पंजाब के सियासी गलियारों में हाल के दिनों में सिर के परिधान को लेकर तीखी बयानबाजी देखने को मिली है। इस राजनीतिक खींचतान ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक दस्तार के गौरव और उसके मूल फलसफे को विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है, जो सदियों से आस्था का सबसे पवित्र अंग रही है। सिख पंथ में सिर पर बांधी जाने वाली पगड़ी केवल कपड़े का एक टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह गुरु के प्रति अटूट निष्ठा, रूहानी अनुशासन और आत्मसम्मान की सजीव मूरत मानी जाती है। क्षेत्रीय पहचान और मजहबी पहचान के फर्क को भी समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि पंजाब की धरती पर जन्म लेने या पंजाबी भाषा बोलने वाले हर इंसान को पगड़ी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। पगड़ी मूल रूप से सिख आस्था का अभिन्न हिस्सा है, जिसके आदर की रक्षा के लिए लोग अपने प्राणों की आहुति तक देने का जज्बा रखते हैं।
नेताओं के बीच जुबानी तकरार
इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह ने पड़ोसी राज्य के नेतृत्व पर तीखा कटाक्ष किया। उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पर तंज कसते हुए आरोप लगाया कि वे अपनी गाड़ी में पगड़ी रखकर चलते हैं और पंजाब की सीमाओं में दाखिल होते ही उसे पहन लेते हैं। भगवंत सिंह के मुताबिक इस तरह की दिखावटी कवायद से सूबे की जनता का विश्वास नहीं हासिल किया जा सकता।
दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इस तंज का तुरंत जवाब दिया। सैनी ने कहा कि मान साहब हमारे लिए तो पगड़ी गुरुओं को सम्मान है। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि पगड़ी उनके लिए श्रद्धा, अटूट आदर और पूज्य गुरुओं के दिखाए रास्ते पर चलने का एक पावन प्रतीक है, जिसे किसी सियासी नफे नुकसान से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
खालसा साजना और दस्तार का ऐतिहासिक आदेश
सिख इतिहास में पगड़ी को अत्यंत आदर के साथ दस्तार अथवा दुमाला पुकारा जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन दौर में पगड़ी पगड़ी राजसी वैभव, शूरवीरों और समाज के गणमान्य नागरिकों के सिर की शोभा हुआ करती थी। इस सामाजिक व्यवस्था को क्रांतिकारी मोड़ देते हुए दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की नींव रखी और हर सिख को दस्तार धारण करने का पावन विधान दिया। इस ऐतिहासिक कदम ने सदियों से चली आ रही गैर बराबरी और सामाजिक ऊंच नीच को खत्म कर हर अनुयायी को आत्मसम्मान और बराबरी का दर्जा बख्शा।
सिख धर्म की रहित मर्यादा के तहत केश कत्ल करना यानी बालों को काटना पूरी तरह वर्जित माना गया है। ऐसे में शीश के पावन केशों की हिफाजत, स्वच्छता और संभाल के लिए दस्तार अनिवार्य हो जाती है। यह पहनावा न केवल बाह्य सुरक्षा देता है, बल्कि साधक को हर पल उसके धार्मिक दायित्वों, समानता, वीरता और गुरु के उपदेशों की याद भी दिलाता रहता है।
विभिन्न शैलियों और आकारों का ताना बाना
दस्तार बांधने की तकनीक और उसके रूप रंग में भी खासा वैविध्य पाया जाता है। सिख समाज में अलग अलग जत्थों और अवसरों के लिहाज से विशेष पगड़ियां बांधी जाती हैं।
- डबल पट्टी नोक: सामान्य जनजीवन में सबसे अधिक दिखने वाली यह पगड़ी करीब 6 मीटर लंबे वस्त्र का उपयोग करके बड़े करीने से बांधी जाती है।
- चंद तोरा दुमाला: यह विशिष्ट स्वरूप खास तौर पर निहंग सिंहों द्वारा धारण किया जाता है, जो युद्ध कौशल और वीरता की पुरानी पंथिक छटा को दर्शाता है।
- अमृतसर दुमाला: नीले रंग के कपड़े से तैयार की जाने वाली यह दस्तार लगभग 5 मीटर लंबाई वाले फैब्रिक से बांधी जाती है।
- बेसिक दुमाला: इस स्वरूप को ज्यादातर नौजवान और अखंड कीर्तनी जत्था से जुड़े लोग श्रद्धापूर्वक अपने शीश पर सजाते हैं।
- जनरल सिख टर्बन: लगभग 7 मीटर लंबे कपड़े से तैयार होने वाली यह पगड़ी सात परतों में बड़ी बारीकी और अनुशासन से बांधी जाती है।
जीवन के पड़ावों और संस्कारों में दस्तार की भूमिका
सिख रहन सहन में दस्तार की अहमियत केवल आध्यात्मिक पहनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जीवन के प्रमुख सामाजिक संस्कारों से भी जुड़ा हुआ है। जब कुल का कोई बालक बाल्यावस्था पार कर किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखता है, तब परिवार और बिरादरी की मौजूदगी में दस्तारबंदी की रस्म निभाई जाती है। इस संस्कार के पश्चात नौजवान से उम्मीद की जाती है कि वह समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर पगड़ी धारण कर मर्यादा का पालन करेगा।
इसी तरह जब घर के बुजुर्ग या मुखिया का देहावसान होता है, तो शोक के पश्चात पगड़ी रस्म के जरिए सबसे बड़े बेटे को पगड़ी बांधी जाती है। यह आयोजन इस बात का ऐलान होता है कि अब कुटुंब का भार, जिम्मेदारियां और मुखिया का दायित्व उस ज्येष्ठ पुत्र के कंधों पर विधिवत सौंप दिया गया है। इस तरह दस्तार जीवन के आरंभ से लेकर अंतिम संस्कार तक कर्तव्य और मर्यादा का पहरेदार बनकर साथ निभाती है।


















