सोशल मीडिया पर गुड़गांव की एक महिला का अपने पति के साथ बनाया गया अनोखा नियम इन दिनों जबरदस्त चर्चा में है। फूड कंटेंट क्रिएटर के रूप में काम करने वाली प्रिया ने खुलासा किया है कि जब भी वह घर पर विशेष कैफे-स्टाइल व्यंजन बनाती हैं, तो उनके पति उन्हें प्रति मील 1000 रुपये देते हैं। इंस्टाग्राम पर उनका यह दावा वायरल होते ही इंटरनेट पर बहस का दौर शुरू हो गया, जहां कुछ लोगों ने इसे एक नया और बेहतरीन विचार बताया, तो वहीं कई उपयोगकर्ताओं ने सवाल उठाए कि क्या अब घरेलू कुकिंग का भी बिल बनाया जाएगा। आलोचनाओं और बढ़ती ट्रॉलिंग के बीच प्रिया ने सामने आकर इस पूरी व्यवस्था के पीछे का सही मकसद साफ किया है।
12 लाख से ज्यादा व्यूज और इंटरनेट पर शुरू हुई तीखी बहस
प्रिया ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक छोटा वीडियो साझा किया था, जिसमें उन्होंने बताया कि घर पर रेस्तरां जैसा स्पेशल खाना बनाने के बदले उनके पति उन्हें 1000 रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर करते हैं। देखते ही देखते इस वीडियो को 12 लाख से ज्यादा बार देखा गया और इस पर हजारों प्रतिक्रियाएं आने लगीं। सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के एक वर्ग ने तर्क दिया कि शादी जैसे पवित्र रिश्ते में खाने-पीने का हिसाब-किताब रखना अजीब है और इससे पारिवारिक संबंधों में व्यावसायिकता आ सकती है। हालांकि, दूसरे वर्ग ने माना कि रोजमर्रा के घरेलू कामों को बिना किसी सराहना के स्वीकार कर लेने की मानसिकता को बदलने के लिए यह एक सकारात्मक पहल है।
प्रिया की सफाई: यह शादी की कीमत नहीं, बल्कि मेहनत की सराहना है
सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रियाओं और ट्रॉलिंग के बाद प्रिया ने इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोगों ने उनकी बात का गलत अर्थ निकाला है। उनका उद्देश्य शादी या किसी रिश्ते को पैसों में तोलना बिल्कुल नहीं है। प्रिया के अनुसार, यह 1000 रुपये का हस्तांतरण वास्तव में उस समय, शारीरिक मेहनत और रचनात्मक सोच का सम्मान है, जो एक विशेष डिश को तैयार करने में लगती है। उन्होंने कहा कि अक्सर समाज में घर के कामों, विशेषकर रसोई के काम को बेहद सामान्य मान लिया जाता है और उसके पीछे छिपी कड़ी मेहनत को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
फैशन डिजाइनिंग से फूड कंटेंट क्रिएशन तक का सफर
मूल रूप से चंडीगढ़ की रहने वाली प्रिया की पृष्ठभूमि काफी दिलचस्प रही है। उन्होंने फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई पूरी की थी और इसके बाद लगभग पांच वर्षों तक अपना खुद का क्लोदिंग ब्रांड भी सफलतापूर्वक चलाया। साल 2023 में शादी के बंधन में बंधने के बाद वह गुड़गांव स्थानांतरित हो गईं और यहां उन्होंने फूड कंटेंट क्रिएटर के रूप में अपना नया सफर शुरू किया। प्रिया का मानना है कि खाना बनाना उनके लिए सिर्फ एक रोजमर्रा की मजबूरी या जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह उनका रचनात्मक जुनून और पेशेवर काम है। इसलिए वह इसे एक कला के रूप में देखती हैं।
मजाक में शुरू हुआ विचार कैसे बन गया रोजमर्रा की आदत
इस अनोखे नियम की शुरुआत के बारे में बात करते हुए प्रिया ने बताया कि यह व्यवस्था उनके और उनके पति के बीच घरेलू जिम्मेदारियों के बंटवारे पर चर्चा के दौरान सामने आई थी। एक दिन उन्होंने मजाक के लहजे में अपने पति से कहा था कि अगर वह घर पर रेस्तरां जैसा बेहतरीन खाना बना रही हैं, तो यह सुविधा हमेशा मुफ्त नहीं मिलनी चाहिए। उनके पति, जो पेशे से एक आर्किटेक्ट हैं और अपनी खुद की फर्म चलाते हैं, ने इस बात को बेहद सकारात्मक रूप से लिया। उन्होंने स्वीकार किया कि यदि यही खाना वे बाहर किसी कैफे में खाते, तो आसानी से 1000 रुपये या उससे अधिक का बिल चुकाते, इसलिए वही राशि अपनी पत्नी को देना कहीं अधिक तर्कसंगत है। इस तरह हंसी-मजाक में शुरू हुई बात उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा बन गई।
हर महीने 15 से 20 हजार की बचत और बेहतर स्वास्थ्य
वर्तमान में इस व्यवस्था के माध्यम से प्रिया को हर महीने लगभग 15 से 20 हजार रुपये मिल जाते हैं। हालांकि, वह इस राशि को अपनी सैलरी नहीं मानतीं, बल्कि इसे अपने प्रयास की एक कद्र मानती हैं। इस आदत का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि परिवार का बाहर का अस्वस्थ खाना बंद हो गया है। जो पैसा पहले रेस्तरां के बिलों पर खर्च होकर बर्बाद होता था, वह अब घर के भीतर ही रह जाता है। इसके साथ ही परिवार को घर का बना पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन मिल रहा है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घरेलू काम को एक सम्मानजनक पहचान मिल रही है।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स की राय: वैलिडेट करने का सीधा असर सेल्फ-वर्थ पर
संबंध मामलों के विशेषज्ञों और रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब जीवनसाथी केवल औपचारिक धन्यवाद कहने के बजाय किसी ठोस तरीके से आपकी मेहनत को मान्यता देता है, तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के सेल्फ-वर्थ और आत्मसम्मान पर पड़ता है। अक्सर घर के ऐसे काम, जिन्हें लोग यह कहकर खारिज कर देते हैं कि यह तो करना ही पड़ता है, मानसिक रूप से थका देने वाले होते हैं। ऐसे में 1000 रुपये देने जैसी छोटी पहल यह अहसास कराती है कि आपकी मेहनत को देखा जा रहा है, उसकी कद्र की जा रही है और उसे हलके में नहीं लिया जा रहा है।
आपसी समझ जरूरी: क्या 9-से-5 जॉब जैसा सम्मान मिलना चाहिए?
हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हर कपल की रिलेशनशिप डायनेमिक्स अलग होती है। किसी जोड़े के लिए यह प्यार और कद्र जताने का एक प्यारा तरीका हो सकता है, जबकि किसी अन्य के लिए यह हिसाब-किताब या व्यावसायिक लेन-देन जैसा लग सकता है। यदि ऐसी व्यवस्था दोनों सहयोगियों की आपसी सहमति, विश्वास और सम्मान के साथ लागू की जाए, तो यह रिश्ते को मजबूत बनाती है। लेकिन अगर इसे जबरन या दबाव में अपनाया जाए, तो यह तनाव का कारण बन सकती है। यह कहानी सिर्फ 1000 रुपये के लेनदेन की नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाती है कि क्या बिना वेतन वाले घरेलू कामों को भी 9-से-5 जॉब जितनी ही प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना चाहिए।


















