बिहार के गोपालगंज जिले में मां और बेटे के असीम लगाव का एक ऐसा वाकया सामने आया है, जो रिश्तों की गहराई को बयां करता है। बरौली प्रखंड के अंतर्गत आने वाले बलहा गांव निवासी मंजूर हसन ने अपनी वालिदा की याद और मोहब्बत में ऐसा कदम उठाया है जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। अपनी मां के इंतकाल के कई दशक बीत जाने के बावजूद उनके दिल में जुदाई का दर्द आज भी उतना ही ताजा है। इस गहरे जुड़ाव के चलते उन्होंने अपनी मां की मजार के ठीक बराबर में अपने लिए पहले से ही कब्र तैयार करवा ली है, ताकि इस दुनिया से रुखसत होने के बाद भी वह अपनी वालिदा से दूर न हों।
बचपन का अटूट लगाव और जिंदगी बदलने वाला सदमा
स्वर्गीय मुबारक हुसैन के तीन बेटों में सबसे छोटे मंजूर हसन का अपनी मां शाह शहरबानो हसनी के साथ एक बेहद खास और गहरा रिश्ता रहा है। बचपन के दिनों से ही उन्हें अपनी वालिदा से बेपनाह मोहब्बत थी और मां भी अपने इस छोटे बेटे पर खूब प्यार लुटाती थीं। पारिवारिक जीवन में आने वाली हर मुश्किल और परेशानी मां की मौजूदगी में बहुत छोटी महसूस होती थी। जब भी जीवन में कोई तनाव या उलझन सामने आती, मां के आंचल की छांव और उनकी बातें मन को गहरा सुकून दे जाती थीं।
यह सहज और खुशहाल जिंदगी जून 1999 में उस समय अचानक थम गई जब उनकी मां का इंतकाल हो गया। इस असमय बिछोह ने मंजूर हसन को अंदर तक तोड़कर रख दिया। मां के जाने के बाद शुरुआती दिनों में उन्हें अपनी जिंदगी एक भारी बोझ जैसी लगने लगी थी और इस खालीपन से उबरना नामुमकिन सा दिखता था। वक्त के साथ उन्होंने बमुश्किल खुद को संभाला और अपनी वालिदा की यादों को हमेशा जीवित रखने के उद्देश्य से उनकी एक पक्की मजार तामीर करवाई।
मजार की खिदमत और हरे कफन का अग्रिम इंतजाम
मां की मजार बनने के बाद मंजूर हसन की पूरी दिनचर्या ही बदल गई। उस मजार की देखरेख करना, परिसर की नियमित साफ-सफाई रखना और वहां वक्त बिताना उनके दैनिक जीवन का मुख्य हिस्सा बन गया। वह दिन का एक बड़ा हिस्सा इसी स्थान पर इबादत और यादों के बीच गुजारते हैं। दिल में मां के प्रति सम्मान और साथ रहने की इसी तड़प ने उन्हें अपनी अंतिम विश्राम स्थली भी वहीं चुनने के लिए प्रेरित किया।
इसी भावना के तहत उन्होंने मां की मजार के बगल में अपनी कब्र खुदवाकर पूरी तरह सुरक्षित करवा रखी है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी वसीयत और अंतिम विदाई की तैयारी के तहत अपने कफन की व्यवस्था भी खुद ही पूरी कर ली है। उन्होंने अपने लिए विशेष रूप से हरे रंग का कफन खरीदकर सुरक्षित रखा हुआ है। उनका मानना है कि हरा रंग उन्हें बेहद पसंद है और मजहबी तौर पर इसे हुसैनी रंग के रूप में आदर दिया जाता है। उनकी दिली ख्वाहिश है कि जब उनकी सांसों की डोर टूटे, तो उन्हें इसी हरे कफन में लपेटकर उनकी मां के बराबर में दफन किया जाए।
आपसी भाईचारे की सीख और समाज को दिया संदेश
मंजूर हसन अपनी मां द्वारा दी गई नसीहतों को आज भी अपने आचरण और जीवन का मुख्य आधार मानते हैं। उनकी वालिदा अक्सर उनसे कहा करती थीं कि दुनिया में हर इंसान से प्यार से मिलना चाहिए और मन में किसी के लिए बैर या दुश्मनी नहीं पालनी चाहिए। उनका स्पष्ट मानना था कि यदि कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति दिल में मोहब्बत रखेगा, तो सामने वाले की नफरत और दुश्मनी अपने आप समाप्त हो जाएगी।
मां की इस अनमोल सीख को आगे बढ़ाते हुए मंजूर हसन समाज के सभी लोगों को एक बेहद संवेदनशील सलाह देते हैं। उनका कहना है कि हर संतान को अपने जीते-जी माता-पिता की खिदमत करनी चाहिए, उनका आदर करना चाहिए और बुढ़ापे में उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। माता-पिता जब तक जीवित हैं, उनकी कद्र करना ही सबसे बड़ी इबादत है, क्योंकि उनके जाने के बाद सिर्फ उनकी यादें बाकी रह जाती हैं और उनका निस्वार्थ दुलार दोबारा कभी हासिल नहीं होता।
























