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सहारनपुर में वर्गीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान की पहल, नब्बे फीसदी बछिया पैदा होने की उम्मीदउत्तर प्रदेश
21 अक्तू॰ 2026, 7:39 am (5 मिनट पहले)· 1

सहारनपुर में वर्गीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान की पहल, नब्बे फीसदी बछिया पैदा होने की उम्मीद

सहारनपुर पशुपालन विभाग ने गोवंश में बछियों की संख्या बढ़ाने और आवारा मवेशियों की समस्या घटाने के लिए वर्गीकृत वीर्य तकनीक की शुरुआत की है।

दुग्ध उत्पादन करने वाले किसानों की लंबे समय से यह मांग रही है कि उनकी गायें बछिया को जन्म दें, ताकि आगे चलकर डेयरी व्यवसाय को विस्तार मिल सके। आधुनिक खेती में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण नर गोवंश यानी सांड या बैलों की जरूरत लगातार घट रही है। इसी स्थिति को देखते हुए सहारनपुर के पशुपालन विभाग ने कृत्रिम गर्भाधान की एक उन्नत तकनीक को धरातल पर उतारना शुरू कर दिया है। इस पद्धति के तहत वर्गीकृत वीर्य का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे गायों में मादा बछड़ों के जन्म लेने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

प्रयोगशाला में तैयार होता है वर्गीकृत वीर्य

कृत्रिम गर्भाधान की इस नई वैज्ञानिक तकनीक में वीर्य को प्रयोगशाला के भीतर खास जांच और छंटाई प्रक्रिया से गुजारा जाता है। प्रयोगशाला में वीर्य को इस प्रकार छांटा जाता है कि गर्भाधान कराने के बाद मादा यानी बछिया पैदा होने की संभावना लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान में 50 प्रतिशत नर और 50 प्रतिशत मादा पैदा होने की बराबर संभावना रहती थी। वर्गीकृत वीर्य तकनीक के आ जाने से नर बछड़ों के जन्म दर में भारी गिरावट आएगी, जिससे सीधे तौर पर किसानों को बड़ा लाभ मिलेगा।

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लावारिस गोवंश की चुनौती से मिलेगी राहत

सहारनपुर के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. मदन पाल सिंग गौर ने इस व्यवस्था पर बात करते हुए बताया कि वर्तमान समय में अनुपयोगी नर गोवंश की तादाद लगातार बढ़ रही है। खेतों में जुताई और ढुलाई के लिए बैलों का इस्तेमाल लगभग खत्म होने की वजह से किसान नर बछड़ों को पालने से बचते हैं। देखरेख के भारी खर्च से बचने के लिए कई लोग नर पशुओं को खुला छोड़ देते हैं, जिसके कारण सड़कों और कस्बों में लावारिस मवेशियों का जमावड़ा लग जाता है। यह स्थिति आम नागरिकों के लिए दुर्घटनाओं का सबब बनती है और प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है।

दुग्ध उत्पादन और नस्ल में सुधार

इस आधुनिक विधि के व्यापक प्रसार से न केवल सड़कों पर आवारा पशुओं की समस्या थमेगी, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल की बछिया पैदा होने से डेयरी सेक्टर को भी मजबूती मिलेगी। जब उन्नत नस्ल की मादा संतति तैयार होगी, तो पशुपालकों के यहां दूध के कुल उत्पादन में उल्लेखनीय इजाफा देखने को मिलेगा। आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हो सकती है, क्योंकि उन्हें अनुपयोगी नर गोवंश के भरण पोषण पर अतिरिक्त धन खर्च नहीं करना पड़ेगा।

पशु अस्पतालों और गर्भाधान केंद्रों पर सुविधा शुरू

पशुपालन विभाग की योजना इस तकनीक को जिले के प्रत्येक गांव और किसान तक पहुंचाने की है। डॉ. मदन पाल सिंग गौर के अनुसार सहारनपुर के सभी कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों और पशु चिकित्सालयों में अब वर्गीकृत वीर्य की उपलब्धता सुनिश्चित कर दी गई है। किसान अपने नजदीकी पशु अस्पताल अथवा कृत्रिम गर्भाधान केंद्र पर संपर्क करके अपनी गायों के लिए इस विशेष वीर्य का लाभ उठा सकते हैं। विभाग का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा पशुपालकों को जागरूक कर इस तकनीक से जोड़ना है, ताकि जिले के पशुधन प्रबंधन को नया रूप दिया जा सके।

सवाल-जवाब

सहारनपुर में पशुपालन विभाग ने किस नई तकनीक की शुरुआत की है?
विभाग ने गोवंश में कृत्रिम गर्भाधान के लिए प्रयोगशाला में तैयार वर्गीकृत वीर्य तकनीक की शुरुआत की है।
वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से बछिया पैदा होने की कितनी संभावना रहती है?
इस तकनीक के माध्यम से लगभग 90 प्रतिशत तक बछिया पैदा होने की संभावना बनती है।
किसानों को नर गोवंश से क्या परेशानी हो रही थी?
खेती में मशीनों के उपयोग के बाद बैलों की जरूरत खत्म हो गई थी, जिससे नर बछड़ों को पालना किसानों के लिए आर्थिक बोझ बन गया था।
सहारनपुर में यह सुविधा कहां उपलब्ध कराई गई है?
यह सुविधा जिले के सभी कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों और पशु अस्पतालों में उपलब्ध करा दी गई है।
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