आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की आधुनिक तकनीकों के सहारे तैयार होने वाले फर्जी ऑडियो और वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक अनोखा कानूनी कदम उठाया है। उन्होंने अपनी मूल आवाज का बौद्धिक संपदा अधिकार हासिल करने के लिए यूरोपीय यूनियन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस में औपचारिक अर्जी दाखिल की है। इस आवेदन का मुख्य उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा बिना अनुमति उनकी आवाज की क्लोनिंग करके फर्जी सामग्री तैयार करने पर कानूनी रोक लगाना है।
डिजिटल तकनीकों के इस दौर में डीपफेक का खतरा वैश्विक स्तर पर बेहद संवेदनशील विषय बन चुका है। आधुनिक सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम की सहायता से किसी भी व्यक्ति के चेहरे, हावभाव अथवा आवाज की ऐसी हूबहू नकल तैयार की जा सकती है, जिसे पहली नजर में पहचानना सामान्य व्यक्ति के लिए लगभग नामुमकिन हो जाता है। ऐसे में किसी प्रमुख देश के राष्ट्राध्यक्ष द्वारा उठाया गया यह कदम आवाज की पहचान और डिजिटल सुरक्षा के प्रति बढ़ती चिंताओं को सामने लाता है।
डीपफेक तकनीक की कार्यप्रणाली और उसकी आसान पहुंच
डीपफेक शब्द की उत्पत्ति मूल रूप से डीप लर्निंग तकनीक से हुई है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एक प्रमुख हिस्सा है। इस प्रक्रिया में कंप्यूटर सिस्टम और न्यूरल नेटवर्क को लाखों तस्वीरों, वीडियो फुटेज और आवाज के ऑडियो नमूनों का अध्ययन कराकर प्रशिक्षित किया जाता है। एक बार जब सिस्टम उस व्यक्ति के बोलने के तरीके, उतार-चढ़ाव और चेहरे के भावों के पैटर्न को समझ लेता है, तो वह बिल्कुल नए संदर्भ में नकली वीडियो या ऑडियो क्लिप तैयार कर देता है।
ऑडियो के मामले में वॉयस क्लोनिंग तकनीक काम करती है, जबकि वीडियो निर्माण में फेस स्वैपिंग और लिप-सिंक जैसी तकनीकों का सहारा लिया जाता है। पहले इस प्रकार की सामग्री के निर्माण के लिए भारी भरकम बजट, महंगे कंप्यूटर और अत्यधिक प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती थी। हालांकि अब इंटरनेट पर मौजूद कई टूल्स और मुफ्त ऐप्लिकेशंस की वजह से यह बेहद सुलभ हो चुका है। मौजूदा दौर में केवल 3 सेकंड की वास्तविक आवाज की रिकॉर्डिंग और लगभग 30 यूरो के मामूली खर्च से ऐसा ऑडियो डीपफेक तैयार किया जा सकता है, जिस पर 70 प्रतिशत आम लोग आसानी से भरोसा कर लेते हैं। इसी तकनीक का गलत इस्तेमाल करके किसी राजनेता की संक्षिप्त आवाज से पूरा फर्जी भाषण या गीत तैयार कराया जा सकता है, अथवा किसी भी व्यक्ति का चेहरा दूसरे शरीर पर जोड़ दिया जाता है।
जॉर्जिया मेलोनी के पूर्व अनुभव और ट्रेडमार्क के कानूनी प्रावधान
इटली की प्रधानमंत्री स्वयं पहले भी इस तरह के डिजिटल अपराधों का सामना कर चुकी हैं। पूर्व में उनकी तस्वीरों के साथ डिजिटल छेड़छाड़ की गई थी और उन्हें आपत्तिजनक रूप से अंडरवियर में दिखाया गया था, जिस घटना ने व्यापक राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दिया था। अपनी आत्मकथा 'Io sono Giorgia' के जरिए अपनी पहचान को मजबूती से रेखांकित करने वाली मेलोनी ने अब आवाज की सुरक्षा का रास्ता चुना है।
ट्रेडमार्क कार्यालय में दाखिल किए गए आवेदन के साथ उन्होंने 4 सेकंड का एक आधिकारिक ऑडियो नमूना सौंपा है, जिसमें वह दो बार अंग्रेजी में 'I am Giorgia Meloni' कहती सुनाई देती हैं। यदि यूरोपीय संस्था द्वारा इस ट्रेडमार्क आवेदन को स्वीकृति मिल जाती है, तो मेलोनी को पूरे यूरोप के दायरे में अपनी आवाज का एक्सक्लूसिव कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाएगा। ऐसा होने पर उनकी सहमति के बिना कोई भी उनकी आवाज का व्यावसायिक या सार्वजनिक इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। यह बौद्धिक संपदा अधिकार आरंभिक तौर पर 10 साल की अवधि के लिए दिया जाता है, जिसे अवधि समाप्त होने के बाद नवीनीकृत कराना होता है।
वैश्विक स्तर और भारत में वॉयस क्लोनिंग के खतरे
कैस्पर्स्की के आंकड़ों के अनुसार, आधुनिक तकनीकों की वजह से आवाज की क्लोनिंग से जुड़े अपराधों में भारी वृद्धि दर्ज की जा रही है। इनका इस्तेमाल समाज में भ्रामक अफवाहें फैलाने, चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने, राजनीतिक नुकसान पहुंचाने, ब्लैकमेल करने और वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए किया जाता है। भारत में भी इसका प्रभाव देखा गया, जहां 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नेता राहुल गांधी और अभिनेता अमिताभ बच्चन के डीपफेक वीडियो व्यापक रूप से वॉट्सऐप, टिकटॉक और एक्स पर प्रसारित हुए थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारतीय चुनाव आयोग को इन फर्जी वीडियो के विरुद्ध आधिकारिक एडवाइजरी जारी करने के लिए विवश होना पड़ा था।
पहचान की सुरक्षा के लिए कानूनी कदम उठाने वाली मेलोनी अकेली शख्सियत नहीं हैं। इटली में ही मशहूर गायिका गिउसी फेररी और प्रसिद्ध अभिनेता लुका वार्ड ने भी अपनी-अपनी आवाज का आधिकारिक ट्रेडमार्क प्राप्त किया है। यह रुझान दर्शाता है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े कलाकार और राजनेता अपनी पहचान के दुरुपयोग से बचने के लिए बौद्धिक संपदा कानूनों का सहारा लेने लगे हैं।
डिजिटल युग में पहचान और जागरूकता की चुनौती
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की आसान पहुंच ने जहां कई काम आसान बनाए हैं, वहीं इससे समाज में सूचनाओं की प्रामाणिकता को लेकर गहरा अविश्वास भी पनपने लगा है। आम लोग अब यह तय करने में भ्रमित होने लगे हैं कि सोशल मीडिया पर दिखाई या सुनाई देने वाली सामग्री वास्तविक है अथवा कंप्यूटर द्वारा गढ़ी गई है। यद्यपि ट्रेडमार्क जैसे कानूनी कदम व्यक्तियों को एक हद तक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं, लेकिन इस समस्या के पूर्ण समाधान के लिए मजबूत डिटेक्शन टूल्स, सख्त कानूनी दंड और जनसामान्य में सतर्कता का होना भी अनिवार्य है। वर्तमान डिजिटल परिवेश में किसी व्यक्ति की आवाज और चेहरे की रक्षा उतनी ही अहम हो चुकी है जितनी उसके आधिकारिक पहचान पत्र जैसे पासपोर्ट या आधार कार्ड की होती है।



















