उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है. प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक खामोशी अख्तियार किए रहने वाले कई कद्दावर चेहरे अब खुलकर अपनी ताकत और तेवरों का इजहार कर रहे हैं. पूर्वांचल और अवध के सीमावर्ती इलाकों में खासा प्रभाव रखने वाले देवीपाटन मंडल के दिग्गज राजपूत नेता बृजभूषण शरण सिंह इस सियासी हलचल के मुख्य केंद्र में आ गए हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों में लंबा वक्त गुजारने के बाद पिछले कुछ वर्षों से वे बीजेपी के साथ जुड़े रहे हैं. भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह अपने आक्रामक अंदाज, शक्ति प्रदर्शन और बेबाक बयानों से एक बार फिर सियासी गलियारों में भारी चर्चा बटोर रहे हैं. मंगलवार, 29 सितंबर को अखिलेश यादव की तारीफ करते हुए उनके द्वारा दिया गया बयान ‘बिन अखिलेश सब सूना’ पूरे राजनीतिक परिदृश्य में कौतूहल पैदा कर चुका है. ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जिस नेता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन करके पार्टी में शामिल कराया था और गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं बुलाकर टिकट थमाया था, आखिर उस नेता का पार्टी के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों से मोहभंग क्यों होने लगा है.
कोर्ट से राहत और विरोधियों के प्रति बदलता रुख
हाल के दिनों में महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के चर्चित मामले में अदालत से राहत मिलने के बाद बृजभूषण शरण सिंह के समर्थकों में नया उत्साह देखा जा रहा है. देवीपाटन मंडल समेत उनके प्रभाव वाले समूचे इलाके में उनके कार्यकर्ता जबरदस्त जश्न और सक्रियता के मूड में हैं. इसके साथ ही योग गुरु बाबा रामदेव तथा पतंजलि के उत्पादों पर उनके बेहद तीखे सार्वजनिक हमले और दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं के प्रति उनकी अप्रत्याशित नरमी राजनीतिक जानकारों के कान खड़े कर रही है. विश्लेषक यह आकलन कर रहे हैं कि क्या यह बाहुबली नेता 2027 के महासमर से ठीक पहले कोई नया समीकरण तैयार कर रहा है. उत्तर प्रदेश की सियासत में बृजभूषण शरण सिंह उन चुनिंदा क्षेत्रीय क्षत्रपों में गिने जाते हैं जिनका दबदबा केवल अपनी लोकसभा सीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे प्रशासनिक मंडल और उसके आसपास के जिलों में चुनाव की दिशा बदलने की कुव्वत रखते हैं. पूर्वांचल और अवध के मिलन बिंदु पर मौजूद देवीपाटन मंडल दशकों से उनका अभेद्य सियासी किला माना जाता है.
गोंडा से लेकर तराई पट्टी तक फैला राजनीतिक साम्राज्य
बृजभूषण शरण सिंह का गृह जनपद गोंडा उनके समूचे राजनीतिक तंत्र की धुरी रहा है. जिले की गोंडा सदर, कर्नलगंज, कटरा बाजार और तरबगंज जैसी प्रमुख विधानसभा सीटों पर उनका सीधा दखल और प्रभाव किसी से छिपा नहीं है. वे स्वयं कैसरगंज लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं और वर्तमान में उनके बेटे करण भूषण सिंह इसी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. पड़ोसी जिले बहराइच की बात करें तो महसी, पयागपुर और कैसरगंज विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय ठाकुर मतदाताओं और आम जनमानस के बीच उनकी पकड़ अत्यंत मजबूत है. इसके अलावा बलरामपुर वह जिला है जहां से उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन की नींव रखी थी. बलरामपुर के तुलसीपुर, गैसड़ी तथा श्रावस्ती की भिनगा विधानसभा सीट पर उनके निष्ठावान कार्यकर्ताओं का बहुत बड़ा संजाल सक्रिय है. राम मंदिर आंदोलन में शुरुआती दौर से सक्रिय भागीदारी के चलते अयोध्या, बस्ती, संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर के कई इलाकों में भी उनका सीधा सामाजिक प्रभाव है. इन जिलों में उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक गतिविधियों ने उन्हें जमीनी स्तर पर एक मजबूत जनाधार दिया है.
बीजेपी के चुनावी गणित और 12 से 18 सीटों पर असर
विधानसभा सीटों के अंकगणित के मुताबिक देवीपाटन मंडल के चार जिलों गोंडा, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती को मिलाकर कुल 16 विधानसभा सीटें आती हैं. इसके अलावा पड़ोस के अयोध्या और बस्ती मंडल की लगभग 8 से 10 ऐसी सीटें हैं जहां ठाकुर बिरादरी के मतदाता किसी भी प्रत्याशी की जीत अथवा हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यदि बृजभूषण शरण सिंह 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी से पूरी तरह अलग राह चुनते हैं या फिर पर्दे के पीछे रहकर पार्टी के उम्मीदवारों का विरोध करते हैं, तो बीजेपी को सीधे तौर पर 12 से 18 विधानसभा सीटों पर बेहद कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है. अवध और तराई पट्टी के इलाके में राजपूत समाज के साथ-साथ बृजभूषण का अपना एक वफादार समर्थक वर्ग है. यह व्यक्तिगत वोट बैंक जिस भी तरफ झुकेगा, वहां चुनावी नतीजों का अंतर तय होना बिल्कुल स्वाभाविक माना जा रहा है.
मुलायम सिंह यादव के साथ साझा अखाड़ा और ऐतिहासिक रिश्ते
समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ बृजभूषण शरण सिंह का नाता कभी भी पारंपरिक राजनीतिक कटुता के दायरे में नहीं बंधा रहा, बल्कि यह व्यक्तिगत आत्मीयता पर टिका रहा है. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बृजभूषण शरण सिंह दोनों की ही पृष्ठभूमि पहलवानी और कुश्ती से जुड़ी रही. दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और दलों में रहे, फिर भी दोनों के बीच हमेशा एक अनकहा आपसी आदर भाव मौजूद रहा. वर्ष 2008 का वह दौर बेहद अहम था जब भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन सरकार संकट में घिर गई थी. उस वक्त बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को सरकार के खिलाफ मतदान करने का व्हिप जारी किया था, लेकिन बृजभूषण सिंह ने मुलायम सिंह यादव के एक आह्वान पर सपा के रुख का समर्थन किया था. इस घटनाक्रम के बाद वे समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर कैसरगंज से लोकसभा सदस्य भी चुने गए थे. मुलायम सिंह यादव अक्सर सार्वजनिक मंचों से बृजभूषण की दबंग कार्यशैली और खेल के प्रति उनके समर्पण की खुलकर सराहना करते रहे थे.
अखिलेश यादव के साथ मधुर समीकरण और बचपन की पहचान
मुलायम सिंह यादव के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ भी बृजभूषण शरण सिंह की केमिस्ट्री कभी तल्ख नहीं हुई. जब महिला पहलवानों के धरने और आंदोलन के दौरान बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बैकफुट पर दिखाई दे रहा था और पार्टी के कई बड़े नेता चुप्पी साधे हुए थे, उस नाजुक समय में भी अखिलेश यादव ने बृजभूषण पर कोई व्यक्तिगत हमला या अमर्यादित टिप्पणी नहीं की थी. अखिलेश यादव ने लगातार यही कहा था कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष कानूनी जांच होनी चाहिए. इसके प्रत्युत्तर में बृजभूषण शरण सिंह ने भी कई मौकों पर अखिलेश यादव के प्रशासनिक कौशल और मुख्यमंत्री काल के अनुभवों की सार्वजनिक तौर पर तारीफ की. 29 सितंबर को उनके द्वारा दिया गया बयान ‘अखिलेश के बिना सब सूना है’ इन्हीं पुराने रिश्तों की गर्माहट को उजागर करता है. बृजभूषण स्वयं इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि वे अखिलेश को उनके बचपन के दिनों से जानते हैं. वे कई मर्तबा अपने पहलवानों को लेकर सैफई के दंगल में शामिल होने गए थे, जहां अखिलेश और मुलायम सिंह दोनों उनके कुश्ती आयोजनों में शिरकत करते थे. राजनीतिक विरोध के बावजूद दोनों नेताओं के बीच एक पुराना पारिवारिक और व्यक्तिगत आदर बना हुआ है.
सोशल मीडिया पर अनप्रिडिक्टेबल तेवर और आक्रामक राजनीति
सोशल मीडिया पर बृजभूषण शरण सिंह से जुड़ा हर छोटा-बड़ा घटनाक्रम लगातार ट्रेंड करता रहता है. इसके पीछे उनका अप्रत्याशित और आक्रामक सियासी व्यवहार मुख्य वजह है. चाहे वह बाबा रामदेव के पतंजलि उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए तीखा जुबानी हमला बोलना हो, या फिर अपनी ही पार्टी के कुछ शीर्ष फैसलों और स्थानीय नेताओं पर तंज कसना हो, बृजभूषण हमेशा आक्रामक मुद्रा में दिखाई देते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक के राजनीतिक पंडित अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि देवीपाटन का यह बाहुबली नेता 2027 के चुनाव में बीजेपी के साथ रहकर सौदेबाजी करेगा या फिर समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर पूरे अवध मंडल का सियासी नक्शा बदलने का फैसला करेगा.




















