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माउंट आबू यात्रा: अचलगढ़ के इन ऐतिहासिक स्थलों की सैर करना न भूलें, हर जगह के पीछे है एक अनसुलझा रहस्ययात्रा
14 जुल॰ 2026, 7:41 am (106 दिन पहले)· 3

माउंट आबू यात्रा: अचलगढ़ के इन ऐतिहासिक स्थलों की सैर करना न भूलें, हर जगह के पीछे है एक अनसुलझा रहस्य

माउंट आबू के अचलगढ़ क्षेत्र में कई प्राचीन किले और मंदिर स्थित हैं, जो न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि दिलचस्प पौराणिक कथाओं के लिए भी पर्यटकों के बीच मशहूर हैं।

राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू में स्थित अचलगढ़ का प्राचीन किला देश भर के सैलानियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा है। माउंट आबू कस्बे से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह इलाका अपनी ऐतिहासिक विरासत और उनसे जुड़ी कहानियों के कारण बहुत लोकप्रिय है। स्थानीय लोग और गाइड यहाँ की हर जगह के पीछे दबी अनगिनत रहस्यमयी कथाएं सुनाते हैं। यदि आप माउंट आबू जाने की योजना बना रहे हैं, तो अचलगढ़ का किला ही नहीं बल्कि उसके आसपास की अन्य महत्वपूर्ण लोकेशन्स को भी देखना जरूरी है। मुख्य पहाड़ी पर स्थित किले के अलावा, यहाँ निचले स्तर पर राजा भर्तृहरि का किला भी मौजूद है, जहाँ राजा गोपीचंद और भर्तृहरि ने लंबे समय तक तपस्या की थी।

रहस्यमयी भैंसों की मूर्तियां

अचलगढ़ में प्रवेश करते ही एक कुंड दिखाई देता है, जिसका उपयोग बारिश के पानी को सहेजने के लिए किया जाता रहा है। प्राचीन काल में इसे अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता था। इस कुंड के किनारे पत्थर की तीन भैंसों की मूर्तियां स्थापित हैं। इसके पीछे एक रोचक लोक-कथा प्रचलित है कि पुराने समय में ये तीन राक्षस थे, जो साधु-संतों की पूजा-अर्चना में बाधा डालते थे। जब इस बारे में राजा धारावर्ष को पता चला, तो उन्होंने अपने तीरों से इन राक्षसों का वध कर उन्हें पत्थर की मूर्तियों में बदल दिया था।

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अचलेश्वर महादेव मंदिर: एक अनूठा चमत्कार

अचलेश्वर महादेव मंदिर की ख्याति पूरे देश में फैली हुई है। यह देश का एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहाँ शिवलिंग के स्थान पर भगवान शिव के पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। भक्तों की गहरी आस्था है कि अरावली की इन पर्वत श्रृंखलाओं को भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे पर ही टिका रखा है। मंदिर के गर्भगृह में स्थित इस स्थान पर एक गहरी खाई बनी हुई है। कहा जाता है कि इस खाई में कितना भी जल अर्पित कर दिया जाए, वह कभी भरती नहीं है, जो भक्तों के लिए एक बड़ा रहस्य है।

नंदी और मुगल सेना की कहानी

यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है और यहाँ पंचधातु से निर्मित एक विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित है। एक जनश्रुति के अनुसार, जब मुगल सेना ने इस मंदिर को लूटना चाहा, तो नंदी के पैर पर वार करते ही वहां हजारों भंवरों (मधुमक्खियों) ने सेना पर हमला कर दिया। मधुमक्खियों के हमले से घबराकर मुगल सैनिकों को अपने हथियार छोड़कर भागना पड़ा था। उन हथियारों को पिघलाकर बाद में एक विशाल त्रिशूल का निर्माण किया गया, जो आज भी वहाँ देखा जा सकता है।

सावन भादो कुंड और मीराबाई की तपस्या

अचलगढ़ की पहाड़ियों के ऊपरी हिस्से में एक विशाल जलकुंड है, जिसे सावन भादो कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड के पास एक छोटी सी कुटिया स्थित है, जिसे मीराबाई की कुटिया माना जाता है। मान्यता के अनुसार, यहाँ मीराबाई ने 12 साल तक घोर तपस्या की थी और यह भी कहा जाता है कि उनकी आँखों से गिरे आंसुओं से ही इस कुंड का निर्माण हुआ था।

गोपीचंद की गुफा और काली माता

पहाड़ी पर स्थित गोपीचंद गुफा के अंदर एक प्राचीन काली माता का मंदिर बना हुआ है। माना जाता है कि जब राजा भर्तृहरि यहाँ तपस्या में लीन थे, तब उन्हें काली माता की एक अद्भुत प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने वहीं स्थापित कर दिया। तब से आज तक भक्त दूर-दराज के इलाकों से माँ काली के दर्शन करने के लिए यहाँ आते हैं और अपनी मन्नतें मांगते हैं।

सवाल-जवाब

माउंट आबू से अचलगढ़ कितनी दूर है?
अचलगढ़ माउंट आबू शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
अचलेश्वर महादेव मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ शिवलिंग की जगह भगवान शिव के पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है।
सावन भादो कुंड के पीछे की कहानी क्या है?
माना जाता है कि यह कुंड मीराबाई के 12 वर्षों की तपस्या के दौरान उनकी आँखों से गिरे आंसुओं से बना था।
अचलगढ़ में भैंसों की मूर्तियों का क्या महत्व है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार, ये पत्थर की मूर्तियां उन राक्षसों की हैं जिन्हें राजा धारावर्ष ने साधु-संतों को परेशान करने के कारण श्राप देकर पत्थर का बना दिया था।
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