नैनीताल अपनी मनमोहक झील, प्राकृतिक खूबसूरती और ऐतिहासिक धरोहर के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। हालांकि, इस पर्यटन नगरी की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ पहाड़ी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां तिब्बती संस्कृति की एक गहरी छाप भी मौजूद है। नैनीताल की मशहूर तिब्बती मार्केट, यहां का कारोबारी इतिहास और तिब्बती समाज का जीवन संघर्ष, विस्थापन और खुद को बचाने की एक दिलचस्प कहानी बयां करता है। भारत और तिब्बत के बीच हिमालय हमेशा से व्यापार, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक मेलजोल का जरिया रहा है। कुमाऊं क्षेत्र का भी तिब्बत के साथ प्राचीन काल से व्यापारिक रिश्ता रहा है, जहां से व्यापारी और यात्री आते-जाते थे। इस ऐतिहासिक जुड़ाव ने ही हिमालयी इलाकों में अलग-अलग संस्कृतियों के घुलने-मिलने का रास्ता साफ किया था।
साल 1959 के बाद शुरू हुई स्थायी बसावट
नैनीताल में तिब्बती समुदाय के हमेशा के लिए बसने की शुरुआत मुख्य रूप से साल 1959 के बाद हुई। तिब्बत के राजनीतिक हालात बिगड़ने के कारण भारी संख्या में तिब्बती नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद देश के अलग-अलग कोनों में तिब्बती बस्तियां बसने लगीं। नैनीताल भी उन्हीं चुनिंदा जगहों में शामिल रहा, जहां इन परिवारों ने धीरे-धीरे अपनी नई दुनिया बसाई और जिंदगी की शुरुआत की।
साल 1960 से 1970 के दशक में बढ़ी आबादी
नैनीताल तिब्बती मार्केट फेडरेशन के प्रमुख यशी थुप्तेन के अनुसार, साल 1960 के आसपास कुछ तिब्बती लोग नैनीताल आने लगे थे। शुरुआती दौर में उनका यहां रुकना कुछ समय के लिए ही होता था। वे गर्मियों में यहां रहते और सर्दियों के मौसम में हल्द्वानी, हरिद्वार और धर्मशाला जैसी जगहों पर चले जाते थे। उनके मुताबिक, साल 1960 से 1970 के बीच नैनीताल में इस समुदाय की आबादी और मौजूदगी बढ़ने लगी थी। हालांकि, उस वक्त इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी कमाने और स्थाई तौर पर टिके रहने की बड़ी चुनौती थी। शुरुआत में ये लोग घर-घर जाकर ऊनी कपड़े और सामान बेचा करते थे। कई लोग नैनीताल की माल रोड के अलावा भीमताल और भवाली जैसे पास के इलाकों में भी घूम-घूमकर व्यापार करते थे।
इंदिरा गांधी को खत लिखने के बाद मिली दुकानें
यशी थुप्तेन बताते हैं कि शुरुआती सालों में तिब्बती दुकानदारों को अक्सर स्थानीय प्रशासन से कारोबार करने की इजाजत नहीं मिलती थी। ऐसे में समुदाय के सामने पक्का रोजगार और कारोबार चलाने की व्यवस्था करना बेहद जरूरी हो गया था। इसी मकसद से साल 1970 में उनके पिता ने नैनीताल में तिब्बती यूथ कांग्रेस की एक शाखा की शुरुआत की। उनकी जानकारी के मुताबिक, तिब्बती यूथ कांग्रेस की सबसे पहली शाखा धर्मशाला में खुली थी। इसके बाद नैनीताल के तिब्बतियों ने अपनी स्थायी दुकानों के लिए आवाज उठाई और देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा। यशी थुप्तेन के अनुसार, आगे चलकर साल 1983 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के जरिए तिब्बती समाज के लोगों को दुकानें आवंटित की गईं। इसके बाद से तिब्बती मार्केट में पूरे बारह महीने दुकानें सजने लगीं और लोगों को कमाई का एक पक्का जरिया मिल गया।
आज भी नैनीताल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है समुदाय
यशी थुप्तेन के मुताबिक, साल 1983 के दौरान नैनीताल में लगभग 45 तिब्बती परिवार रहते थे। वक्त के साथ इनमें से कुछ परिवार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला और उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गए। उनके अनुसार, आज के समय में नैनीताल में लगभग 38 तिब्बती परिवार रह रहे हैं। आज के दौर में यह तिब्बती मार्केट सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं है, बल्कि इस शहर की मिली-जुली संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। यहां की दुकानें इस समुदाय के संघर्ष, कड़ी मेहनत और अपनी संस्कृति को बचाए रखने के जज्बे की कहानी सुनाती हैं।
























