ऐतिहासिक इमारतों और पुरानी विरासतों के शहर हैदराबाद में चारमीनार और गोलकुंडा किला अपनी भव्यता के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। लेकिन इसी शहर के पुराने हिस्से के करीब बालापुर के रौशन-उद-दौला इलाके में 16वीं और 17वीं सदी की कुछ ऐसी ऐतिहासिक संरचनाएं भी मौजूद हैं, जो प्रशासनिक उदासीनता और उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ये प्राचीन इमारतें कुतुब शाही काल के दो प्रख्यात सूफी संतों भाले शाह और भोले शाह के मकबरे हैं, जो समय के साथ अब खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं।
इतिहास में दर्ज है इन सूफी संतों का विशेष स्थान
इतिहासकार शाहिद उमेर के अनुसार ये दोनों सूफी संत कुतुब शाही शासनकाल के दौरान हैदराबाद में निवास करते थे। उस समय के शाही नियमों और परंपराओं के मुताबिक आमतौर पर सुल्तानों और राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाले विशिष्ट लोगों को गोलकुंडा के शाही कब्रिस्तानों में ही सुपुर्द-ए-खाक किया जाता था। हालांकि, इन दोनों सूफी संतों ने मुख्य शाही मकबरों की चमक-दमक से दूर बालापुर की इस शांत और एकांत जगह पर अंतिम विश्राम के लिए स्थान चुनना पसंद किया था, जो उनके सरल जीवन और अध्यात्म से जुड़े होने की मिसाल पेश करता है।
दकनी और कुतुब शाही वास्तुकला का बेजोड़ नमूना
वास्तुकला और स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से ये दोनों मकबरे कुतुब शाही और दकनी शैली का एक बेहतरीन और अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इनमें से एक मकबरा दो मंजिला ढांचे के रूप में खड़ा है, जिसका गुंबद और मेहराबें गोलकुंडा में स्थित सुल्तान जमशेद क़ुली क़ुतुब शाह के मकबरे की बनावट से काफी हद तक मेल खाती हैं। इन ऐतिहासिक संरचनाओं के निर्माण में की गई बारीक प्लास्टर नक्काशी, सुंदर आर्च डिजाइन और मजबूत गुंबद उस दौर के दकनी कारीगरों की उच्च कला और शिल्प कौशल की कहानी बयां करते हैं।
सैकड़ों साल पुरानी इस अनमोल विरासत की मौजूदा हालत बेहद दयनीय और चिंताजनक बनी हुई है। लंबे समय से किसी भी तरह के संरक्षण, मरम्मत या देखभाल के अभाव में ये मकबरे काफी जर्जर स्थिति में पहुंच चुके हैं। स्थानीय स्तर पर असामाजिक तत्वों द्वारा पहुंचाई गई क्षति और तोड़फोड़ के कारण इन मकबरों के भीतर स्थित मूल कब्रों के निशान और उनके हेडस्टोन्स बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इसके अलावा, दीवारों पर किया गया प्राचीन प्लास्टर जगह-जगह से उखड़ रहा है और विशाल गुंबदों के ऊपर जंगली घास-फूंस उग आई है, जिससे ढांचा लगातार कमजोर हो रहा है।
संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग और वक्फ बोर्ड से उम्मीदें
क्षेत्र के स्थानीय निवासियों और पुरानी विरासतों को बचाने की मुहिम से जुड़े प्रेमियों का कहना है कि यदि पुरातत्व विभाग और वक्फ बोर्ड ने अब भी संज्ञान लेते हुए इन मकबरों के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार पर ध्यान नहीं दिया, तो कुतुब शाही काल का यह अहम ऐतिहासिक अध्याय हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिट जाएगा। हैदराबाद की समृद्ध और साझा गंगा-जमुनी तहजीब तथा उसकी अनूठी वास्तुकला को भावी पीढ़ियों के लिए संजोए रखने के वास्ते इन प्राचीन मकबरों का तत्काल संरक्षण किया जाना बेहद जरूरी है।



















