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पिता को स्वाभाविक अभिभावक मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया फैसला, एक महीने में ननिहाल पक्ष सौंपे मासूम की कस्टडीउत्तर प्रदेश
28 अग॰ 2026, 7:50 am (1 घंटे पहले)· 5

पिता को स्वाभाविक अभिभावक मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया फैसला, एक महीने में ननिहाल पक्ष सौंपे मासूम की कस्टडी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता के स्वाभाविक अभिभावक होने के अधिकार पर मुहर लगाते हुए ननिहाल वालों को एक महीने के भीतर बच्ची की कस्टडी सौंपने का आदेश दिया है।

बच्चियों की कस्टडी और गार्जियनशिप से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिता के कानूनी अधिकारों को प्राथमिकता देने वाला बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता ही नाबालिग बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक होता है। जब तक यह सिद्ध न कर दिया जाए कि पिता अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह अयोग्य है, तब तक ननिहाल पक्ष या कोई अन्य रिश्तेदार उसे अपनी ही बेटी की कस्टडी देने से इनकार नहीं कर सकता। इस सिद्धांत को रेखांकित करते हुए अदालत ने ननिहाल में रह रही बच्ची को एक महीने के भीतर उसके पिता को सौंपने का स्पष्ट आदेश जारी किया है।

निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती

प्रयागराज के रहने वाले पेशे से अधिवक्ता अभिषेक यादव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक विशेष अपील दायर की थी। उन्होंने फैमिली कोर्ट (ट्रायल कोर्ट) के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें अदालत ने उनकी नाबालिग बेटी की कस्टडी उन्हें देने की याचिका को खारिज कर दिया था। इस अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की डिवीजन बेंच ने मामले के सभी पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया। बेंच ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 के कानूनी प्रावधान बहुत स्पष्ट हैं। कानून के मुताबिक, बच्चों की कस्टडी और देखभाल का सबसे प्राथमिक और सर्वोच्च अधिकार पिता के पास ही होता है, जिसे केवल निराधार आरोपों के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

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पारिवारिक पृष्ठभूमि और विवाद की शुरुआत

इस मामले का घटनाक्रम वर्ष 2019 से शुरू होता है, जब अभिषेक यादव का विवाह हुआ था। इसके बाद वर्ष 2022 में इस दंपत्ति के घर एक बेटी ने जन्म लिया। हालांकि, पारिवारिक मतभेदों के चलते वर्ष 2023 में अभिषेक की पत्नी के भाई उसे और उसकी मासूम बच्ची को अपने साथ मायके ले गए। इसके अगले वर्ष, यानी 2024 में अभिषेक की पत्नी का निधन हो गया। पत्नी की दुखद मृत्यु के बाद जब पिता अभिषेक यादव ने अपनी बेटी की कस्टडी मांगी, तो उनकी पत्नी के पिता (बच्ची के नाना) और तीन भाइयों (बच्ची के मामा) ने बच्ची को सौंपने से साफ इनकार कर दिया। इसके चलते अभिषेक को अपनी बेटी को वापस पाने के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

रिश्तेदारों के आरोप और ट्रायल कोर्ट की अस्वीकृति

मामले की सुनवाई के दौरान ननिहाल पक्ष (प्रतिवादियों) ने कोर्ट में अभिषेक यादव के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि अभिषेक ने अपनी दिवंगत पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया था और उसके साथ शारीरिक हिंसा भी की थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि बच्ची महज कुछ ही महीनों की उम्र से अपने नाना के साथ रह रही थी और अभिषेक के भविष्य में दोबारा शादी करने की प्रबल संभावना है। इन दलीलों के आधार पर निचली अदालत ने पिता की याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन आरोपों और परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन किया और पाया कि केवल आशंकाओं या अप्रमाणित आरोपों के आधार पर पिता का स्वाभाविक अभिभावक का हक समाप्त नहीं हो जाता।

बच्ची के भविष्य और स्थिरता पर हाई कोर्ट का दृष्टिकोण

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्ची के रहने की मौजूदा स्थिति पर ध्यान केंद्रित करते हुए कई अहम टिप्पणियां कीं। बेंच ने पाया कि बच्ची किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रह रही थी, बल्कि बारी-बारी से अपने नाना और अपनी मौसी के घर भेजी जा रही थी। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जिस मौसी के पास बच्ची को रखा जा रहा था, उनके खुद के पहले से पाँच बच्चे हैं। ऐसी स्थिति में प्रतिवादी अकेले उस बच्ची की पूरी देखभाल नहीं कर रहे थे। अदालत ने माना कि अचानक वातावरण बदलने के कारण बच्ची को अपने पिता और उनके परिवार के साथ तालमेल बिठाने में शुरुआत में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं। इसके बावजूद, कोर्ट ने कहा कि यदि बच्ची को प्रतिवादियों के पास ही रहने दिया जाता है, तो उसका भविष्य सुरक्षित और स्थिर नज़र नहीं आता।

कस्टडी सौंपने का अंतिम निर्देश

डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियों में बदलाव के कारण बच्ची को शुरुआत में जो थोड़ी-बहुत परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं, उनकी वजह से उसके बेहतर और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। पिता के पास बच्चे को बेहतर माहौल और अवसर देने की क्षमता है। इन सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का पुराना आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने प्रतिवादियों (नाना और मामा) को सख्त निर्देश दिया कि वे इस फैसले के जारी होने के एक महीने के भीतर नाबालिग बच्ची की कस्टडी हर हाल में उसके पिता अभिषेक यादव को सौंप दें।

सवाल-जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कस्टडी मामले में क्या मुख्य फैसला दिया?
हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता को स्वाभाविक अभिभावक होने के नाते बेटी की कस्टडी से तब तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक वह अयोग्य साबित न हो।
याचिकाकर्ता कौन हैं और यह मामला कब शुरू हुआ?
यह याचिका प्रयागराज के अधिवक्ता अभिषेक यादव ने दायर की थी, जिनकी शादी 2019 में हुई थी और 2022 में बेटी का जन्म हुआ था।
ननिहाल पक्ष ने कस्टडी का विरोध किस आधार पर किया था?
ननिहाल पक्ष ने दहेज प्रताड़ना, शारीरिक शोषण और पिता के दोबारा शादी करने की संभावना के आरोप लगाकर बच्ची की कस्टडी देने से इनकार किया था।
अदालत ने बच्ची के मौजूदा रहने के माहौल के बारे में क्या कहा?
अदालत ने नोट किया कि बच्ची बारी-बारी से नाना और मौसी के घर रह रही थी, जहाँ मौसी के खुद पाँच बच्चे थे, जिससे उसका भविष्य सुरक्षित और स्थिर नहीं दिख रहा था।
हाई कोर्ट ने ननिहाल पक्ष को बच्ची सौंपने के लिए कितना समय दिया है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रतिवादियों को आदेश दिया है कि वे एक महीने के भीतर बच्ची की कस्टडी उसके पिता अभिषेक यादव को सौंप दें।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·21 मिनट पहले

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला बाल कस्टडी के मामलों में कानूनी प्रावधानों और भावनात्मक दावों के बीच संतुलन पर एक स्पष्ट संदेश देता है। हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट के तहत प्राकृतिक अभिभावक के अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए अदालत ने यह तय कर दिया है कि बिना ठोस सबूत के निराधार आरोपों के आधार पर पिता को उसके विधिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। आगे चलकर इस तरह के मामलों में पारिवारिक न्यायालयों को गार्जियनशिप तय करते समय साक्ष्यों की सत्यता पर और अधिक सख्ती से गौर करना होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·21 मिनट पहले

यह फैसला पारिवारिक अदालतों के लिए एक अहम मिसाल बनेगा जहाँ अक्सर बिना पुख्ता सबूतों के केवल भावनाओं और दावों के आधार पर कस्टडी के मामले लंबे खिंच जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वैधानिक अधिकारों को दरकिनार करने के लिए केवल आरोप काफी नहीं हैं, बल्कि उनके समर्थन में कानूनी रूप से ठोस साक्ष्य होना अनिवार्य है। इससे आने वाले समय में बाल संरक्षण और गार्जियनशिप से जुड़े मुकदमों की सुनवाई में पारदर्शिता और तेजी आने की उम्मीद है।

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