खेल की दुनिया में सच्ची लगन हमेशा आर्थिक तंगी और हर तरह के अभावों पर भारी पड़ती है। बिहार के सारण जिले से ताल्लुक रखने वाली एक युवा एथलीट ने इसे पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। नगरा प्रखंड के धोबवल गांव (काकन टोला) की रहने वाली सुहानी नाम की इस होनहार लड़की के पिता, हरेंद्र सिंह, दूसरे राज्य में स्थित एक तेल फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। वहीं दूसरी तरफ, उनकी बेटी आज पूरे देश में राज्य का परचम लहरा रही है। ट्रैक पर उतरते ही वह आठ लाख रुपये की हाई-टेक साइकिल की सवारी करती है। अभावों के बीच पली-बढ़ी इस खिलाड़ी का राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना यह बताता है कि अगर हौसला पक्का हो, तो कोई भी रुकावट आपका रास्ता नहीं रोक सकती।
बड़ी बहन को देखकर मिला लक्ष्य
किसी भी बड़े सफर की शुरुआत अक्सर एक छोटी सी घटना से होती है। सुहानी के मन में भी इस खेल को लेकर जुनून तब पैदा हुआ जब वह केवल सातवीं कक्षा की छात्रा थी। उस वक्त उनकी बड़ी बहन मंजू ने एक अहम रेस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पहला स्थान हासिल किया। जीत के बाद जब मंजू को इनाम के रूप में एक साइकिल दी गई, तो उस पल ने सुहानी के अंदर भी एक चैंपियन बनने का बीज बो दिया। उसी दिन से उन्होंने मन बना लिया कि वह भी साइकिलिंग की दिशा में ही आगे बढ़ेंगी। अपने इस बड़े सपने को सच करने के लिए उन्होंने जलालपुर हाई स्कूल में तैनात खेल शिक्षक प्रभातेश पांडे से संपर्क किया और उनके मार्गदर्शन में अपना कड़ा प्रशिक्षण शुरू कर दिया।
खासियतों से भरी है यह महंगी ट्रैक साइकिल
शुरुआत में बिना किसी प्रोफेशनल गियर के अभ्यास करना काफी मुश्किल काम था, जिसके कारण उनकी ट्रेनिंग में काफी दिक्कतें आती थीं। लेकिन जब बिहार सरकार की नजर उनकी शानदार खेल प्रतिभा पर पड़ी, तो मदद के हाथ आगे बढ़ाए गए। राज्य सरकार ने उनके हुनर को निखारने के लिए आठ लाख रुपये से ज्यादा की कीमत वाली ट्रैक साइकिल मुहैया कराई। यह मशीन किसी भी आम सवारी से बिल्कुल अलग है। इसका पहिया सामान्य साइकिलों के मुकाबले काफी बड़ा होता है, जो इसे तेज रफ्तार पकड़ने में मदद करता है। इसके ढांचे को बनाने में तांबा, पीतल, कांसा और एल्युमीनियम के एक खास मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। इसे आम सड़कों की जगह खास तौर पर तैयार किए गए ट्रैक, जिसे वेलोड्रोम कहा जाता है, उस पर ही चलाया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि हवा के भारी दबाव और तेज गति के बावजूद यह जरा भी डगमगाती नहीं है।
राष्ट्रीय पदकों से लेकर ओलंपिक तक का सफर
सही उपकरण और बेहतरीन कोचिंग मिलने के बाद इस युवा खिलाड़ी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह बिहार की इकलौती ऐसी महिला साइकिलिस्ट बन चुकी हैं, जिसने राष्ट्रीय स्तर के अलग-अलग मुकाबलों में स्वर्ण, रजत और कांस्य तीनों पदक अपने नाम किए हैं। एक छोटे से गांव से निकलकर नेशनल पोडियम तक पहुंचने की उनकी यह कहानी हर किसी के लिए एक बड़ी मिसाल है। उनके प्रशिक्षक प्रभातेश पांडे अपनी इस शिष्या की मेहनत और खेल के प्रति समर्पण से बेहद खुश हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि आने वाले समय में यह होनहार एथलीट ओलंपिक खेलों में भी हिस्सा लेगी और पूरे भारत के लिए पदक जीतकर देश का नाम रोशन करेगी।



















