रायबरेली जिले में धान की रोपाई का आधा काम पूरा हो चुका है, लेकिन इसी बीच किसानों के सामने एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। समय से पहले की गई रोपाई में कीट लगने की आशंका वैसे भी ज्यादा रहती है, और इस मौसम में सबसे बड़ा खतरा भूरा फुदका कीट बनकर उभरा है, जो धान की फसल के लिए सबसे विनाशकारी कीटों में गिना जाता है। पिछले कुछ दिनों से रुक-रुक कर हो रही बारिश ने इस कीट के फैलने की संभावना और बढ़ा दी है, क्योंकि यह कीट पौधों के तनों का रस चूसकर पूरे खेत को झुलसा सकता है। इसी झुलसने की अवस्था को कृषि भाषा में हॉपरबर्न कहा जाता है।
नमी और गर्मी में तेजी से फैलता है यह कीट
रायबरेली के राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के प्रभारी अधिकारी शिव शंकर वर्मा का कहना है कि भूरा फुदका कीट खासतौर पर नमी और ज्यादा तापमान वाली परिस्थितियों में तेजी से पनपता है। शिव शंकर वर्मा कृषि क्षेत्र में करीब 10 वर्षों का अनुभव रखते हैं और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर चुके हैं। उनके मुताबिक यह कीट खेत में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन के इस्तेमाल, अत्यधिक गर्मी और खेत में पानी भरे रहने की स्थिति में और भी ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यही वजह है कि लगातार हो रही बारिश के इस मौसम में किसानों को खासतौर पर सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि नमी और तापमान दोनों मिलकर इस कीट को पनपने का पूरा मौका दे देते हैं।
कैसे पहचानें भूरा फुदका कीट
किसानों के लिए इस कीट की पहचान करना बेहद जरूरी है, तभी वे समय रहते अपनी फसल बचा सकते हैं। भूरा फुदका कीट आकार में बेहद छोटा होता है, इसकी लंबाई करीब 4-5 मिलीमीटर होती है। इसका रंग हल्का भूरा या गहरा भूरा होता है और इसके पंख पारदर्शी होते हैं, जिन पर पीठ की तरफ अंग्रेजी के वी अक्षर जैसा निशान बना होता है। यह कीट धान के पौधों की निचली पत्तियों और तनों पर बैठकर रस चूसता है। अगर खेत को गौर से देखा जाए, तो यह अक्सर पत्तियों के निचले हिस्से में समूह बनाकर बैठा नजर आता है, इसलिए फसल का बारीकी से निरीक्षण करना बेहद जरूरी हो जाता है।
फसल को कितना नुकसान पहुंचाता है
इस कीट की चपेट में आने के बाद पौधे पीले पड़ने लगते हैं और कमजोर दिखने लगते हैं। धीरे-धीरे पत्तियां मुरझाकर सूखने लगती हैं, और अगर कीट का प्रकोप ज्यादा हो जाए तो पूरा खेत जला हुआ जैसा दिखने लगता है, इसी अवस्था को हॉपरबर्न कहते हैं। इसके अलावा फुदका कीट के हमले से पौधों की बढ़वार भी रुक जाती है और वे सामान्य से छोटे रह जाते हैं। इसका सीधा असर धान की बालियों की संख्या पर पड़ता है, जो घटकर काफी कम हो जाती हैं, और नतीजे में किसानों को उपज में भारी गिरावट झेलनी पड़ती है।
बचाव के लिए क्या करें किसान
शिव शंकर वर्मा के मुताबिक खेत में पानी की सही निकासी सुनिश्चित करना सबसे जरूरी कदम है, क्योंकि भूरा फुदका कीट नमी वाले खेतों में सबसे तेजी से फैलता है, इसलिए जल प्रबंधन पर खास ध्यान देना चाहिए। अगर खेत में कीट की संख्या ज्यादा दिखे, तो किसानों को कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही उचित कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए। इमिडाक्लोप्रिड, थायोमेथोक्सम और बुप्रोफेजिन जैसे कीटनाशक इस कीट पर असरदार साबित हो सकते हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, ताकि फसल और मिट्टी दोनों सुरक्षित रहें।
कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करते रहें और पत्तियों व तनों पर कीट की मौजूदगी की जांच करें, ताकि शुरुआती चरण में ही इसकी पहचान हो सके और समय रहते बचाव किया जा सके। थोड़ी सी सतर्कता और सही समय पर उठाया गया कदम धान की पूरी फसल को बड़े नुकसान से बचा सकता है।




















