उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में 803 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली 78 अलग-अलग विकास परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास समारोह के दौरान राजनीतिक तापमान बढ़ गया। इस सार्वजनिक मंच से समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा दी गई पुरानी चुनावी चुनौती का सीधा जवाब दिया गया। मंच से स्पष्ट किया गया कि अयोध्या कोई सामान्य चुनावी राजनीति का अखाड़ा नहीं बल्कि एक पावन धाम है, जहां केवल विकास और व्यवस्था के संकल्प के साथ कदम रखा जाता है। इसी संदर्भ में सपा अध्यक्ष को खुला प्रस्ताव देते हुए कहा गया कि यदि उन्हें मुकाबला करना ही है तो दोनों नेता अयोध्या सीट से अपना नामांकन दाखिल करें और सीधे मैदान में आकर फैसला कर लें।
अयोध्या के बदलते स्वरूप और सीधे मुकाबले की पेशकश
सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए कहा गया कि विपक्षी दल लगातार यह दावा करते रहे हैं कि मुख्यमंत्री को अयोध्या से चुनाव लड़कर अपनी लोकप्रियता साबित करनी चाहिए। इस पर पलटवार करते हुए यह बात सामने रखी गई कि अयोध्या जाने का मकसद वहां बुनियादी ढांचे को संवारना और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को नई गरिमा दिलाना है। पुरानी सरकारों के दौर को याद दिलाते हुए उल्लेख किया गया कि पहले इस धार्मिक नगरी को चौबीस घंटे में केवल 3-4 घंटे ही बिजली नसीब होती थी और चारों तरफ अव्यवस्था तथा गंदगी का अंबार लगा रहता था। इसके विपरीत, वर्तमान व्यवस्था में अयोध्या त्रेतायुग की भव्यता और रामराज्य के आदर्शों का स्मरण कराती हुई दिखती है।
इसी सिलसिले में आगे कहा गया कि सहयोगियों या प्रतिनिधियों के पीछे छिपकर बयानबाजी करने के बजाय नेताओं को आमने-सामने की लड़ाई लड़नी चाहिए। विपक्षी खेमे को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया गया कि जो लोग अतीत में माफिया तत्वों के आगे झुकते रहे और उनकी मजारों पर जाकर समर्थन जुटाते रहे, वे अब जनता के सामने टिकने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। जनता द्वारा पहले ही खारिज किए जाने के बाद अब केवल हताशा भरे बयान सामने आ रहे हैं।
मतदान की ताकत और कानून व्यवस्था का बदलाव
बलरामपुर में एकत्रित जनसमूह के सामने इस बात पर जोर दिया गया कि एक वोट की ताकत ने समूचे क्षेत्र की तकदीर बदल दी है। एक वक्त था जब यह सीमावर्ती इलाका पहचान के संकट से जूझता था और इसे केवल तस्करी के केंद्र के रूप में जाना जाता था। अब वही जनमत इस अंचल को अराजकता से निकालकर विकास और बदलाव के पथ पर आगे बढ़ा रहा है। यह इलाका पहले एक आकांक्षी जिले के रूप में सीमित था, लेकिन अब निवेश और संभावनाओं से भरे एक अग्रणी केंद्र के रूप में उभर रहा है।
पूर्ववर्ती शासनकालों की कार्यशैली का जिक्र करते हुए आरोप लगाया गया कि उस दौर में कानून का कोई खौफ नहीं था। माफिया जिस जमीन पर कदम रखते थे, उस पर जबरन अपना कब्जा जमा लेते थे। व्यापारी वर्ग को खुलेआम फोन पर धमकियां देकर उनकी संपत्तियों को हड़प लिया जाता था। बुनियादी ढांचे की स्थिति का हवाला देते हुए बताया गया कि वर्ष 2017 से पहले पूरे प्रदेश में सबसे जर्जर और खराब सड़कें इसी जिले में पाई जाती थीं, जिन्हें अब व्यापक रूप से सुधारा गया है।
धार्मिक परियोजनाओं के विरोध और भाषा की मर्यादा पर सवाल
संबोधन के अंतिम हिस्से में कांग्रेस और उसके सहयोगी राजनीतिक दलों पर कड़ा प्रहार किया गया। यह रेखांकित किया गया कि जो ताकतें राम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम जैसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक परियोजनाओं के निर्माण की राह में लगातार बाधाएं खड़ी करती रही थीं, वे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का विरोध करने में जुटी हैं। विरोध को लोकतंत्र का हिस्सा मानते हुए भी यह चेतावनी दी गई कि विरोध की एक तय सीमा और मर्यादा होनी चाहिए।
विपक्षी दलों पर सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार और बुनियादी संस्कारों को त्यागने का आरोप लगाते हुए कहा गया कि लोकतांत्रिक असहमति को ताक पर रखकर अनुचित और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी ताकतों का मुख्य मकसद जनता को गुमराह करके समाज में अराजकता और भ्रम का माहौल तैयार करना है, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।




















