अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच एक बड़ी चुनौती रही है, जहाँ मरीजों को इलाज के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए नीदरलैंड के 23 छात्रों ने मिलकर एक अनूठा वाहन तैयार किया है, जिसे दुनिया की पहली सोलर एम्बुलेंस कहा जा रहा है। इस अनोखी गाड़ी का नाम स्टेला जुवा रखा गया है, जो किसी पारंपरिक एम्बुलेंस की तरह केवल मरीजों को ढोने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक चलता-फिरता अस्पताल है। अफ्रीका के कई दूरदराज इलाकों में आज भी बुनियादी बिजली और स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है, जिसके कारण छोटे क्लीनिकों में जीवन रक्षक दवाइयां और जरूरी मेडिकल उपकरण ठीक से काम नहीं कर पाते हैं।
धूप से चार्ज होती है स्टेला जुवा
स्टेला जुवा की सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊर्जा प्रणाली है, जो पूरी तरह सौर ऊर्जा पर निर्भर करती है। इस वाहन की छत पर सोलर पैनल लगाए गए हैं, जो गाड़ी के चलते रहने के दौरान भी बैटरी को चार्ज करते रहते हैं। इसके अलावा, जब यह एम्बुलेंस किसी स्थान पर रुकती है, तो इसके सोलर पैनल पंखों की तरह बाहर की ओर फैल जाते हैं, जिससे सूरज की रोशनी से दोगुनी मात्रा में बिजली पैदा होने लगती है। इस उन्नत तकनीक के कारण वाहन को संचालन के लिए पारंपरिक ईंधन या किसी बाहरी चार्जिंग स्टेशन पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
चलते-फिरते अस्पताल में आधुनिक सुविधाएं
इस सोलर एम्बुलेंस के भीतर मरीजों की जांच और उपचार के लिए कई आधुनिक मेडिकल उपकरण फिट किए गए हैं। स्टेला जुवा के अंदर एक्स-रे मशीन, अल्ट्रासाउंड यूनिट और टीकों को सुरक्षित तापमान पर ठंडा रखने के लिए विशेष फ्रिज जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। जिन इलाकों में बिजली की ग्रिड लाइनें या चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं पहुंचे हैं, वहां सूर्य की तेज धूप ही इस मोबाइल क्लीनिक की जीवन रेखा बनती है। इस महीने नीदरलैंड्स के इन 23 छात्रों की समर्पित टीम ने अमरेफ हेल्थ अफ्रीका के साथ साझेदारी करके केन्या की जमीन पर इस वाहन का कड़ा परीक्षण किया।
कठिन रास्तों पर हुआ सफल परीक्षण
केन्या में परीक्षण के दौरान छात्रों की टीम ने इस सोलर एम्बुलेंस को 800 किलोमीटर से अधिक की दूरी तक चलाया। इस लंबे सफर में धूल भरी पगडंडियां, कीचड़ से भरे रास्ते और बड़े-बड़े गड्ढों वाले चुनौतीपूर्ण मार्ग शामिल थे। छात्रों की यह टीम मोसिरो के एक ऐसे सुदूर स्वास्थ्य केंद्र तक भी पहुंची, जहां बिजली का नामोनिशान नहीं है और वहां तक पहुंचने के लिए कई घंटों तक खराब और कच्ची सड़कों पर वाहन चलाना पड़ा। इस कठिन यात्रा के दौरान जो परिणाम सामने आए, उन्होंने पूरी टीम को हैरान कर दिया और इसकी ऊर्जा दक्षता ने सभी का दिल जीत लिया।
ऊर्जा खपत से ज्यादा उत्पादन
परीक्षण के दौरान जब स्टेला जुवा को एक स्थान पर रोककर उसके सभी मेडिकल उपकरणों को एक साथ पूरी क्षमता से चलाया गया, तब भी सोलर पैनलों द्वारा उत्पन्न ऊर्जा वाहन की कुल खपत से अधिक रही। छात्रों का कहना है कि इससे यह साबित हो गया है कि यह सोलर एम्बुलेंस दुनिया के सबसे दूरदराज और कटे हुए इलाकों में भी बिना किसी पारंपरिक ईंधन और बिना चार्जिंग बुनियादी ढांचे के निरंतर काम कर सकती है। हालांकि, इस शुरुआती परीक्षण के चरण के दौरान वाहन में मरीजों पर चिकित्सीय उपकरणों का उपयोग नहीं किया गया था।
गर्भवती महिलाओं और जरूरतमंदों के लिए राहत
मोसिरो जैसे इलाकों में बिजली और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का सबसे बुरा असर आम नागरिकों और विशेषकर गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। इन क्षेत्रों में महिलाओं को अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी और बेहद जरूरी जांच कराने के लिए भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यदि इस तरह की उन्नत मेडिकल सुविधाओं से लैस सोलर एम्बुलेंस देश के सबसे पिछड़े और दूरदराज के इलाकों तक नियमित रूप से पहुंच सके, तो वहां के लाखों जरूरतमंदों को गंभीर बीमारियों और आपात स्थितियों में बहुत बड़ी राहत मिल सकती है।



















