हैदराबाद शहर के करीब फैली ओस्मान सागर झील, जिसे लोग गंडीपेट झील के नाम से भी पुकारते हैं, सिर्फ अपनी हरियाली और शांत पानी के लिए नहीं बल्कि झील किनारे खड़े सागर महल के लिए भी मशहूर है. यूरोपीय अंदाज़ में बना यह छोटा किलेनुमा बुर्ज और उसका वॉचटॉवर आज भी हैदराबाद के निज़ामी दौर की कहानी सुनाता है.
बाढ़ ने बदल दी शहर की योजना
साल 1908 में मूसी नदी में आई भयानक बाढ़ ने हैदराबाद शहर को बुरी तरह हिला दिया था. इस तबाही के बाद शहर को दोबारा बाढ़ की मार से बचाने और लोगों तक साफ पीने का पानी पहुंचाने की जरूरत महसूस हुई. हैदराबाद के सातवें और आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने इसके लिए बड़ा कदम उठाया. उन्होंने मशहूर इंजीनियर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की निगरानी में मूसी नदी पर एक बांध बनवाने का फैसला किया. यही बांध आगे चलकर ओस्मान सागर के नाम से जाना गया और करीब साल 1920 में बनकर तैयार हुआ.
झील किनारे बना निज़ाम का गर्मियों का ठिकाना
बांध तैयार होने के साथ ही निज़ाम ने झील के किनारे एक खूबसूरत महल भी बनवाया, जिसे सागर महल नाम दिया गया. गोल आकार का यह बुर्ज निज़ाम की पसंदीदा गर्मियों की पनाहगाह बन गया. गर्मी के मौसम में वह यहां ठंडी हवा और झील के खूबसूरत नज़ारों का लुत्फ उठाने आया करते थे.
यूरोपीय वास्तुकला की झलक देता है सागर महल
सागर महल की बनावट देखने वालों को अपनी ओर खींचती है. यूरोपीय शैली में बने इस बुर्ज की सीढ़ियां सीधे झील के पानी तक उतरती हैं. सबसे ऊपर बनी अर्धवृत्ताकार यानी हेमीस्फेरिकल बालकनी से पूरी झील का नज़ारा साफ दिखाई देता है. आसपास फैली हरियाली, दूर दिखने वाली पहाड़ियां और सन्नाटे जैसा शांत माहौल इस जगह की खूबसूरती को और निखार देते हैं. यही वजह है कि इतिहास और वास्तुकला में दिलचस्पी रखने वाले लोग आज भी यहां खिंचे चले आते हैं.
विरासत बचाने पर तेलंगाना सरकार का ज़ोर
फिलहाल तेलंगाना सरकार और पर्यटन विभाग इस ऐतिहासिक इमारत को संभालने पर खास ध्यान दे रहे हैं. मकसद यही है कि आने वाली पीढ़ियां भी हैदराबाद के इस शाही अतीत और उसकी वास्तुकला को करीब से देख और समझ सकें.



















