लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी आग की घटना ने मथुरा प्रशासन को नींद से जगा दिया है। अब जिले में बिना मंजूरी के चल रहे कोचिंग सेंटरों पर कार्रवाई होती दिख रही है। बीएसए रोड पर ही सैकड़ों ऐसे कोचिंग सेंटर हैं जो बिना परमिशन और बिना रजिस्ट्रेशन के संचालित हो रहे हैं, और इन पर अब शिकंजा कसता नजर आ रहा है।
लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग ने एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है, आखिर ऐसे हादसे कब तक दोहराए जाते रहेंगे। हर बड़ी दुर्घटना के बाद एक जानी-पहचानी तस्वीर सामने आती है। मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे का ऐलान, उच्चस्तरीय जांच के आदेश, दोषियों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा और कुछ अधिकारियों के निलंबन की खबरें। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ इतना काफी है।
जिम्मेदारी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे तंत्र की
अगर किसी इमारत में आग बुझाने के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे, निर्माण के मानकों को नजरअंदाज किया गया और संबंधित विभागों की निगरानी में चूक हुई, तो जिम्मेदारी सिर्फ एक आदमी की नहीं बनती, बल्कि पूरी व्यवस्था की बनती है। बड़ा सवाल यह भी है कि हादसे के बाद ही अचानक नियमों की याद क्यों आती है। क्या ऐसी इमारतें पहले अधिकारियों की नजर में नहीं थीं।
दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ वक्त बीतते ही मामला ठंडा पड़ जाता है। जांचें लंबी खिंचती जाती हैं, जिम्मेदारियां धुंधली हो जाती हैं और लोगों का ध्यान किसी नए मुद्दे की तरफ मुड़ जाता है। इस बीच पीड़ित परिवार अपनों को खोने के दर्द के साथ अकेले रह जाते हैं। किसी भी समाज की संवेदनशीलता सिर्फ मुआवजे की रकम से नहीं नापी जाती, बल्कि इससे आंकी जाती है कि वह ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए कितनी गंभीरता दिखाता है।
जरूरत सिर्फ फौरी कार्रवाई की नहीं है, बल्कि जवाबदेही तय करने, निर्माण और अग्नि सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराने और दोषियों के खिलाफ तय समय में कार्रवाई पक्की करने की है। अगर हर हादसे के बाद बस शोक, मुआवजा और आश्वासन ही दोहराए जाते रहे, तो यह सिर्फ व्यवस्था पर नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक याददाश्त और संवेदनशीलता पर भी सवालिया निशान होगा।
देर से टूटी प्रशासन की नींद, चला जांच अभियान
लखनऊ की आगजनी की घटना के बाद मथुरा प्रशासन की गहरी नींद आखिरकार टूटी। आनन-फानन में सिटी मजिस्ट्रेट अनुपम मिश्र की अगुवाई में अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरण की टीमें बीएसए इंजीनियरिंग कॉलेज के पास चल रहे कोचिंग सेंटरों की जांच के लिए पहुंचीं। टीम के आने की भनक लगते ही ज्यादातर कोचिंग संचालक शटर गिराकर और ताला जड़कर भाग खड़े हुए। जिन सेंटरों की जांच हुई, उनमें से कुछ को सील भी कर दिया गया।
प्रशासन ने कार्रवाई कर अपना काम तो दिखा दिया, लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि हादसा होने के बाद ही प्रशासन क्यों जागता है। अगर पहले से ही सख्ती बरती जाती, तो शायद हालात इस कदर बेकाबू न होते।
मुद्दा ठंडा होते ही फिर लौटेगा वही ढर्रा
ग्राउंड जीरो की हकीकत यह है कि ये कोचिंग सेंटर बिना रजिस्ट्रेशन और बिना फायर एनओसी के चल रहे थे। सिटी मजिस्ट्रेट अनुपम मिश्र ने बताया कि शासन से निर्देश मिले थे कि अवैध कोचिंगों को सील करने की प्रक्रिया अमल में लाई जाए। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि कार्रवाई हादसे के बाद ही क्यों होती है, तो इसका कोई संतोषजनक जवाब वे नहीं दे सके।
बीएसए इंजीनियरिंग कॉलेज के पास ज्यादातर कोचिंग और लाइब्रेरी बेसमेंट में चल रही हैं, जहां किसी आपातकाल से निपटने का कोई इंतजाम नहीं है। आशंका यही है कि यह मुद्दा चार दिन गरमाएगा और फिर ठंडा पड़ जाएगा। इसके बाद बीएसए कॉलेज के पास अवैध रूप से कोचिंग चलती रहेगी और कार्रवाई के नाम पर जिला प्रशासन सिर्फ खानापूर्ति करता रहेगा।













