भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी के बाद भाद्रपद माह में कान्हा की छठी का पर्व भी बेहद श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं और भारतीय लोक संस्कृति में बालक के जन्म के छठे दिन छठी पूजन का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर घरों तथा मंदिरों में महिलाएं एकत्र होकर पारंपरिक बधाई और छठी गीत गाती हैं। उत्तर भारत के विभिन्न इलाकों में गाया जाने वाला लोकगीत 'जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया' ऐसे ही अवसरों की रौनक बढ़ा देता है। यह गीत केवल एक धार्मिक प्रसंग का वर्णन नहीं करता, बल्कि ग्रामीण जीवन की निश्चल खुशी, पारिवारिक वात्सल्य और पूरे समाज के उत्सव को सजीव कर देता है।
कृष्ण जन्म की छठी पर क्यों खास है 'जन्म लियो दोनों भैया' गीत?
लोक परंपराओं में जन्माष्टमी की रात से शुरू हुआ उत्सव कई दिनों तक चलता रहता है। जब कृष्ण का जन्म होता है, तो मानों पूरे ब्रजमंडल और गोकुल की गलियों में आनंद का सवेरा हो जाता है। इस लोकगीत की शुरुआती पंक्तियां ही श्रोताओं को उसी दिव्य वातावरण में ले जाती हैं। 'जन्म लियो दोनों भैया, गोकुल में बाजे बधैया' पंक्तियों के माध्यम से कान्हा और बलराम दोनों भाइयों के अवतार की खुशी को रेखांकित किया गया है। लोकभाषा में 'बधैया' शब्द का अर्थ केवल बधाई देना नहीं, बल्कि शुभ अवसर पर गाए जाने वाले मांगलिक गीतों और बाजों की ध्वनि से है।
विभिन्न क्षेत्रों में इस गीत की धुन, गायन शैली और पंक्तियों में थोड़ा-बहुत क्षेत्रीय बदलाव देखने को मिलता है। कहीं इसे कृष्ण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि के बाद गाया जाता है, तो कहीं नामकरण संस्कार और छठी के दिन महिलाएं ढोलक की थाप पर इसे गाती हैं। लोक संस्कृति विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे गीत शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान को आम जनमानस की भाषा में ढाल देते हैं। गोकुल यहां केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं रह जाता, बल्कि यह हर उस घर और आंगन का प्रतीक बन जाता है जहां किसी नए मेहमान या बच्चे के आने पर खुशियां मनाई जाती हैं।
दीपों की रोशनी और ढोल की थाप से सजी गोकुल की गलियां
इस बधाई गीत में आगे चलकर उत्सव के दृश्य का बड़ा ही मनमोहक चित्रण आता है। गीत की पंक्तियां कहती हैं, 'जगमग दिए जलत हैं' और 'द्वारे-द्वारे दीप जलत हैं'। भारतीय सनातन परंपरा में दीप जलाना शुभता, ज्ञान और अमंगल के नाश का प्रतीक माना गया है। जब कान्हा का जन्म नंद भवन में होता है, तो पूरे गोकुल के हर घर के दरवाजे पर दिए प्रज्वलित किए जाते हैं। इन पंक्तियों को सुनते हुए ऐसा आभास होता है मानो अमावस की काली रात भी दीपों की जगमगाहट से जगमगा उठी हो और हर ओर केवल आनंद का उजाला बिखरा हुआ हो।
इसके साथ ही गीत में आगे वर्णन आता है कि 'गलियों-गलियों धूम मची है'। बालक कृष्ण के आगमन की सूचना मिलते ही गोकुल की गोपियां, ग्वाल-बाल और नगरवासी अपने-अपने घरों से निकलकर उत्सव में शामिल हो जाते हैं। जगह-जगह ढोल और नगाड़े बजने लगते हैं। लोकगीत की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि वह किसी भव्य घटना को आम इंसान के दैनंदिन जीवन की भावनाओं से जोड़ देता है। कृष्ण का अवतार केवल राजाओं या ऋषियों के लिए नहीं था, बल्कि वह गोकुल के सीधे-सादे चरवाहों और सामान्य लोगों के रक्षक थे। यही कारण है कि पूरा गोकुल झूमकर नाचता है और ढोल की आवाज पर उत्सव मनाता है।
हीरे-मोती और रुपये लुटाने का लोक भाव
गीत के मध्य भाग में 'कौन लुटाए हीरे-मोती' और 'कौन लुटाए रुपैया' जैसी काव्य पंक्तियां आती हैं। सतही तौर पर देखने पर यह धन-दौलत के प्रदर्शन जैसा लग सकता है, लेकिन लोक साहित्य के दृष्टिकोण से इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और भावनात्मक है। भारतीय ग्रामीण जीवन में जब भी किसी परिवार में संतान का जन्म होता है, तो सामर्थ्य के अनुसार न्योछावर करने या दान देने की परंपरा रही है। यहां हीरे-मोती और रुपये लुटाने की बात अत्यधिक आनंद, उदारता और निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है।
गीत में आगे यह कल्पना की गई है कि राजा यानी नंद बाबा खुशी के मारे हीरे और मोती न्योछावर कर रहे हैं, वहीं मैया यशोदा वात्सल्य भाव में भरकर रुपयों की निछावर कर रही हैं। यह दृश्य बताता है कि संतान की प्राप्ति से बढ़कर दुनिया में कोई धन नहीं है। जब जीवन में परम आनंद का आगमन होता है, तो व्यक्ति अपनी सबसे प्रिय और मूल्यवान वस्तु भी सहर्ष बांटने को तैयार हो जाता है। यही उदारता गोकुल के जन्मोत्सव को भव्य और यादगार बनाती है।
कान्हा के नामकरण और वात्सल्य रस की अनोखी झलक
गीत के समापन चरण में नामकरण संस्कार की झलक मिलती है, जहां 'नाम धरो है कन्हैया' का भाव प्रकट होता है। बालक के जन्म के बाद उसकी छठी और नामकरण का अवसर परिवार के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। लोक परंपरा में भगवान कृष्ण को केवल ईश्वर मानकर पूजा नहीं जाता, बल्कि उन्हें घर का बालक मानकर दुलारा जाता है। इसीलिए उन्हें कान्हा, कन्हैया, किसना और नंदलाला जैसे बेहद मीठे और आत्मीय नामों से पुकारा जाता है।
यह बधाई गीत भक्ति और वात्सल्य रस का अद्भुत संगम है। इसमें जहां एक ओर भगवान के धरती पर अवतरित होने का दिव्य आनंद है, वहीं दूसरी ओर एक नवजात शिशु के घर आने पर मां के लाड़, दादी-नानी के आशीष और पड़ोसियों की बधाई का यथार्थवादी चित्रण भी है। यही वजह है कि युगों बाद भी जब जन्माष्टमी या छठी के अवसर पर ढोलक की थाप पर यह गीत गूंजता है, तो हर सुनने वाले का हृदय गोकुल की उस पावन और आनंदमयी बेला से जुड़ जाता है।



















