उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में कृषि के क्षेत्र में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां युवा वर्ग अब केवल सरकारी या निजी नौकरियों के पीछे भागने के बजाय आधुनिक खेती को बेहतर विकल्प मान रहा है। पारंपरिक फसलों से हटकर सब्जियों और नगदी फसलों की खेती की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। इसी कड़ी में लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में परवल की पैदावार युवाओं के लिए एक बेहद आकर्षक और लाभप्रद जरिया बन चुकी है। वर्तमान समय में स्थानीय मंडियों में परवल का बाजार भाव लगभग 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है, जिससे सब्जी उत्पादकों की जेब में बेहतरीन मुनाफा आ रहा है।
कम लागत में बेहतर उत्पादन का जरिया
स्थानीय सब्जी मंडियों में परवल की मांग लगातार बनी रहती है। कम समय और सीमित लागत में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को नियमित आय का आधार प्रदान कर रही है। कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों के मुताबिक यदि सही समय पर सिंचाई की व्यवस्था की जाए, जैविक या रासायनिक खाद का उचित संतुलन रखा जाए और फसलों को कीट व रोगों से बचाने के लिए रोग प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए, तो परवल का प्रति बीघा उत्पादन काफी शानदार रहता है। धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में इसमें प्रति एकड़ बचत काफी अधिक होती है, जिसके कारण गांव देहात के नए किसान इस दिशा में अधिक रुचि दिखा रहे हैं।
नाना से मिली प्रेरणा और दो बीघा में मिली सफलता
इसी नए दौर की मिसाल हैं युवा किसान सचिन कुमार, जिन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेती को अपने जीवन का हिस्सा बनाया है। सचिन ने अपने खेत के लगभग दो बीघा हिस्से में परवल की व्यावसायिक खेती की शुरुआत की है। अपनी इस यात्रा के बारे में बताते हुए सचिन का कहना है कि उन्हें इस फसल को उगाने की शुरुआती समझ अपने नाना से मिली थी। बचपन से ही वे अपने नाना को खेतों में मेहनत करते और परवल की कटाई छंटाई करते देखते आ रहे थे। उसी सीख ने उनके मन में कृषि के प्रति गहरा लगाव पैदा किया और उन्होंने पढ़ाई जारी रखते हुए इस फसल को व्यावहारिक रूप से उगाने का फैसला किया।
नौकरी के भरोसे रहने के बजाय आधुनिक कृषि का रास्ता
सचिन कुमार का मानना है कि आज की पीढ़ी को केवल नौकरियों पर आश्रित रहने के बजाय कृषि क्षेत्र में उपलब्ध असीम संभावनाओं को तलाशना चाहिए। यदि खेती को आधुनिक तकनीकों, सही योजना और बाजार की मांग के अनुसार किया जाए, तो यह किसी भी कॉर्पोरेट नौकरी से बेहतर आय दे सकती है। दो बीघा जमीन से अच्छी कमाई हासिल करके सचिन ने यह साबित कर दिया है कि युवाओं के लिए खेती कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बेहद सफल और आत्मनिर्भर व्यवसाय बन सकती है। लखीमपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी यह पहल अन्य युवाओं को भी कृषि के प्रति प्रेरित कर रही है।



















