आर्मेनिया की संसद में चुनावी वादे पर भिड़े नेता, लाइव प्रसारण के दौरान चले लात-घूंसे और फटे कपड़ेपलामू के किसान ने रीपर मशीन से बदली धान कटाई की तस्वीर, रोजाना 3000 रुपये तक की कमाईवैश्विक संकट की सुगबुगाहट के बीच पश्चिमी मुल्कों और एशिया में राशन जुटाने की होड़, 1000 दिनों की समयसीमा तयटाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में हरियाणा के सोनीपत से एक और संदिग्ध पकड़ा गया, कुल गिरफ्तारियां 12 हुईंऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी में बैंक की चूक पर ग्राहकों को पूरा हर्जाना मिले: शीर्ष अदालतपोकर सॉफ्टवेयर में सेंधमारी कर हाई-स्टेक्स खिलाड़ियों के पत्ते देख रहा था हैकर, लाखों डॉलर का खेल उजागरमछली बाजार में असली और ताजा केकड़ा चुनने का आसान तरीकाभागलपुर के 12वीं के छात्र प्रिंस का पंचक सिलाट में अंतरराष्ट्रीय चयन, 33 देशों के मुकाबले में उतरेंगेसीबीएसई 12वीं का री-इवैल्यूएशन पोर्टल फिर पड़ा ठप, तारीख बदलने के बाद भी अटकी मार्क्स वेरिफिकेशन प्रक्रियामहाराष्ट्र विधान परिषद नतीजों में महायुति पिछड़ी, 5 में से 3 सीटें जीतकर एमवीए का दबदबा
मौत की सटीक तारीख बताने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐप का सच और दीर्घायु का बाज़ारतकनीक
30 अक्तू॰ 2026, 2:45 am (26 मिनट पहले)· 0

मौत की सटीक तारीख बताने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐप का सच और दीर्घायु का बाज़ार

लंबी उम्र का वादा करने वाले नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐप अब खून की जांच और लाइफस्टाइल डेटा के आधार पर मौत की उम्र तय कर रहे हैं, लेकिन क्या यह तकनीक सेहत सुधार रही है या केवल इंसानी घबराहट को भुना रही है?

आधुनिक दौर में मोबाइल स्क्रीन पर जब एक मुस्कुराते हुए यमराज जैसी आकृति सामने आए और यह बताए कि जीवन की अंतिम तारीख कब है, तो यह किसी डरावने सपने या अजीबोगरीब डिजिटल तमाशे जैसा लग सकता है। एक नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐप ने ठीक यही तरीका अपनाया है। यह ऐप यूजर की मेडिकल आदतों, रोजमर्रा के खान-पान और जीवनशैली के ब्योरे को इकट्ठा करके उसकी अनुमानित जीवन प्रत्याशा की गणना करता है। स्क्रीन पर डोनट के आकार वाले तैरने वाले खिलौने पर आराम फरमाती और विक्ट्री का निशान बनाती आकृति के नीचे एक बड़ा अंक उभरता है, जो व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी सांसें किस उम्र में जाकर थम सकती हैं। जब किसी चालीस वर्षीय व्यक्ति के सामने 74 वर्ष की उम्र की सीमा रख दी जाए, तो यह बात स्वाभाविक रूप से मन में खलबली पैदा कर देती है, खासकर तब जब परिवार में बुजुर्गों के गुजरने के बाद जीवन के सीमित होने का एहसास गहरा चुका हो। उम्र बढ़ने के साथ पीठ, गर्दन और कूल्हों में दर्द का उभरना एक जैविक हकीकत है, लेकिन आधुनिक इंसान के मन में यह सवाल लगातार कौंध रहा है कि क्या तकनीक और पैसे के दम पर अपने लिए कुछ और साल खरीदे जा सकते हैं।

दीर्घायु का उभरता खरबों डॉलर का कारोबार

जीवन को लंबा खींचने की इंसानी सनक ने दुनिया भर में कई खरब डॉलर के दीर्घायु उद्योग को खड़ा कर दिया है। इस बाजार को ब्रायन जॉनसन जैसे प्रचारकों के दावों से भी काफी हवा मिली है। पर्यावरण संकट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विनाशकारी होने के डर ने अस्तित्व से जुड़े भय को और ज्यादा तीखा कर दिया है। इसी बीच, बड़े भाषा मॉडल यानी एलएलएम स्वास्थ्य से जुड़ी हर परेशानी का समाधान निजी स्तर पर खोजने का वादा कर रहे हैं। इस पूरी सोच का मूल आधार यह है कि यदि शरीर से जुड़ा पर्याप्त डेटा जुटा लिया जाए, तो एल्गोरिदम की मदद से मौत को चकमा दिया जा सकता है या कम से कम उसे काफी समय के लिए टाला जा सकता है। वर्ष 2030 तक इस दीर्घायु बाजार के 8 खरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पारंपरिक इलाजों की तुलना में पर्सनलाइज्ड एआई हेल्थ सर्विसेज के जरिए ज्यादा संचालित होगी।

ये भी पढ़ें

डिजिटल स्वास्थ्य के इस परिदृश्य में तरह-तरह के मंच सक्रिय हो चुके हैं। उदाहरण के तौर पर डॉक्ट्रोनिक नाम का मंच, जो नियमों का अनुपालन करते हुए एक निजी एआई डॉक्टर की तरह काम करता है, मरीजों को किसी मानव चिकित्सक के पास जाए बिना ही दवा की पर्ची दोबारा जारी करवाने की सुविधा देता है। इसके अलावा सुपरपावर और लाइफफोर्स जैसे ऐप मेंबरशिप के आधार पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और डॉक्टरों द्वारा जांची गई सलाह उपलब्ध कराते हैं। वहीं ट्विन हेल्थ नामक कंपनी किसी व्यक्ति के मेटाबॉलिज्म की डिजिटल एआई कॉपी बनाने का दावा करती है। यह तमाम प्रणालियां इंसान को कुछ और साल ज्यादा जीने में मदद करने का दावा तो करती हैं, लेकिन इसके पीछे की वास्तविक कार्यप्रणाली और इसकी कीमत को लेकर धुंधलका बना हुआ है।

डेथ क्लॉक का ढांचा और खून की जांच का गणित

साल 2024 में लॉन्च हुआ ऐप 'डेथ क्लॉक' इसी दौड़ का एक प्रमुख उदाहरण है। इसका घोषित मकसद लोगों की सेहत से जुड़ी आदतों पर नजर रखकर उनके जीवन को लंबा करना है। फरवरी में इस कंपनी ने एक नया फीचर पेश किया, जिसके तहत यूजर सीधे बायोमार्कर पैनल ऑर्डर कर सकते हैं। इसके 69 डॉलर के सब्सक्रिप्शन में एक बुनियादी ब्लड पैनल मिलता है, जिसमें कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर, सूजन, विटामिन डी, और रक्त व अंदरूनी अंगों की सेहत की जांच शामिल होती है। इसके अलावा नौ अतिरिक्त परीक्षण भी उपलब्ध कराए गए हैं, जो हार्मोन, सूक्ष्म पोषक तत्वों से लेकर थायरॉइड तक की जांच करते हैं। इन सभी अतिरिक्त जांचों की कुल लागत 780 डॉलर बैठती है। यूजर चाहें तो 29 डॉलर खर्च करके तनाव से जुड़ा विशेष परीक्षण भी अलग से जोड़ सकते हैं।

डेथ क्लॉक का दावा है कि वह केवल मौत का समय बताने वाली कोई खोखली तरकीब नहीं है, बल्कि उसके एल्गोरिदम को जीवन बीमा कंपनियों के बीमांकिक डेटा, जीवन प्रत्याशा तालिकाओं और 1,200 दीर्घायु अध्ययनों पर प्रशिक्षित किया गया है। यूजर के नतीजों के आधार पर यह सिस्टम एक विस्तृत रोकथाम योजना तैयार करता है, जिसका मकसद जीवन के बचे हुए पलों को बढ़ाना होता है। हालांकि, जब यूजर इस तरह के प्लेटफॉर्म पर अपनी जानकारी दर्ज करते हैं, तो अक्सर अनचाहे नतीजे सामने आते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई यूजर अपनी प्राथमिक प्रश्नावली भरता है, तो ऐप तुरंत मृत्यु के तीन संभावित कारण गिना देता है, जिनमें हृदय रोग, नींद से जुड़े विकार और कैंसर शामिल होते हैं, भले ही वह कैंसर के प्रकार का खुलासा न करे। यदि यूजर यह जोड़ दे कि उसके परिवार में डायबिटीज का हल्का इतिहास रहा है, तो ऐप फौरन जीवन प्रत्याशा को 74 से घटाकर 73 वर्ष कर देता है। केवल एक पारिवारिक इतिहास दर्ज करने से एक पूरा साल कम हो जाता है। कंपनी ने खून के नमूने लेने के लिए क्वेस्ट डायग्नोस्टिक्स जैसी दो प्रमुख प्रयोगशालाओं के साथ साझेदारी कर रखी है, जहां यूजर जाकर अपना ब्लड सैंपल देते हैं।

सीईओ का बयान और अमरता के भ्रम की हकीकत

अमरता के इन तमाम दावों के बीच खुद डेथ क्लॉक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ ब्रेंट फ्रैंसन का दृष्टिकोण काफी चौंकाने वाला है। ब्रेंट फ्रैंसन का कहना है कि जब कोई व्यक्ति कोई उत्पाद बेच रहा हो, तो अमरता की बात करना एक बेहद खतरनाक स्थिति है। उनका मानना है कि ब्रायन जॉनसन जैसे प्रचारक, जिनका नारा डोंट डाई किसी स्पोर्ट्स ब्रांड के खारिज किए गए विज्ञापन जैसा लगता है, लोगों को गुमराह कर रहे हैं। फ्रैंसन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि हम सभी मरने वाले हैं, सवाल सिर्फ इतना है कि यह कब होगा। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या हम वास्तव में स्वस्थ हो रहे हैं या सिर्फ अस्वस्थ होने को लेकर ज्यादा चिंतित हो रहे हैं, तो फ्रैंसन ने माना कि दोनों बातें सच हैं। उन्होंने कहा कि हर चीज को ट्रैक करने और नियंत्रित करने का यह जुनून अपने आप में एक बेहद अस्वस्थ आदत बन चुका है।

लेकिन विरोधाभास यह है कि खुद यह ऐप भी इसी नियंत्रण के जुनून को बढ़ावा देता है। जांच के नतीजे आने के बाद ऐप लगातार नए-नए काम सौंपता रहता है। जैसे विटामिन डी3 का स्तर बढ़ाना, हड्डियों के घनत्व की जांच के लिए डेक्सा स्कैन कराना, या किसी विशेषज्ञ के साथ प्रोस्टेट विशिष्ट एंटीजन स्क्रीनिंग पर चर्चा करना। हालांकि फ्रैंसन का यह दावा है कि वे अंततः डेथ क्लॉक को प्राथमिक देखभाल करने वाले डॉक्टरों के विकल्प के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि ऐप हर रिपोर्ट के बाद यूजर को किसी असली डॉक्टर के पास जाने की ही सलाह देता रहता है।

सांख्यिकी और चिकित्सा विशेषज्ञों के सवाल

वैज्ञानिक समुदाय इस तरह के एआई मृत्यु अनुमानों को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सांता बारबरा में सांख्यिकी और व्यावहारिक प्रायिकता के प्रोफेसर माइक लुडकोवस्की, जिनका शोध दीर्घायु विश्लेषण पर केंद्रित है, इस व्यवस्था की असलियत उजागर करते हैं। माइक लुडकोवस्की का कहना है कि मृत्यु के प्रति सचेत करने वाले यह प्लेटफॉर्म इस भ्रम को बेचते हैं कि व्यक्तिगत जीवनकाल एक सीधी रेखा जैसी प्रक्रिया है जिसे हैक किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के स्तर पर मृत्यु का कारण बनने वाले कारक मूल रूप से यादृच्छिक यानी पूरी तरह अप्रत्याशित होते हैं और उनका कभी भी सटीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।

इसी तरह वर्ष 2024 में 'एजिंग सेल' में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने भी इस बात पर जोर दिया था कि किसी एजिंग क्लॉक को किसी व्यक्ति की समग्र जैविक उम्र का अंतिम पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। विज्ञान यह साफ करता है कि जैविक प्रणालियां इतनी जटिल हैं कि उन्हें कुछ ब्लड टेस्ट और लाइफस्टाइल फॉर्मूलों में समेटकर अंतिम दिन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। आंकड़ों के खेल में इंसान को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने जीवन की हर सांस को नियंत्रित कर रहा है, जबकि असलियत में अनिश्चितता ही प्रकृति का नियम है।

मानसिक दबाव और उम्र बढ़ने को देखने का नजरिया

'योर सेकंड प्राइम: डज एजिंग सक, ऑर डू वी सक एट एजिंग?' की लेखिका और सेंटर फॉर डीपली ह्यूमन लीडरशिप की सह-संस्थापक ग्रेचेन टेरी-लियोनार्ड इस पूरे मामले के मनोवैज्ञानिक पहलू पर रोशनी डालती हैं। उनका संस्थान मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर एआई के प्रभावों का अध्ययन करता है। ग्रेचेन टेरी-लियोनार्ड के मुताबिक, समाज में यह गलत धारणा घर कर गई है कि अगर किसी चीज को मापा जा सकता है, तो उसका प्रबंधन भी किया जा सकता है। लेकिन मौत इस तरह काम नहीं करती। इसलिए यह नाप-जोख किसी स्वास्थ्य सुधार के बजाय डर को कम महसूस करने की जरूरत को पूरा करने लगती है।

टेरी-लियोनार्ड का मानना है कि केवल आंकड़े देखकर लोगों की मानसिकता और आदतें नहीं बदलतीं। लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि कौन सी चीजें नुकसानदेह हैं, फिर भी वे उन्हें करते हैं। मौत का ख्याल रखना इंसानी इतिहास की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है, लेकिन असली फर्क इस बात से पड़ता है कि क्या व्यक्ति के पास बदलाव करने की क्षमता और साधन मौजूद हैं। जब लोगों के पास बदलाव के संसाधन नहीं होते, तो उनकी चिंता अपनी सेहत सुधारने के बजाय अपने आत्म-सम्मान और भावनाओं को बचाने में खर्च होने लगती है। अपनी किताब के शोध के दौरान उन्होंने पाया कि जिन बुजुर्गों का उम्र बढ़ने के प्रति सकारात्मक नजरिया था, वे नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वालों की तुलना में औसतन साढ़े सात साल ज्यादा जिए। ऐसे में मौत की उल्टी गिनती दिखाने वाले ऐप लोगों को यह सिखाते हैं कि उम्र बढ़ना केवल एक नुकसान है, जिससे उम्र बढ़ने के बजाय घट सकती है।

दैनिक आंकड़ों का बोझ और जीवन का असली अर्थ

जब कोई व्यक्ति इस तरह के ऐप के प्रभाव में आता है, तो वह अपने शरीर के हर हिस्से का पहरेदार बन जाता है। टैक्स की समय सीमा से ठीक पहले हिसाब-किताब लगाने वाले मुनीम की तरह हर दिन की आदतों को दर्ज किया जाने लगता है। यदि कोई व्यक्ति एक दिन में तीस मिनट की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर ले, शराब से पूरी तरह परहेज करे, दांतों को ब्रश और फ्लॉस करे, भरपूर नींद ले, सौना बाथ ले और आठ गिलास से अधिक पानी पी ले, तो ऐप के पैमाने पर वह अपने जीवन में 5.8 साल और जोड़ सकता है। लेकिन इस कृत्रिम बढ़त के बावजूद उल्टी गिनती की टिक-टिक कभी बंद नहीं होती। समय एक ऐसा बोझ बन जाता है जिसे हर पल बेहतर बनाने का दबाव रहता है।

नियंत्रण पाने की यह भूख इंसान को उसी चीज का गुलाम बना देती है जिससे वह भागने की कोशिश कर रहा होता है। डर को शांत करने के बजाय यह तकनीकी उपकरण चिंता को कई गुना बढ़ा देते हैं। जीवन की खूबसूरती इस बात में नहीं है कि इंसान कितने साल जीता है, बल्कि इस बात में है कि वह उन पलों को किन लोगों के साथ बिताता है। जिंदगी को केवल आंकड़ों और एल्गोरीदम के जरिए लंबा खींचने की कोशिश करने के बजाय दोस्तों, परिवार और अपनों के साथ साझा किए गए पलों को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा स्वास्थ्य लाभ है। फोन पर मौत की चेतावनी देने वाली सूचनाओं को शांत कर देना और किसी दोस्त को शाम को मिलने का संदेश भेजना शायद इन तमाम जटिल परीक्षणों से कहीं ज्यादा सुकून देने वाला कदम साबित होता है।

सवाल-जवाब

डेथ क्लॉक ऐप किस आधार पर जीवन प्रत्याशा की गणना करता है?
यह ऐप यूजर की जीवनशैली की आदतों, प्रश्नावली, मेडिकल इतिहास, 1,200 अध्ययनों और जीवन बीमा कंपनियों के डेटा के आधार पर गणना करता है।
डेथ क्लॉक पर बुनियादी और अतिरिक्त ब्लड टेस्ट की कीमत क्या है?
ऐप का बुनियादी ब्लड पैनल 69 डॉलर के सब्सक्रिप्शन में आता है, जबकि नौ अतिरिक्त विशेष टेस्ट्स की कुल लागत 780 डॉलर है।
सांख्यिकी विशेषज्ञ एआई द्वारा मौत का अनुमान लगाने के बारे में क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति की मौत के कारण पूरी तरह यादृच्छिक होते हैं और व्यक्तिगत जीवनकाल को किसी सीधी रेखा की तरह हैक या पूर्वानुमानित नहीं किया जा सकता।
उम्र बढ़ने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने का जीवन पर क्या असर देखा गया है?
अध्ययनों के अनुसार उम्र बढ़ने के प्रति सकारात्मक नजरिया रखने वाले बुजुर्ग नकारात्मक सोच रखने वालों की तुलना में औसतन साढ़े सात साल अधिक जीते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp