उत्तर प्रदेश की सियासत में बिजनौर जिले के तहत आने वाला नजीबाबाद विधानसभा क्षेत्र हमेशा से एक खास पहचान रखता है। नगीना लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बनने वाली इस सीट का आधिकारिक विधानसभा क्रम संख्या 17 है। वर्तमान समय में इस इलाके की नुमाइंदगी समाजवादी पार्टी के विधायक तसलीम अहमद कर रहे हैं। तसलीम अहमद इस विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं। उन्होंने अपने सियासी सफर की इस जीत की शुरुआत 2012 में बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह पर की थी, जिसके बाद वे पाला बदलकर लगातार दो बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लगातार दूसरे स्थान पर रही है। भाजपा को नजीबाबाद सीट पर अपनी एकमात्र कामयाबी 1991 के चुनाव में मिली थी, जिसके बाद से पार्टी को यहां दोबारा जीत हासिल नहीं हो सकी है। आइए 1991 से लेकर 2022 तक के पिछले तीन दशकों के चुनावी आंकड़ों, जीत-हार के अंतर और 2027 के विधानसभा चुनाव के संभावित सियासी समीकरणों का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
1991 का विधानसभा चुनाव और भाजपा की ऐतिहासिक जीत
साल 1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान नजीबाबाद क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट हुआ करता था। राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या गोलीकांड की पृष्ठभूमि में हुए इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। नजीबाबाद सीट पर भी भाजपा के प्रत्याशी राजेंद्र ने शानदार प्रदर्शन किया। राजेंद्र को कुल 34,730 वोट हासिल हुए। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सीपीआई के उम्मीदवार तिलक राम को 15,829 वोटों के भारी अंतर से मात दी थी। इस मुकाबले में तिलक राम को कुल 18,901 वोट मिले थे। वहीं दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी मुकाबले में तीसरे नंबर पर खिसक गई थी, जिसके प्रत्याशी दिनेश कुमार को 15,327 वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। 1991 की यह चुनावी जीत नजीबाबाद सीट पर भाजपा की पहली और अब तक की आखिरी जीत साबित हुई।
1993 में वामदल की एंट्री और रामस्वरूप सिंह का उभार
दो साल बाद यानी 1993 में जब उत्तर प्रदेश में मध्यावधि विधानसभा चुनाव हुए, तब नजीबाबाद की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस चुनाव में सीपीआई(एम) के प्रत्याशी रामस्वरूप सिंह ने जीत का परचम लहराया। रामस्वरूप सिंह को कुल 46,401 वोट मिले और उन्होंने भाजपा के मौजूदा विधायक राजेंद्र प्रसाद को 5,912 वोटों के अंतर से पराजित किया। भाजपा के राजेंद्र प्रसाद को इस बार 40,489 वोट ही मिल सके और वे सीट बचाने में नाकाम रहे। इस त्रिकोणीय संघर्ष में बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर दिनेश कुमार पर भरोसा जताया था, जिन्हें कुल 16,327 वोट मिले। वहीं कांग्रेस पार्टी की प्रत्याशी आशा चौधरी 11,518 वोट हासिल करके चौथे स्थान पर रही थीं। इस चुनाव ने नजीबाबाद में वामपंथी राजनीति की एक मजबूत नींव रख दी।
1996 के चुनाव में रामस्वरूप सिंह ने दोबारा दर्ज की जीत
साल 1996 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई(एम) के नेता रामस्वरूप सिंह ने अपनी राजनीतिक पकड़ को और अधिक मजबूत किया। वामदल के टिकट पर मैदान में उतरे रामस्वरूप सिंह को जनता का व्यापक समर्थन मिला और उन्हें कुल 58,370 वोट प्राप्त हुए। उनके सामने मुख्य मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार राजा राम थे। राजा राम को कुल 46,961 वोट हासिल हुए। रामस्वरूप सिंह ने राजा राम को 11,409 वोटों के स्पष्ट अंतर से हराकर लगातार दूसरी बार नजीबाबाद विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व हासिल किया। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने शीशराम को अपना प्रत्याशी बनाया था, जो 42,588 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
2002 में वामपंथी उम्मीदवार ने लगाई जीत की हैट्रिक
भारत निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2002 के विधानसभा चुनाव में नजीबाबाद सीट पर बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिला। सीपीआई(एम) के रामस्वरूप सिंह के सामने इस बार मुख्य चुनौती बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार शीशराम की तरफ से थी। रामस्वरूप सिंह को इस चुनाव में 40,426 वोट मिले, जबकि बसपा के शीशराम 35,584 वोट प्राप्त करने में सफल रहे। रामस्वरूप सिंह ने शीशराम को 4,842 वोटों के अंतर से हराकर नजीबाबाद में जीत की ऐतिहासिक हैट्रिक पूरी की। इस चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) का गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के साथ था। गठबंधन के तहत आरएलडी के प्रत्याशी अरविंद चौधरी मैदान में उतरे थे, जो 27,377 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
2007 में बसपा की आंधी और शीशराम की पहली चुनावी जीत
साल 2007 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, तब नजीबाबाद सीट का सियासी रुख भी बदला। बसपा नेतृत्व ने लगातार तीसरी बार शीशराम पर विश्वास जताया और पार्टी का यह फैसला सही साबित हुआ। शीशराम के सामने सीपीआई(एम) के राज कुमार मैदान में ताल ठोक रहे थे। शीशराम को कुल 49,848 वोट मिले, जबकि वामपंथी उम्मीदवार राजकुमार 41,860 वोटों पर ही सिमट गए। शीशराम ने राजकुमार को 7,988 वोटों के अंतर से शिकस्त देकर नजीबाबाद में बसपा का खाता खोला। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तीसरे पायदान पर रही, जहां उसकी महिला प्रत्याशी सुशीला को केवल 18,404 वोट ही मिल सके।
2012 में परिसीमन के बाद सामान्य सीट बनी नजीबाबाद
साल 2008 के परिसीमन के तहत नजीबाबाद विधानसभा सीट का स्वरूप बदल गया और यह सुरक्षित सीट से अनारक्षित यानी सामान्य सीट बन गई। सामान्य सीट होने के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने तसलीम अहमद को चुनावी मैदान में उतारा। उनका सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार राजीव कुमार अग्रवाल से हुआ। तसलीम अहमद ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 62,713 वोट हासिल किए और भाजपा के राजीव कुमार अग्रवाल को 11,583 वोटों के अंतर से पराजित किया। राजीव कुमार अग्रवाल को 51,130 वोट मिले थे। उस चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन कांग्रेस पार्टी के साथ था और इस गठबंधन के प्रत्याशी अबरार आलम को 30,885 वोट मिले। वहीं समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शाहिद अली खान महज 28,597 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे थे।
2017 में तसलीम अहमद ने सपा के टिकट पर दर्ज की नजदीकी जीत
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव हुए, लेकिन नजीबाबाद में तसलीम अहमद का दबदबा कायम रहा। चुनाव से पहले तसलीम अहमद ने बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। सपा के टिकट पर मैदान में उतरे तसलीम अहमद का मुकाबला एक बार फिर भाजपा के राजीव कुमार अग्रवाल से हुआ। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक तसलीम अहमद को 81,082 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी राजीव कुमार अग्रवाल 79,080 वोट जुटाने में सफल रहे। यह चुनाव पिछले तीन दशकों के दौरान नजीबाबाद का सबसे कड़ा और कांटेदार मुकाबला साबित हुआ, जिसमें तसलीम अहमद ने केवल 2,002 वोटों के मामूली अंतर से जीत दर्ज की। बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी जलील अहमद 45,070 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे।
2022 में तसलीम अहमद की हैट्रिक और सबसे बड़ा जीत का अंतर
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के तसलीम अहमद ने नजीबाबाद में अपनी जीत की हैट्रिक पूरी कर ली। इस बार उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी राजा भरतेंद्र सिंह से था। तसलीम अहमद ने एकतरफा प्रदर्शन करते हुए कुल 1,02,675 वोट हासिल किए, जबकि भाजपा के राजा भरतेंद्र सिंह 78,905 वोट ही प्राप्त कर सके। तसलीम अहमद ने 23,770 वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की, जो नजीबाबाद सीट के पिछले तीन दशकों के इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी अंतर है। इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी शहनवाज आलम 44,727 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार मोहम्मद सलीम अंसारी को केवल 1,958 वोट ही मिल सके और वे चौथे स्थान पर रहे।
नजीबाबाद का कुल चुनावी रिकॉर्ड और 2027 का संभावित मुकाबला
यदि 1991 से 2022 तक हुए कुल 8 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सीपीआई(एम) ने 3 बार, बहुजन समाज पार्टी ने 2 बार, समाजवादी पार्टी ने 2 बार और भारतीय जनता पार्टी ने 1 बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस पार्टी को इन तीन दशकों में नजीबाबाद से एक बार भी जीत नसीब नहीं हुई। इस सीट पर दो नेताओं ने जीत की हैट्रिक लगाई है। वामदल के रामस्वरूप सिंह 1993, 1996 और 2002 में लगातार तीन बार विजयी रहे, वहीं तसलीम अहमद ने 2012 में बसपा और 2017 तथा 2022 में सपा के टिकट पर जीत दर्ज करके हैट्रिक बनाई।
सामाजिक समीकरण के लिहाज से नजीबाबाद विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी के साथ-साथ अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जातियों की तादाद काफी निर्णायक है। 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में सियासी गठबंधन बेहद अहम भूमिका निभाएंगे। एक तरफ भाजपा और आरएलडी का गठबंधन हो सकता है, तो दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस का मोर्चा मैदान में नजर आ सकता है। जहां समाजवादी पार्टी नजीबाबाद में लगातार चौथी बार जीत दर्ज करने की तैयारी में होगी, वहीं भाजपा तीन दशक लंबे सूखे को खत्म करने और सपा के विजय रथ को रोकने का पूरा प्रयास करेगी। आने वाले चुनाव में दोनों प्रमुख खेमों द्वारा उम्मीदवारों का चयन और विभिन्न जातियों की लामबंदी ही यहां की जीत-हार का फैसला तय करेगी।
























