रामपुर स्थित जौहर यूनिवर्सिटी के परिसर और उसके 38 भवनों को लेकर चल रहा विवाद इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में छाया हुआ है। हर तरफ मुकदमों, छात्रों के प्रदर्शन और कानूनी दांवपेच की चर्चा हो रही है। लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मामले के शोर में एक ऐसी जमीनी सच्चाई दब गई है जिसने पिछले बीस सालों से कई परिवारों की जिंदगी को नर्क बना दिया है। यूनिवर्सिटी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क के किनारे रहने वाले आम नागरिक आज भी एक ऐसी भीषण समस्या से जूझ रहे हैं जिसकी शुरुआत दो दशक पहले हुई थी। जब समाजवादी पार्टी की सरकार के कार्यकाल में इस भव्य विश्वविद्यालय के लिए सड़क का निर्माण किया जा रहा था, तब योजनाकारों ने स्थानीय निवासियों की बुनियादी सुविधाओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। दर्जनों घरों के ठीक सामने तीन से साढ़े तीन फीट ऊंची कंक्रीट की दीवार या रेलिंग खड़ी कर दी गई। इस अमानवीय निर्माण ने रातों-रात लोगों के घरों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए। आज भी हालात जस के तस हैं और लोग अपने ही घर से बाहर निकलने के लिए दीवार फांदने को मजबूर हैं।
किसानों और बुजुर्गों के लिए रोजमर्रा की यातना
इस सड़क के किनारे रहने वाले ज्यादातर परिवार किसानी और कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं। उनके लिए यह दीवार सिर्फ एक रुकावट नहीं है, बल्कि उनकी आजीविका पर एक बड़ा प्रहार है। स्थानीय निवासी राजू ने इस पीड़ा को बयां करते हुए बताया कि जब सड़क बन रही थी, तभी उनके घरों के आगे यह ऊंची दीवार खींच दी गई थी। किसानों को अपने खेतों तक जाने के लिए भारी मशीनरी और ट्रैक्टर की जरूरत होती है। दरवाजे के सामने दीवार होने के कारण वे अपने वाहन घर के पास नहीं ला सकते। उन्हें अपने ट्रैक्टर और अन्य जरूरी गाड़ियां काफी दूर खड़ी करनी पड़ती हैं। इससे उनका रोजाना का काम बुरी तरह प्रभावित होता है और खेती से जुड़े रोजमर्रा के कार्यों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। राजू का कहना है कि उन्होंने उस समय भी अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठाया था, लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी।
युवाओं और किसानों के साथ-साथ यह रुकावट बुजुर्गों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इसी इलाके में रहने वाली 70 वर्षीय मूर्ति देवी पिछले कई सालों से इस दीवार के कारण शारीरिक और मानसिक यातना झेल रही हैं। उम्र के इस नाजुक पड़ाव पर उनके लिए हर दिन इस साढ़े तीन फीट ऊंची दीवार को पार करना किसी खौफनाक सजा से कम नहीं है। मूर्ति देवी ने बताया कि दीवार फांदते समय कई बार उनका पैर फिसल चुका है और वे गंभीर रूप से घायल भी हो चुकी हैं। हर सुबह जब उन्हें किसी काम से घर से बाहर कदम रखना होता है, तो गिरने और चोटिल होने का डर उन्हें सताता रहता है। उन्होंने भारी मन से सवाल किया कि आखिर किस जुर्म में उनके घर का रास्ता इस तरह बंद कर दिया गया और इतने साल बीत जाने के बाद भी प्रशासन ने उनकी गुहार क्यों नहीं सुनी।
स्कूल का मुख्य द्वार बंद, छात्रों का भविष्य दांव पर
प्रशासनिक लापरवाही और गलत निर्माण का खामियाजा सिर्फ घरों में रहने वाले परिवारों को ही नहीं उठाना पड़ा है, बल्कि इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ा है। इसी विवादित सड़क पर कृष्ण कबीर जूनियर हाई स्कूल स्थित है। यह शिक्षण संस्थान साल 1998 से इलाके के बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहा है। स्कूल के प्रधानाचार्य अजय दिवाकर ने इस पूरी त्रासदी का दर्दनाक पहलू साझा किया। उनके अनुसार, जब जौहर यूनिवर्सिटी के लिए सड़क चौड़ीकरण और निर्माण का काम शुरू हुआ, तब बिना किसी पूर्व सूचना के स्कूल के दो से चार कमरे सड़क के दायरे में आ गए और उन्हें तोड़ दिया गया। हद तो तब हो गई जब निर्माण एजेंसी ने स्कूल के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने वही ऊंची दीवार खड़ी कर दी, जिससे छोटे बच्चों का स्कूल के अंदर जाना लगभग असंभव हो गया।
इस लापरवाही का परिणाम यह हुआ कि स्कूल का संचालन बुरी तरह चरमरा गया। प्रधानाचार्य ने बताया कि उन्होंने शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन से कई बार शिकायतें कीं, लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला गया। हालात इतने बदतर हो गए कि बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूल को लगभग चार साल तक पूरी तरह बंद रखना पड़ा। यह इलाके के बच्चों के भविष्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ था। वर्तमान समय में यह स्कूल किसी तरह दोबारा शुरू हुआ है और यहां आठवीं कक्षा तक लगभग 280 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। हालांकि, मुख्य द्वार के सामने की वह पुरानी परेशानी आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है, जिससे छात्रों और शिक्षकों को हर दिन जूझना पड़ता है।
न्याय की गुहार और प्रशासन की उदासीनता
पिछले बीस वर्षों का यह घटनाक्रम सरकारी तंत्र की घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है। एक तरफ जहां शिक्षा के नाम पर एक बड़े विश्वविद्यालय का निर्माण किया गया, वहीं दूसरी तरफ उसी के रास्ते में रहने वाले आम लोगों और एक छोटे स्कूल को बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया गया। जब यह दीवार बन रही थी, तब भी लोगों ने आवाज उठाई थी, लेकिन उस समय किसी अधिकारी ने संज्ञान नहीं लिया। आज भी ये पीड़ित परिवार इसी उम्मीद में बैठे हैं कि कोई उनके हालात का जायजा लेगा और उनके घरों के सामने खड़ी इस तीन फीट की कैद को हटाकर उन्हें आसानी से आने-जाने का हक देगा।



















