लखनऊ के सत्ता गलियारों में 2027 के महासमर की बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है। प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर वर्चस्व कायम करने की दौड़ किसी भी एक मुख्य खेमे के लिए आसान नहीं दिखाई दे रही। राज्य में 2012, 2017 और 2022 के आम चुनावों के आंकड़े यह स्पष्ट साबित कर चुके हैं कि महज 1% से 3% मतों पर असर रखने वाले सीमित दायरे के संगठन भी हार और जीत के फासले को तय कर देते हैं। इस वजह से पूर्वांचल के पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि, पश्चिमी जिलों का कृषक-दलित समूह और पड़ोसी राज्य बिहार के सियासी महारथी आने वाले संग्राम में निर्णायक असर डालने के लिए तैयार हैं।
पूर्वी अंचल में सामाजिक समीकरणों का आधार
पूर्वी जिलों के सामाजिक ढांचे को साधे बगैर न तो एनडीए और न ही इंडिया गठबंधन अपनी चुनावी नैया पार लगा सकते हैं। कुर्मी और पटेल बिरादरी में गहरा असर रखने वाला सहयोगी दल वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर और प्रयागराज के दायरे में करीब 15-20 सीटों पर सीधा प्रभाव छोड़ता है। यह प्रभाव एनडीए के संख्याबल को मजबूत आधार देता है।
इसी अंचल में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर का सियासी दखल भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। राजभर समुदाय के मतदाताओं पर ओम प्रकाश राजभर का प्रभाव ऐसा है कि उनके पाला बदलने पर 10-15 सीटों के परिणाम तुरंत उलट-पुलट हो सकते हैं। मऊ, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़ तथा बांदा जैसे क्षेत्रों में यह मत निर्णायक स्थिति पैदा करता है।
अति-पिछड़े वर्गों और पश्चिमी अंचल की बिसात
निषाद पार्टी के प्रमुख डॉ. संजय निषाद ने मल्लाह, केवट, कश्यप और बिंद जैसे अति-पिछड़े तबकों के बीच एक सुदृढ़ पकड़ तैयार की है। यह संगठन गोरखपुर, बस्ती और संत कबीर नगर के इलाके में किसी भी प्रमुख दल की चुनावी रणनीति को बनाने अथवा बिगाड़ने का माद्दा रखता है।
दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका किसान राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण के केंद्र के रूप में उभर रहा है। गन्ने की खेती वाले इस हिस्से में चुनावी सरगर्मी निरंतर बनी रहती है। राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का प्रभाव मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली तथा बागपत के जाट और कृषक बाहुल्य वाले क्षेत्रों में काफी मजबूत है। एनडीए खेमे में उनके शामिल होने से जाट, मुस्लिम और दलित समीकरणों के भीतर बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है।
नए चेहरों की दस्तक और वोटों का विभाजन
नगीना लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित होकर संसद पहुंचे आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने पश्चिमी बेल्ट में प्रतिस्पर्धा को और अधिक पेचीदा बना दिया है। वह नौजवानों के साथ-साथ जाटव और गैरजाटव दलित मतदाताओं के बीच बहुजन समाज पार्टी के एक सशक्त विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। यदि वह स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरते हैं, तो सपा और कांग्रेस के दलित जनाधार में बिखराव पैदा होकर उसका सीधा लाभ बीजेपी को मिल सकता है।
इसके समानांतर, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी मुस्लिम बहुल इलाकों में मुकाबलों को नया मोड़ देने की क्षमता रखते हैं। संभल, मुरादाबाद, रामपुर और देवबंद जैसी सीटों पर उनकी पार्टी के प्रत्याशी समाजवादी पार्टी के कोर मुस्लिम मतदाताओं में हिस्सेदारी कर मुकाबले को त्रिकोणीय शक्ल दे देते हैं। हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी ने अखिलेश यादव पर मुस्लिम समाज के साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप भी लगाया है।
पड़ोसी बिहार के राजनीतिक दलों की सक्रियता
बिहार की सीमा से लगे पूर्वांचल के जिलों में जेडीयू और एलजेपी जैसी पार्टियों की आवाजाही भी तेज हो चुकी है। कुर्मी मतों को लामबंद करने के उद्देश्य से मंत्री निशांत कुमार अब तक दो मर्तबा वाराणसी का दौरा कर चुके हैं। जेडीयू वर्ष 2027 के चुनाव में एनडीए गठबंधन के तहत 8-10 सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी में जुटी है। वाराणसी से अपनी मुहिम शुरू करने वाले मंत्री निशांत कुमार कुर्मी और अति-पिछड़े वर्गों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, तेजस्वी यादव पासी, पासवान और गैरजाटव दलित समुदाय के मतदाताओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
माइक्रो जाति प्रबंधन ही तय करेगा विजेता
उत्तर प्रदेश का आगामी 2027 चुनाव किसी सामान्य सियासी लहर के बजाय अत्यंत सूक्ष्म सामाजिक प्रबंधन पर निर्भर करेगा। यदि बीजेपी और सपा जैसी प्रमुख पार्टियां अपने सहयोगी छोटे दलों के सीट बंटवारे और अपेक्षाओं को समय रहते नहीं संभाल पाईं, तो यही पॉकेट-साइज पार्टियां बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों के समीकरण पूरी तरह बिगाड़ सकती हैं।



















