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कैबिनेट ने दी 5070 करोड़ रुपये की सूर्य सरोवर योजना को हरी झंडी, 5000 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर से जगमगाएंगे शहरउत्तर प्रदेश
31 जुल॰ 2026, 5:47 pm (5 घंटे पहले)· 0

कैबिनेट ने दी 5070 करोड़ रुपये की सूर्य सरोवर योजना को हरी झंडी, 5000 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर से जगमगाएंगे शहर

केंद्रीय कैबिनेट ने 5,070 करोड़ रुपये के बजट वाली प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना को मंजूरी दे दी है। अगले 5 वर्षों में जलाशयों पर 5,000 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर प्लांट लगाए जाएंगे, जिससे सालाना 37 अरब यूनिट तक स्वच्छ बिजली का उत्पादन होगा।

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार करने और जलाशयों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक प्रमुख पहल का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित केंद्रीय कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की गई। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य देश के विभिन्न जलाशयों और औद्योगिक तालाबों के ऊपर तैरते हुए सोलर प्लांट स्थापित करना है। सरकार ने अगले 5 वर्षों के दौरान पूरे देश में 5,000 मेगावाट यानी 5 गीगावाट क्षमता की फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस तकनीक के माध्यम से बिना किसी कीमती कृषि या व्यावसायिक भूमि का अधिग्रहण किए हर साल अरबों यूनिट हरित बिजली पैदा की जा सकेगी, जिससे पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा।

योजना का बजट, वित्तीय प्रोत्साहन और एनर्जी स्टोरेज प्रावधान

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत इस व्यापक योजना के लिए कुल 5,070 करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन तय किया गया है। योजना के अंतर्गत वर्ष 2026-27 से लेकर वर्ष 2030-31 की समयावधि के दौरान नई फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं को प्रशासनिक मंजूरी दी जाएगी। इस योजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रत्येक फ्लोटिंग सोलर परियोजना के साथ अनिवार्य रूप से कम से कम 2 घंटे की बैकअप क्षमता वाला एनर्जी स्टोरेज सिस्टम एकीकृत किया जाएगा। इस स्टोरेज व्यवस्था से सोलर पैनलों से बनने वाली बिजली का आसानी से संचयन किया जा सकेगा, जिससे राष्ट्रीय बिजली ग्रिड अधिक मजबूत, स्थिर और भरोसेमंद बनेगा।

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निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की विकासकर्ता कंपनियों को इस क्षेत्र में निवेश के लिए आकर्षित करने के उद्देश्य से सरकार ने विशेष वित्तीय सहायता का ढांचा तैयार किया है। योजना के तहत किसी प्रोजेक्ट के सफलतापूर्वक पूरा होने पर संबंधित कंपनी को प्रति मेगावाट 1 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इसके अलावा, परियोजना की शुरुआत से पहले आवश्यक प्राथमिक सर्वेक्षण और व्यवहार्यता अध्ययन के कार्य को पूरा करने के लिए प्रति प्रोजेक्ट 50 लाख रुपये तक की अग्रिम आर्थिक मदद दी जाएगी। यह योजना देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में समान रूप से लागू की जाएगी, जिसका लाभ वहां कार्यरत ऊर्जा कंपनियां उठा सकेंगी।

बिजली उत्पादन क्षमता और शहरों की ऊर्जा खपत से तुलना

वर्तमान समय में भारत के पास कुल फ्लोटिंग सोलर ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 700 मेगावाट है। इस नई योजना के माध्यम से 5,000 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने के बाद देश की कुल तैरती सौर क्षमता बढ़कर करीब 5,700 मेगावाट के स्तर तक पहुंच जाएगी। यदि यह 5 गीगावाट का विशाल सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर अपनी स्थापित क्षमता के 85 प्रतिशत उपयोग दर पर भी संचालित होता है, तो इससे प्रतिवर्ष लगभग 37 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन संभव हो सकेगा। स्वच्छ ऊर्जा का यह विशाल भंडार देश के करीब 1 से 1.5 करोड़ घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की दैनिक बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त होगा। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पादन के बावजूद वायुमंडल में कार्बन का उत्सर्जन बिल्कुल शून्य रहेगा।

सालाना 37 अरब यूनिट बिजली उत्पादन के प्रभाव को समझने के लिए बड़े शहरी केंद्रों की बिजली खपत से इसकी तुलना की जा सकती है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की कुल वार्षिक बिजली खपत क्षमता लगभग 1,000 मेगावाट के आसपास मानी जाती है। इस योजना के तहत स्थापित होने वाली 5,000 मेगावाट की कुल क्षमता अकेले लखनऊ जैसे 5 बड़े शहरों की समग्र बिजली जरूरतों को एक साथ पूरा कर सकती है। यानी यह प्रोजेक्ट लखनऊ शहर की कुल वार्षिक खपत की तुलना में करीब 5 गुना अधिक बिजली उत्पन्न करेगा। वहीं अगर जयपुर जैसे मध्यम आकार वाले शहरों की बात करें, तो इस योजना से बनने वाली बिजली से ऐसे 8 से 10 शहरों की कुल ऊर्जा मांग को आसानी से पूरा किया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन और घरेलू विनिर्माण

पर्यावरण और हरित विकास के नजरिए से प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना देश के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाएगी। इस योजना के पूर्ण क्रियान्वयन से प्रतिवर्ष लगभग 1 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोकने में मदद मिलने का अनुमान लगाया गया है। इसके अतिरिक्त, इस हरित ऊर्जा अभियान से देश के भीतर बड़े पैमाने पर आजीविका के अवसर पैदा होंगे। अनुमान है कि इस पूरी योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 16,000 से 17,000 लोगों को नया रोजगार प्राप्त होगा।

यह पहल भारत के घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को भी एक नया प्रोत्साहन प्रदान करेगी। फ्लोटिंग सोलर प्लांटों के निर्माण के लिए आवश्यक सोलर पैनल, फोटोवोल्टिक मॉड्यूल, फ्लोटिंग पोंटून प्लेटफॉर्म, एंकरिंग उपकरण और उन्नत बैटरी प्रणालियों के निर्माण से मेक इन इंडिया अभियान को गति मिलेगी। जल संसाधनों के इष्टतम उपयोग और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाकर यह योजना विकसित भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को मजबूती प्रदान करेगी।

जमीन बनाम पानी: लागत तुलना और फ्लोटिंग सोलर के फायदे

सोलर ऊर्जा के बुनियादी ढांचे में निवेश करते समय एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्लांट को जमीन पर स्थापित करना अधिक किफायती है या फिर पानी की सतह पर। बुनियादी ढांचागत लागत के आंकड़ों पर नजर डालें तो जमीन पर सोलर प्लांट लगाना पानी की तुलना में कम खर्चीला होता है। समतल जमीन पर सोलर प्लांट स्थापित करने की लागत आमतौर पर 3 से 4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट आती है। वहीं दूसरी ओर, जलाशयों की सतह पर फ्लोटिंग सोलर प्लांट स्थापित करने पर यही खर्च बढ़कर 4 से 6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक पहुंच जाता है। इस प्रकार, शुरुआती पूंजीगत लागत के मामले में पानी पर सोलर प्लांट लगाना जमीन की तुलना में करीब 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक अधिक महंगा साबित होता है।

पानी पर प्लांट लगाने की उच्च लागत की मुख्य वजह इसके लिए आवश्यक विशेष इंजीनियरिंग ढांचा है। फ्लोटिंग सोलर सिस्टम के लिए मजबूत तैरते हुए प्लेटफॉर्म, पानी के भीतर स्थिर रखने वाले एंकरिंग और मूरिंग सिस्टम, नमी-रोधी विशेष केबल तथा जंग-रोधी ढांचागत घटकों की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद, लंबे समय के परिचालन दृष्टिकोण से पानी पर सोलर प्लांट लगाना एक बेहद बुद्धिमत्तापूर्ण सौदा माना जाता है। सबसे पहला फायदा यह है कि इसके लिए उपजाऊ कृषि भूमि या महंगी व्यावसायिक जमीन का अधिग्रहण नहीं करना पड़ता, जिससे कीमती भूमि संसाधनों की बचत होती है।

दूसरा बड़ा तकनीकी लाभ यह है कि जलाशयों के पानी से मिलने वाले प्राकृतिक शीतलन प्रभाव के कारण सोलर पैनलों का तापमान नियंत्रित रहता है, जिससे उनकी बिजली उत्पादन क्षमता में 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक का सुधार दर्ज किया जाता है। इसके अलावा, जल निकायों के एक बड़े हिस्से को सोलर पैनलों से ढक देने से पानी के वाष्पीकरण की दर में भारी कमी आती है, जिससे जल निकायों में लाखों लीटर पानी की बचत होती है। विशेष रूप से देश के उन राज्यों में जहां उपजाऊ कृषि योग्य भूमि की कीमतें बहुत अधिक हैं, जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का उपयोग करना लंबी अवधि में वित्तीय और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोणों से अत्यधिक लाभप्रद साबित होगा।

सवाल-जवाब

प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना क्या है और इसका मुख्य लक्ष्य क्या है?
यह केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत 5,070 करोड़ रुपये की योजना है जिसके तहत अगले 5 वर्षों में जलाशयों पर 5,000 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर प्लांट लगाए जाएंगे।
फ्लोटिंग सोलर प्लांट से हर साल कितनी बिजली पैदा होने का अनुमान है?
85 प्रतिशत क्षमता उपयोग पर इस योजना से सालाना लगभग 37 अरब यूनिट बिजली पैदा होगी, जो 1 से 1.5 करोड़ उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा कर सकती है।
इस योजना के तहत सौर परियोजनाएं लगाने वाली कंपनियों को क्या मदद मिलेगी?
प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा होने पर प्रति मेगावाट 1 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता और शुरुआती सर्वेक्षण के लिए प्रति प्रोजेक्ट 50 लाख रुपये तक की मदद दी जाएगी।
पानी पर सोलर प्लांट लगाने की लागत जमीन की तुलना में कितनी अधिक है?
जमीन पर प्लांट लगाने में प्रति मेगावाट 3 से 4 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जबकि पानी पर यह खर्च 4 से 6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होता है जो 30 से 50 प्रतिशत अधिक है।
लागत अधिक होने के बावजूद फ्लोटिंग सोलर प्लांट क्यों अधिक फायदेमंद माने जाते हैं?
यह योजना कीमती कृषि योग्य भूमि को बचाती है, पानी के ठंडक प्रभाव से सोलर पैनल की कार्यक्षमता 5 से 10 प्रतिशत बढ़ाती है और जलाशयों का वाष्पीकरण रोकती है।
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