की पैदावार पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े, इसके लिए इस पूरी यूनिट में वातावरण नियंत्रित यानी एसी व्यवस्था लागू की गई है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पूंजी के साथ-साथ बैंकिंग प्रणाली का सहारा लिया और ईएमआई के जरिए वित्तीय संरचना तैयार की। वर्तमान समय में यह यूनिट न केवल हर महीने 2 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर 25 लोगों के लिए आजीविका का साधन भी बनी हुई है।
बैंक ऋण और ईएमआई के जरिए 2 करोड़ का इंफ्रास्ट्रक्चर
डॉ. राधेश्याम गुप्ता ने इस हाईटेक मशरूम प्लांट को आकार देने के लिए योजनाबद्ध वित्तीय रणनीति अपनाई। इस पूरे प्रोजेक्ट की स्थापना में लगभग 2 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत आई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतने बड़े स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर को केवल निजी बचत से खड़ा करना आसान नहीं था, इसलिए उन्होंने बैंक से लोन लिया और इसे मासिक ईएमआई भुगतान मॉडल पर व्यवस्थित किया। इस उद्यम को स्थापित करने में बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ सरकारी योजनाओं और सहयोग का भी लाभ उठाया गया।
नियंत्रित वातावरण वाली प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यहाँ उत्पादन मौसम की मार से पूरी तरह सुरक्षित रहता है। उत्तर भारत में प्रचंड गर्मी और भीषण ठंड के दौरान सामान्य खेती बाधित हो जाती है, लेकिन इस प्लांट में तापमान और नमी को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित किया जाता है। इससे साल के बारह महीने बिना किसी रुकावट के लगातार मशरूम की खेती और कटाई संभव हो पाती है।
कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की प्रेरणा और व्यावसायिक पृष्ठभूमि
इस आधुनिक कृषि व्यवसाय को शुरू करने की प्रेरणा डॉ. गुप्ता को अपने स्थानीय परिवेश से मिली। उनका निवास स्थान डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के पास स्थित है। इस प्रतिष्ठित संस्थान के कृषि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लगातार क्षेत्र के किसानों तथा युवाओं को पारंपरिक फसलों से हटकर आधुनिक कृषि तकनीकों और कृषि-व्यवसाय को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। विशेषज्ञों के इसी मार्गदर्शन और परामर्श ने उन्हें मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़े निवेश की दिशा दिखाई।
डॉ. राधेश्याम गुप्ता पहले से ही व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। वे क्षेत्र में एक पतंजलि स्टोर का भी सफल संचालन करते हैं। व्यावसायिक अनुभव होने के कारण उन्होंने कृषि को एक व्यवस्थित उद्योग के रूप में देखा और अपने मौजूदा व्यापारिक पोर्टफोलियो में मशरूम उत्पादन को एक नए स्तंभ के रूप में जोड़ा। सही बाज़ार समझ और प्रबंधन कौशल के कारण वे इस नए वेंचर को भी सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाने में कामयाब रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और साप्ताहिक उत्पादन क्षमता
डॉ. गुप्ता का यह मशरूम प्लांट केवल उनके निजी वित्तीय लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार को भी बड़ा संबल दिया है। इस प्लांट के संचालन से इलाके के लगभग 20 से 25 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं। इनमें से 12 से 13 कर्मचारी दैनिक आधार पर नियमित रूप से प्लांट की देखरेख, रखरखाव और कटाई के कार्यों में लगे रहते हैं।
उत्पादन क्षमता के मामले में भी यह यूनिट काफी मजबूत स्थिति में है। प्लांट से हर सप्ताह 4 क्विंटल से अधिक ताजे मशरूम की कटाई की जाती है। उत्पादित मशरूम को बेचने के लिए उन्हें किसी बड़ी मार्केटिंग चुनौती का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में मशरूम की लगातार भारी मांग बनी रहती है। मांग और आपूर्ति का बेहतर संतुलन होने के कारण पूरी उपज आसानी से खप जाती है।
मासिक शुद्ध मुनाफा और नए उद्यमियों के लिए संदेश
वित्तीय आंकड़ों की बात करें तो सभी परिचालन लागतों, कर्मचारियों के वेतन, बिजली बिल और बैंक ईएमआई के भुगतान के बाद भी यह प्लांट बेहतरीन रिटर्न दे रहा है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, सभी खर्चों की कटौती के बाद उनकी नियमित मासिक आय 1 से 1.5 लाख रुपये से अधिक रहती है, जो अनुकूल परिस्थितियों में 2 लाख रुपये प्रति माह से भी ऊपर पहुंच जाती है।
अपने अनुभव के आधार पर डॉ. राधेश्याम गुप्ता का मानना है कि यदि सही तकनीक और बाजार का सटीक आकलन किया जाए तो कृषि क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा, "मशरूम उत्पादन को योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो यह युवाओं और किसानों के लिए रोजगार व आमदनी का बेहतर विकल्प बन सकता है।" उनका यह सफल मॉडल साबित करता है कि आधुनिक सोच और बैंकिंग सहायता से कृषि को एक अत्यधिक लाभदायक उद्योग में बदला जा सकता है।



















