हैदराबाद के व्यस्त खैरताबाद इलाके में पेड़ों के झुरमुट के बीच स्थित बेला विस्टा इमारत अपने सीने में लगभग सवा सौ वर्षों का समृद्ध और उथल-पुथल भरा इतिहास समेटे हुए है। किसी ज़माने में जहां भव्य शाही महफिलें सजती थीं, पश्चिमी धुनों पर नृत्य होते थे और राजसी शानो-शौकत बिखरी रहती थी, वही परिसर आज भारत के शीर्ष सिविल सेवकों और नीति निर्धारकों को प्रशासनिक गुर सिखाने वाले केंद्र के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है।
न्यायाधीश के आवास से निज़ाम की मिल्कियत बनने का सफर
इंडो-यूरोपीय वास्तुकला की अनूठी मिसाल पेश करने वाले इस महल का निर्माण साल 1905 में पूरा हुआ था। इतिहासकार शमीम खान के हवाले से सामने आए विवरणों के मुताबिक, हैदराबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मुसलेहुद्दीन मोहम्मद ने 9.5 एकड़ में फैले विशाल भूखंड पर यह रिहाइश तैयार करवाई थी। शुरुआती दौर में इस इमारत की ऊपरी बालकनी से हुसैनसागर झील का विहंगम और खूबसूरत दृश्य दिखाई पड़ता था। समय बीतने के साथ 1917 में सातवें निज़ाम ने 60,000 रुपये की कीमत चुकाकर इस पूरी संपत्ति को खरीद लिया। इसके बाद 1922 में परिसर का व्यापक नवीनीकरण कराया गया, जिसके बाद यह निज़ाम के बड़े बेटे राजकुमार आज़म जाह और उनकी पत्नी राजकुमारी दुरु शहवार का आधिकारिक आशियाना बन गया।
शाही विलासिता, खेल और पारिवारिक अंतर्कलह
राजकुमारी दुरु शहवार के आगमन के बाद बेला विस्टा आधुनिक ठाठ-बाट और पश्चिमी जीवनशैली का प्रमुख केंद्र बन गया था। खेल और तैराकी की शौकीन राजकुमारी के लिए परिसर के भीतर एक बड़ा खुला स्विमिंग पूल और दो टेनिस कोर्ट तैयार किए गए। वहीं दूसरी ओर, पानी से खौफ खाने वाले राजकुमार आज़म जाह के लिए अलग से एक छोटा बेबी पूल बनवाया गया था। महल के भीतर दो फीट की मोटी दीवारें, गगनचुंबी छतें और लकड़ी के खूबसूरत पारकेट फर्श लगाए गए थे, जहां विदेशी संगीत की धुनों पर शानदार दावतें आयोजित होती थीं। हालांकि यह बाहरी चकाचौंध लंबे समय तक टिक नहीं सकी। राजकुमार की फिजूलखर्ची की आदतें, उन पर बढ़ता भारी कर्ज और आपसी रिश्तों में आई दरार के चलते राजकुमारी दुरु शहवार ने आखिरकार इस महल को अलविदा कह दिया और अपने बच्चों को साथ लेकर इंग्लैंड चली गईं।
1956 में प्रशासनिक कॉलेज में तब्दील हुई इमारत
साल 1948 में हैदराबाद रियासत का भारतीय संघ में विलय होने के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर का स्वरूप भी बदलने लगा। वर्ष 1956 में इस परिसर को प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय (एएससीआई) के रूप में पुनर्गठित किया गया। आज इस 120 साल पुराने प्रतिष्ठित ठिकाने पर देश-विदेश के आला प्रशासनिक अधिकारी और कॉरपोरेट जगत के दिग्गज नीतियां बनाने का हुनर सीखते हैं। आईएनटीएसीएच (इंटेक) हेरिटेज अवॉर्ड से नवाजा गया यह संस्थान आज भी अपनी कुछ पुरानी परंपराओं को संजोए हुए है, जिनमें इन-हाउस तैयार की जाने वाली खास आइसक्रीम, ताजी बेक की गई ब्रेड और संलग्न बार जैसी नवाबी आतिथ्य सत्कार की झलकियां शामिल हैं।



















