शीर्ष अदालत ने बुधवार 30 सितंबर को एक आपराधिक मामले की प्राथमिकी से जुड़ी जांच प्रक्रिया पर सुनवाई करते हुए प्रांतीय पुलिस व्यवस्था की कार्यशैली पर अत्यंत तीखी नाराजगी व्यक्त की. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की संयुक्त पीठ ने जांच में उजागर हुई विसंगतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि नागरिकों की शिकायतों और आपराधिक मामलों को इसी गैर-जिम्मेदाराना ढर्रे पर निपटाया जाएगा, तो आम जनता का कानून व्यवस्था और खाकी पर से पूरा भरोसा उठ जाएगा. सुनवाई के दौरान पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यह तक कह दिया कि ऐसी अव्यवस्था से तो बेहतर होगा कि इस पूरे पुलिस तंत्र को ही समाप्त कर दिया जाए और उसकी जगह सभी मामलों की तफ्तीश केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी जाए.
रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद प्राथमिकी में अज्ञात दर्ज
अदालत के समक्ष आए इस विवाद की जड़ वह प्राथमिकी बनी, जिसमें एक गंभीर विसंगति स्पष्ट रूप से दिखाई दी. शिकायतकर्ता का स्पष्ट कहना था कि घटना के तुरंत बाद उसने संबंधित मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही स्वयं दबोच लिया था और उसे सीधे ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के सुपुर्द कर दिया था. इस पूरी स्थिति के बावजूद, जब थाने में औपचारिक प्राथमिकी लिखी गई, तो उसमें नामजद आरोपी का कॉलम पूरी तरह छोड़ दिया गया और अज्ञात व्यक्ति के नाम पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया.
पीठ ने इस पहलू पर कड़ा ऐतराज जताते हुए शासन के विधिक प्रतिनिधि से सीधे तीखे प्रश्न किए. अदालत ने जानना चाहा कि जब एक संदिग्ध व्यक्ति को वादी ने घटनास्थल पर ही पकड़कर पुलिस बल को सौंप दिया था, तब आखिर किस आधार और किस विवशता के तहत पुलिस ने एक अनजान और अज्ञात चालक के खिलाफ मामला दर्ज करना जरूरी समझा. पीठ ने स्पष्ट किया कि जब जमीनी सच्चाई कुछ और हो और कागजी दस्तावेज बिल्कुल अलग कहानी बयां करें, तो नागरिक व्यवस्था पर विश्वास कैसे बहाल रह सकता है.
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सामने आया तुषार का नाम
इस पूरे मामले में जांच की दिशा तब और उलझ गई जब उच्च न्यायालय के दखल के बाद वस्तुस्थिति बदलने लगी. शिकायतकर्ता ने शीर्ष पीठ को अवगत कराया कि जब इस मसले को लेकर उच्च न्यायालय में गुहार लगाई गई और वहां से पुलिस को मामले की विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया, तब जाकर पुलिस के दस्तावेजों में उस मोटरसाइकिल चालक का असल नाम दर्ज किया गया.
अदालत के पटल पर रखे गए पुलिस के जवाबी हलफनामे के पैराग्राफ 6 का अवलोकन करने पर यह तथ्य सामने आया कि उस व्यक्ति की पहचान तुषार के रूप में दर्ज की गई थी. हालांकि, विडंबना यह रही कि नाम सामने आने के कुछ ही समय बाद जांच एजेंसी ने उसे इस मामले में क्लीन चिट देकर दोषमुक्त ठहरा दिया. अदालत ने इस पूरे सिलसिले को बेहद संदेहास्पद माना कि जिस व्यक्ति को पहले अज्ञात रखा गया, फिर अदालत के दबाव में नाम तुषार लिखा गया, उसे ही बाद में बिना ठोस आधार के पाक-साफ करार दे दिया गया.
जांच में एजेंडे और लीपापोती के प्रयासों पर कड़ी नाराजगी
शीर्ष पीठ ने जांच अधिकारियों के आचरण की समीक्षा करते हुए टिप्पणी की कि उनके हर कदम में किसी न किसी छिपे हुए एजेंडे की बू आती है. कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा कि किसी वरिष्ठ या उच्चाधिकारी के विधिक निर्देशों का अनुपालन करना अपनी जगह जायज हो सकता है, लेकिन किसी आपराधिक जांच को इस हद तक मोड़ देना और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना पूरी तरह अस्वीकार्य है.
अदालत ने पुलिस की इस संपूर्ण कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर एक कवर अप जॉब करार दिया और कहा कि इस तरह के जोड़-तोड़ पर जितनी कम बात की जाए, उतना ही बेहतर होगा. पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि सुनवाई के दौरान पुलिस व्यवस्था को समाप्त करने और जांच सीबीआई को देने जैसी बातें मौखिक रूप से सामने आई थीं, जो पीठ के गहरे असंतोष को दर्शाती हैं, लेकिन इसे कोई औपचारिक या कानूनी आदेश नहीं माना जाना चाहिए. यह तल्खी सिर्फ यह याद दिलाने के लिए थी कि प्रशासनिक मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
बिना नंबर प्लेट की मोटरसाइकिल पर अचानक उभरा पंजीकरण नंबर
इस जांच में केवल आरोपी का नाम छिपाने तक ही गफलत सीमित नहीं रही, बल्कि भौतिक साक्ष्यों के साथ भी छेड़छाड़ के आरोप सामने आए. शिकायतकर्ता की ओर से पीठ को यह भी जानकारी दी गई कि जब पुलिस ने घटनास्थल से उस मोटरसाइकिल को जब्त किया था, तब उस दोपहिया वाहन पर कोई नंबर प्लेट मौजूद ही नहीं थी. वह पूरी तरह बिना पहचान की गाड़ी थी.
हैरत की बात यह रही कि आगे की जांच प्रक्रिया के दौरान उसी वाहन से जुड़ा एक आधिकारिक पंजीकरण नंबर अचानक पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हो गया. इस चमत्कारिक बदलाव पर अदालत ने सख्त रुख अख्तियार किया और पुलिस प्रशासन से जवाब मांगा कि जब जब्ती के समय वाहन पर नंबर नहीं था, तो बाद के चरणों में यह बदलाव किस आधार पर और किन दस्तावेजों के सहारे दर्ज किया गया. पीठ ने साफ कहा कि घटना के विभिन्न चरणों में तैयार किए गए रिकॉर्ड में आया यह अंतर किसी भी सूरत में विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता.
असंतोषजनक हलफनामे पर अधिकारी को व्यक्तिगत पेशी का फरमान
अदालत ने राज्य पुलिस की ओर से प्रस्तुत किए गए जवाबी हलफनामे को सिरे से खारिज करते हुए उसे पूरी तरह प्रेरणाहीन और औपचारिकता मात्र करार दिया. पीठ का स्पष्ट मानना था कि हलफनामे में उन मूलभूत विसंगतियों का कोई तार्किक या कानूनी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, जो सीधे-सीधे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती हैं.
शीर्ष अदालत ने अब संबंधित जांच अधिकारी को अगली निर्धारित तारीख पर अदालत कक्ष में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का कड़ा निर्देश सुनाया है. अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वह एक बेहतर और विस्तृत हलफनामा तैयार करके लाएं, जिसमें यह साफ किया जाए कि मौके पर पकड़े गए आरोपी को अज्ञात क्यों लिखा गया और बाद में उसका नाम तुषार जोड़ने और फिर उसे दोषमुक्त करने की पूरी प्रक्रिया किन नियमों के तहत पूरी की गई थी.




















