भारत के अधिकांश हिस्सों में विवाह के बाद दुल्हन अपना पैतृक घर छोड़कर पति के आवास पर जाती है। लेकिन मेघालय के खासी समुदाय में पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था इससे पूरी तरह अलग है। इस समुदाय में पारंपरिक रूप से बेटी का विवाह के बाद अपने माता-पिता का घर छोड़ना अनिवार्य नहीं माना जाता है। इसके विपरीत, विवाह के पश्चात पति अपनी पत्नी के परिवार के साथ उनके घर में रहने के लिए पहुंचता है। यही अनूठी प्रथा खासी समाज को देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग पहचान देती है।
माता के परिवार से आगे बढ़ती है वंश परंपरा
खासी समुदाय को एक प्रमुख मातृवंशीय समाज के रूप में जाना जाता है। इस व्यवस्था के तहत परिवार की वंश परंपरा पिता के बजाय मां की ओर से आगे बढ़ती है। बच्चों की सामाजिक और पारिवारिक पहचान भी उनकी मां के परिवार से ही जुड़ी होती है। इसलिए विवाह के पश्चात बेटी का अपने मूल परिवार के साथ रहना इस पूरी सामाजिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक और अहम हिस्सा माना जाता है।
इस समाज में महिलाओं की स्थिति और भूमिका पारिवारिक मामलों में काफी मजबूत होती है। घर की देखभाल, संपत्ति और पारिवारिक निर्णयों से जुड़े कई अहम मामलों में महिलाओं की खास जिम्मेदारी होती है। हालांकि, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि समाज की सारी जिम्मेदारियां केवल महिलाओं पर ही होती हैं। पुरुष भी परिवार के पालन-पोषण और सामाजिक जीवन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सबसे छोटी बेटी को मिलते हैं विशेष अधिकार
खासी समुदाय की पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था में परिवार की सबसे छोटी बेटी को एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इस सबसे छोटी बेटी को ‘खटदुह’ के नाम से पुकारा जाता है। पारंपरिक नियमों के अनुसार, परिवार की पैतृक संपत्ति और घर की मुख्य जिम्मेदारी इसी बेटी के हिस्से में आती है। खटदुह की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा करना और उनकी देखभाल करना भी होती है।
परिवार की प्राचीन परंपराओं को सहेजने और आगे बढ़ाने में भी इसी बेटी की मुख्य भूमिका होती है। यही वजह है कि सबसे छोटी बेटी का विवाह के बाद भी अपने माता-पिता के घर में ही बने रहना इस सामाजिक ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा बन जाता है, जिससे परिवार की निरंतरता बनी रहती है।
विवाह के बाद क्यों पत्नी के घर रहता है पति?
चूंकि इस समाज में बेटी अपने माता-पिता के घर ही निवास करती है और वंश की परंपरा भी मां के जरिए ही आगे बढ़ती है, इसलिए विवाह के बाद पति का अपनी पत्नी के घर जाकर रहना इसी सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है। इस पूरी प्रक्रिया को केवल एक साधारण नियम के रूप में देखना इस व्यवस्था की गहराई को नहीं समझता है, बल्कि यह खासी समाज की पूरी मातृवंशीय संस्कृति का अभिन्न अंग है।
समय के साथ अब खासी समाज में भी धीरे-धीरे बदलाव आने लगे हैं। यह जरूरी नहीं है कि आज हर परिवार इन पारंपरिक नियमों का कठोरता से पालन करे ही। आज के दौर में कई परिवार अपनी आधुनिक जीवनशैली, नौकरी और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर रहने के स्थान और परिवार से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं।
भारतीय संस्कृति की अनूठी विविधता
खासी समुदाय की यह खास परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारत में विवाह और परिवार से जुड़ी प्रथाएं हर क्षेत्र में एक समान नहीं हैं। जहां देश के अधिकांश राज्यों में विवाह के बाद बेटी के ससुराल जाने का चलन है, वहीं खासी समाज में मातृवंशीय व्यवस्था के चलते विवाह और परिवार के मायने पूरी तरह भिन्न नजर आते हैं। संस्कृति और परंपराओं की यह विविधता ही भारतीय समाज को एक अलग और अनूठा स्वरूप प्रदान करती है।



















