शीर्ष अदालत में गुरुवार को दो अलग अलग महत्वपूर्ण कानूनी मामलों पर सुनवाई हुई, जिसमें देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने प्रक्रियात्मक नियमों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संतुलन से जुड़े कड़े संदेश दिए। एक ओर जहां चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश में हुई पुलिस मुठभेड़ों से जुड़ी एक पुरानी याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से साफ मना कर दिया, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने न्यायपालिका पर टिप्पणी के मामले में सजा काट रहे यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को अंतरिम राहत देते हुए उनकी छह महीने की जेल की सजा पर रोक लगा दी और रिहाई का आदेश जारी किया।
यूपी एनकाउंटर याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत का कड़ा रुख
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान हुई मौतों के मामले से संबंधित एक महत्वपूर्ण याचिका गुरुवार को देश की शीर्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई। सुनवाई की शुरुआत होते ही याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ के सामने मामले को प्राथमिकता के आधार पर तुरंत सूचीबद्ध यानी लिस्ट करने का आग्रह किया। याचिकाकर्ता के पक्षकार वकील ने दलील प्रस्तुत की कि यह अति संवेदनशील मामला पिछले एक साल से अधिक समय से अदालत की दैनिक लिस्टिंग प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सका है। वकील का कहना था कि चूंकि मामला लंबे समय से लंबित है और अदालत के समक्ष सुनवाई की बारी नहीं आ सकी है, इसलिए इस पर तत्काल संज्ञान लेकर अगली तारीख तय की जानी चाहिए।
हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। मामले में जल्दबाजी दिखाने पर सवाल उठाते हुए चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी की कि ऐसी भी क्या जल्दबाजी है। शीर्ष अदालत ने अपने रुख में यह बेहद स्पष्ट कर दिया कि केवल इस आधार पर कि कोई मामला एक साल या उससे अधिक समय से लिस्ट नहीं हुआ है, उसे तुरंत अति-आवश्यक मामलों की श्रेणी में सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि प्रकरण को अपनी तय प्रक्रिया और निर्धारित नियमों के अनुसार ही सुनवाई के लिए लाया जाएगा, और किसी भी याचिका को प्रक्रिया से हटकर प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य अहम मामले की सुनवाई हुई, जो दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सजा पाने वाले यूट्यूबर गुलशन पाहुजा से संबंधित था। दिल्ली हाईकोर्ट ने जजों और देश की न्यायिक प्रणाली के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के कारण पाहुजा को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था और उन्हें छह महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट के इस दंडात्मक फैसले के खिलाफ गुलशन पाहुजा ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पाहुजा के अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि उनके मुवक्किल हाईकोर्ट के फैसले के अनुपालन में लगभग 48 दिन जेल में बिता चुके हैं। मामले की समीक्षा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गुलशन पाहुजा की अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के छह महीने के कारावास के आदेश पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि पाहुजा को तुरंत जेल से रिहा किया जाए। कोर्ट ने आदेश की प्रति दस्ती यानी हाथोहाथ सौंपने का भी निर्देश दिया ताकि रिहाई की प्रक्रिया बिना किसी देरी के पूरी हो सके।
दिल्ली हाईकोर्ट की अवमानना कार्यवाही और सजा का आधार
गुलशन पाहुजा के खिलाफ कानूनी विवाद की शुरुआत उनके यूट्यूब चैनल से हुई थी। पाहुजा यूट्यूब पर फाइट 4 ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स नाम से एक चैनल चलाते थे, जिस पर वे न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विभिन्न विषयों, अदालत की कार्यवाही और जजों के कामकाज को लेकर वीडियो अपलोड करते थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन वीडियो में कही गई बातों और इस्तेमाल की गई भाषा का संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी।
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र डुडेजा की पीठ ने मामले पर विस्तृत विचार-विमर्श करने के बाद अप्रैल 2026 में पाहुजा को आपराधिक अवमानना का दोषी करार दिया था। इसके बाद मई 2026 में हाईकोर्ट ने पाहुजा को छह महीने की साधारण कैद के साथ 2,000 रुपये का नकद जुर्माना भरने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि पाहुजा द्वारा प्रसारित सामग्री और उनका आचरण अदालतों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है तथा न्यायपालिका के अधिकार और गरिमा को कमतर आंकने का काम करता है।
अदालती कार्यवाही में आचरण और वकीलों की बिना शर्त माफी
हाईकोर्ट ने अपनी सजा के आदेश में इस बात को रेखांकित किया था कि गुलशन पाहुजा ने अपने बयानों पर कोई पछतावा या खेद प्रकट नहीं किया। अदालत के अनुसार, अवमानना कार्यवाही की सुनवाई के दौरान भी पाहुजा ने न्यायिक व्यवस्था पर अपनी विवादित टिप्पणियां जारी रखीं। दूसरी तरफ, पाहुजा ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया था कि उनके द्वारा बनाए गए वीडियो किसी अवमानना के उद्देश्य से नहीं थे, बल्कि वे अदालतों में पारदर्शिता लाने, न्यायिक सुधारों को बढ़ावा देने और अदालती कार्यवाही की ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग लागू करने के एक अभियान का हिस्सा थे।
इस मामले में दो अन्य वकीलों के खिलाफ भी अवमानना की तलवार लटकी थी, जिन्होंने पाहुजा के चैनल पर साक्षात्कार दिए थे। हालांकि, उन वकीलों ने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगते हुए स्पष्ट किया था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके साक्षात्कार आपत्तिजनक थंबनेल और भ्रामक कैप्शन के साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पोस्ट किए जाएंगे। दिल्ली हाईकोर्ट ने वकीलों की इस सफाई और बिना शर्त माफीनामा को स्वीकार करते हुए उन्हें आपराधिक अवमानना के आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया था।
कानूनी स्थिति और आगे की अदालती प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए रिहाई के इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा गुलशन पाहुजा पर लगाए गए अवमानना के आरोप और दोषसिद्धि पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। शीर्ष अदालत ने केवल अपील के अंतिम फैसले तक छह महीने की कारावास की सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाई है। इसका तात्पर्य यह है कि गुलशन पाहुजा सुनवाई के दौरान जेल से बाहर रहेंगे, लेकिन मामले की मुख्य वैधानिकता और अपील की गुण-दोष के आधार पर अंतिम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी।
इस प्रकार, गुरुवार का दिन सुप्रीम कोर्ट में प्रक्रियात्मक अनुशासन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का उदाहरण रहा। एक तरफ जहां चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने एनकाउंटर मौतों के मामले में केवल समय बीतने के आधार पर तुरंत सुनवाई की मांग को खारिज कर प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया, वहीं दूसरी तरफ जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने 48 दिन की हिरासत काट चुके अवमानना के आरोपी की सजा को निलंबित कर राहत प्रदान की।





















