ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद आजीविका जुटाना युवाओं के लिए अक्सर एक जटिल चुनौती बनकर उभरता है। आम तौर पर डिग्री पूरी होते ही अधिकांश लोग आजीविका की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख करने को विवश महसूस करते हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जनपद में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और बाजार की वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर उद्यम स्थापित करने की एक सकारात्मक पहल सामने आई है। मझहरिया गांव के निवासी कुश सिंह ने सीमित साधनों से शुरुआत कर यह प्रमाणित किया है कि सुनियोजित दृष्टिकोण और उद्यमिता की इच्छाशक्ति से अपने ही परिवेश में एक मजबूत आर्थिक आधार तैयार किया जा सकता है। कभी मामूली मासिक मानदेय पर काम करने वाले इस युवा का प्रयास आज केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर अन्य लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध करा रहा है।
सीमित मानदेय की नौकरी से कारोबारी बारीकियों तक का सफर
स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत कुश सिंह ने अपने गृह क्षेत्र के समीप पलिया स्थित एक निजी डेयरी प्रतिष्ठान में कार्य करना शुरू किया था। उस दौरान उन्हें प्रतिमाह लगभग दस हजार रुपये का पारिश्रमिक प्राप्त होता था। उन्होंने इस पद को केवल आजीविका निर्वहन का माध्यम नहीं माना, बल्कि संपूर्ण डेयरी तंत्र की व्यावहारिक कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के अवसर के रूप में लिया। दैनिक कामकाज के दौरान उन्होंने किसानों से दूध संग्रह करने के तौर-तरीकों, दूध की शुद्धता और गुणवत्ता के वैज्ञानिक मापदंडों, संरक्षण तकनीकों और बाजार में अंतिम उपभोक्ता की वास्तविक प्राथमिकताओं का प्रत्यक्ष विश्लेषण किया।
इसी व्यावहारिक अनुभव के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि डेयरी क्षेत्र का वास्तविक विस्तार केवल कच्चे दूध की खरीद और बिक्री तक सीमित नहीं है। कच्चे दूध के स्थान पर प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग बाजार में निरंतर बढ़ रही है और इसी मूल्य संवर्धन में सतत विकास की संभावनाएं निहित हैं। इस समझ ने उन्हें नौकरी की निश्चित परिधि से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से काम करने का संकल्प दिया।
सरकारी वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे का निर्माण
व्यावसायिक रूप से अपनी प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री युवा रोजगार सृजन कार्यक्रम का सहारा लिया। इस योजना के अंतर्गत उन्हें करीब पांच लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। इस पूंजीगत सहायता का उपयोग उन्होंने कार्यस्थल पर तकनीकी और शीतलीकरण अवसंरचना तैयार करने में किया। डेयरी व्यवसाय में कच्चे माल की ताजगी बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण पहलू होता है, जिसके लिए उन्होंने दूध के समुचित भंडारण, प्रशीतन और स्वच्छता से जुड़े आवश्यक उपकरण जुटाए।
व्यवसाय की शुरुआत में सबसे बड़ी व्यावहारिक बाधा स्थानीय पशुपालक किसानों का विश्वास अर्जित करना और निरंतर आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करना था। किसानों को समय पर भुगतान और पारदर्शी माप का भरोसा देकर उन्होंने इस गतिरोध को दूर किया। वर्तमान में उनकी इकाई में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग छह क्विंटल दूध का व्यवस्थित संग्रह किया जाता है।
तकनीकी एकीकरण और मूल्य संवर्धित उत्पादों पर ध्यान
संग्रहित कच्चे दूध को सीधे मंडी में बेचने की पारंपरिक व्यवस्था के विपरीत उन्होंने प्रसंस्करण को प्राथमिक रणनीति बनाया। इसके लिए उन्होंने लखनऊ और बुलंदशहर के तकनीकी बाजारों से खोया तैयार करने वाली दो विशेष मशीनें और सात प्रशीतक खरीदे। इन मशीनों के उपयोग से श्रम और समय की पर्याप्त बचत होने लगी, साथ ही तैयार उत्पाद की एकरूपता और स्वच्छता का स्तर भी काफी बेहतर हुआ।
मशीनीकृत व्यवस्था के सहयोग से खोया उत्पादन के अलावा पनीर, लस्सी और अन्य दुग्ध उत्पादों का नियमित निर्माण किया जाने लगा। इन सभी प्रसंस्कृत वस्तुओं की आपूर्ति नजदीकी नगरीय बाजारों में की जा रही है। कुश सिंह के अनुसार, आधुनिक उपकरणों की मदद से कम समय में उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद तैयार करना संभव हुआ है, जिससे लागत घटी है और शुद्ध मुनाफे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके साथ ही, स्थानीय युवकों को इस इकाई में नियमित आजीविका भी प्राप्त हो रही है।



















