धान की रोपाई के बाद पहले तीन-चार हफ्ते खेत के लिए सबसे नाजुक दौर माने जाते हैं, क्योंकि ठीक इसी वक्त चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तेजी से पनपने लगते हैं और धान के नन्हे पौधों से पानी, पोषण और धूप छीनने लगते हैं. शाहजहांपुर के किसान रनजोद सिंह लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि अगर रोपाई के 20 से 35 दिनों के भीतर इन खरपतवारों पर काबू नहीं पाया गया, तो पूरी फसल पर सीधा असर पड़ता है और किसान की मेहनत पर पानी फिर सकता है.
कौन-कौन से पौधे बिगाड़ते हैं धान की सेहत
रनजोद सिंह के अनुसार धान के खेतों में सबसे ज्यादा दिक्कत करने वाले खरपतवारों में बथुआ, खुरंड, मिरचिया, केंकवा और जलकुंभी या पानी की बूटियां शामिल हैं. वैज्ञानिक भाषा में बथुआ को Chenopodium album, खुरंड को Chrozophora rottleri और केंकवा को Commelina benghalensis के नाम से जाना जाता है. रोपाई खत्म होते ही ये पौधे मिट्टी से सिर उठाने लगते हैं और चौड़ी पत्तियों के चलते बहुत कम समय में पूरे खेत में पसर जाते हैं. एक बार जड़ जमा लेने के बाद ये इतनी तेजी से फैलते हैं कि कुछ ही हफ्तों में पूरा खेत इनकी चपेट में आ जाता है, जिससे धान की मुख्य फसल की बढ़वार वहीं थम जाती है.
क्यों इतना नुकसानदायक है इनका फैलाव
ये खरपतवार जड़ों के जरिए वही नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश सोख लेते हैं, जो असल में धान के पौधों को मिलना चाहिए था. इनकी बड़ी और चौड़ी पत्तियां सूरज की रोशनी को नीचे तक पहुंचने ही नहीं देतीं, जिससे धान की पत्तियों में भोजन बनाने यानी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सुस्त पड़ जाती है. इसके अलावा घनी पत्तियों वाला यह जंगल हानिकारक कीड़ों को छिपने की सुरक्षित जगह भी दे देता है, जिससे कीट प्रकोप का खतरा अलग से बढ़ जाता है. नतीजा यह होता है कि धान के पौधे दुबले और कमजोर रह जाते हैं, उनमें कल्लों यानी नई शाखाओं की संख्या घट जाती है और आखिर में दाने का वजन व गुणवत्ता दोनों गिर जाते हैं. समय रहते नियंत्रण न किया जाए, तो कुल पैदावार में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, जो किसी भी किसान परिवार के लिए भारी नुकसान है.
रसायन का सहारा लेने से पहले अपनाएं ये तरीके
रनजोद सिंह की सलाह है कि किसानों को सिर्फ दवाओं पर टिके रहने के बजाय एकीकृत खरपतवार प्रबंधन यानी IWM का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि यह तरीका ज्यादा सुरक्षित और लंबे समय तक टिकाऊ रहता है. इसमें हाथ से निराई-गुड़ाई करना, खेत में पानी का सही प्रबंधन रखना और बुआई के लिए प्रमाणित बीजों का चुनाव करना शामिल है. अगर रोपाई या बुआई से पहले खेत की गहरी जुताई कर दी जाए, तो मिट्टी में छिपे शुरुआती खरपतवार के बीज वहीं नष्ट हो जाते हैं और आगे चलकर परेशानी कम होती है. इसके साथ ही रोपाई के बाद तीन से चार हफ्तों तक खेत में 4 से 5 सेंटीमीटर पानी भरा रखने से चौड़ी पत्ती वाले बीजों को अंकुरित होने का मौका ही नहीं मिलता, जिससे रासायनिक छिड़काव की जरूरत खुद ब खुद कम हो जाती है.
ज्यादा प्रकोप होने पर कब और कैसे करें छिड़काव
रनजोद सिंह के मुताबिक अगर इन उपायों के बावजूद खरपतवार का प्रकोप बहुत ज्यादा दिखे, तो रासायनिक खरपतवारनाशक का इस्तेमाल आखिरी और सबसे असरदार विकल्प बचता है. इसके लिए रोपाई के 20 से 25 दिन बाद, जब खरपतवारों में 2 से 4 पत्तियां निकल चुकी हों, तब मेटसल्फ्यूरॉन मिथाइल और क्लोरीम्यूरॉन इथाइल के मिश्रण यानी अल्मिक्स की 8 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से घोलकर छिड़कनी चाहिए. छिड़काव के वक्त खेत में नमी जरूर होनी चाहिए, लेकिन पानी लबालब भरा नहीं होना चाहिए, वरना दवा ठीक से असर नहीं दिखा पाती. साथ ही हमेशा फ्लैट फैन नोजल का ही इस्तेमाल करें, ताकि दवा खेत के हर कोने में बराबर मात्रा में पहुंच सके. रनजोद सिंह चेताते हैं कि बिना सोचे-समझे बार-बार छिड़काव करने से खरपतवारों में दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और लगातार रसायन डालने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर भी बुरा असर पड़ता है, इसलिए छिड़काव तभी करें जब सच में इसकी जरूरत हो.


















