देहरादून में मोहकमपुर से आशारोड़ी तक प्रस्तावित एलिवेटेड रोड के निर्माण कार्य के बीच इसकी जद में आने वाले प्रभावित परिवारों का दर्द और गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है। जिन मेहनतकश और गरीब लोगों ने दूसरों के घरों में दिन-रात मेहनत करके और पाई-पाई जोड़कर अपना आशियाना खड़ा किया था, आज विकास परियोजनाओं के नाम पर उन्हीं के सिर से छत छिनने का गहरा संकट मंडरा रहा है। इन परिवारों का साफ तौर पर कहना है कि वे अपनी बरसों की खून-पसीने की कमाई से बने इन छोटे-छोटे घरों को इस तरह उजड़ते हुए नहीं देख सकते हैं।
प्रशासन से मुआवजे और एलाइनमेंट बदलने की गुहार
इस विकट स्थिति से जूझ रहे प्रभावित लोगों ने शासन-प्रशासन के सामने अपनी गुहार लगाई है। उनकी मांग है कि या तो उनके समुचित विस्थापन और मुआवजे की पुख्ता व्यवस्था की जाए अथवा इस एलिवेटेड रोड के एलाइनमेंट में जरूरी बदलाव करके उनके आशियानों को पूरी तरह सुरक्षित बचाया जाए। स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसा करने से उनकी बरसों की मेहनत पल भर में बर्बाद होने से बच जाएगी और उन्हें इस मानसिक प्रताड़ना से राहत मिल सकेगी।
लोन लेकर बनाया था आशियाना, अब सिर से छत छिनने की चिंता
बद्रीपुर के निवासी परशुराम ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखीमपुर के रहने वाले हैं और रोजी-रोटी की तलाश में देहरादून आए थे। यहां मजदूरी का काम करके उन्होंने किसी तरह एक छोटा सा मकान बनवाया था, जिसमें वह अपने परिवार के साथ जीवन गुजार रहे हैं। अचानक आए इस संकट ने उन्हें बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मकान उन्होंने कर्ज और लोन लेकर तैयार किया था। परशुराम का कहना है कि यदि उनके सिर से यह छत छिन जाती है, तो वह अपने बच्चों को लेकर आखिर कहां जाएंगे। मजदूरी के जरिए बड़ी मुश्किल से परिवार का पेट पालने वाले इस गरीब इंसान के लिए अपने दम पर दूसरा घर खरीदना या बनाना असंभव सा प्रतीत होता है।
बच्चों के भविष्य और बेघर होने का मंडराता डर
एक अन्य प्रभावित महिला रामदेवी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि उन्होंने खुद मजदूरी करके और एक-एक पाई जोड़कर अपना घर बनवाया है। परिवार का भरण-पोषण ठीक से हो सके, इसके लिए वह अपनी बेटियों से भी दूसरों के घरों में काम करवाने को मजबूर हैं। उन्होंने व्यवस्था के सामने यह गंभीर सवाल उठाया कि बड़े और चौड़े मार्ग बनाने के लिए क्या केवल उनके जैसे गरीब तबके के छोटे-छोटे घरों को ही बलि का बकरा बनाया जाना उचित है। उन्होंने कहा कि घर टूटने और उजड़ने की आशंका इतनी अधिक सता रही है कि अब रातों की नींद भी उड़ चुकी है। हर पल बस यही खौफ बना रहता है कि अगर आशियाना छिन गया, तो वह अपने छोटे बच्चों को लेकर कहां शरण लेंगी।
गांव लौटने का रास्ता बंद और देहरादून में ही बसा है सब कुछ
रामदेवी ने आगे यह भी बताया कि जब वह उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक गांव से देहरादून आकर बस गई थीं, तब उन्होंने यहां के सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार करवा लिए थे। उन्होंने अपने पुराने गांव के राशन कार्ड और आधार कार्ड भी पूरी तरह कटवा दिए थे, जिसके कारण अब उनके पास वापस अपने गांव लौटने का कोई भी विकल्प शेष नहीं बचा है। उनके परिवार के सभी कागजात अब यहीं के हैं और उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार तक की सारी व्यवस्था देहरादून में ही टिकी हुई है। इस विकट अनिश्चितता के कारण अब न तो ठीक से नींद आती है और न ही भोजन पचता है, तथा अपने मासूम बच्चों के चेहरों को देखकर उनका दिल रो पड़ता है।



















