उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्वतीय शहर स्थित नैनीताल चिड़ियाघर और रानीबाग रेस्क्यू सेंटर में रहने वाले बड़े मांसाहारी वन्यजीवों की फिटनेस और सेहत बनाए रखने के लिए एक विशेष खानपान प्रणाली अपनाई जाती है। इंसानों की तरह ही यहां बाघ और गुलदारों के लिए भी नियमित डाइटिंग की व्यवस्था है, जिसके तहत सप्ताह में पूरे एक दिन उन्हें भोजन नहीं दिया जाता। हर मंगलवार को इन शिकारी जानवरों के लिए डाइटिंग डे तय किया गया है। इस साप्ताहिक उपवास का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों के पाचन तंत्र को प्राकृतिक रूप से व्यवस्थित रखना और शरीर में हानिकारक व अनावश्यक वसा का जमाव रोकना है। जंगल के स्वच्छंद जीवन और बाड़े के सीमित दायरे में रहने के अंतर को पाटने के लिए यह वैज्ञानिक डाइट चार्ट तैयार किया गया है।
जंगल की भागदौड़ बनाम चिड़ियाघर का सीमित दायरा
प्राकृतिक जंगलों में स्वच्छंद विचरण करने वाले बाघ और गुलदार अपनी भूख मिटाने के लिए कई किलोमीटर तक लगातार गश्त लगाते हैं। जंगल के कठिन माहौल में शिकार तलाशने, उसका पीछा करने और उसे पकड़ने की प्रक्रिया में उनकी भारी मात्रा में शारीरिक ऊर्जा खर्च होती है। प्राकृतिक आवास में उनकी जीवनशैली बेहद सक्रिय रहती है, जिससे उनका उपापचय संतुलित रहता है। शिकार मिलने के बाद वे पेट भर भोजन करते हैं और कई बार उन्हें अगले भोजन के लिए कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ता है। यह अंतराल उनके पाचन तंत्र को पूरी तरह विश्राम देने और खाए हुए मांस को पचाने का स्वाभाविक अवसर प्रदान करता है।
इसके विपरीत, चिड़ियाघर और रानीबाग स्थित रेस्क्यू सेंटर में रखे गए वन्यजीवों की दैनिक दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। बाड़े की सीमित सीमा में रहने के कारण उनकी शारीरिक गतिविधियां काफी घट जाती हैं। उन्हें शिकार के लिए किसी भी प्रकार की मशक्कत या संघर्ष नहीं करना पड़ता, बल्कि तय समय पर भरपेट भोजन उपलब्ध करा दिया जाता है। यदि इस सीमित हलचल के बीच उन्हें रोजाना भारी मात्रा में मांसाहार दिया जाए, तो उनके शरीर में अनावश्यक चर्बी तेजी से जमा होने लगेगी। मोटापा बढ़ने से इन वन्यजीवों में सुस्ती, जोड़ों की बीमारियां, हृदय रोग और पाचन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसी असंतुलन को रोकने के लिए विशेषज्ञ नियमित अंतराल पर उपवास कराने की सलाह देते हैं।
सेंट्रल जू अथॉरिटी के मानकों पर तैयार मेन्यू
नैनीताल चिड़ियाघर के चिकित्सक डॉ. हिमांशु पांगती के अनुसार, चिड़ियाघर और रेस्क्यू सेंटर में रहने वाले सभी बाघों और गुलदारों का आहार सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा निर्धारित सख्त दिशानिर्देशों के आधार पर तय किया जाता है। वन्यजीवों की सेहत, उनकी उम्र और शारीरिक बनावट को ध्यान में रखते हुए भोजन का एक संतुलित चक्र बनाया गया है।
इस निर्धारित व्यवस्था के मुताबिक, सप्ताह में पांच दिन इन मांसाहारी जीवों को गोश्त परोसा जाता है, जबकि सप्ताह के एक दिन उन्हें हल्का व सुपाच्य चिकन उपलब्ध कराया जाता है। इसके बाद सप्ताह के सातवें दिन, यानी मंगलवार को, उन्हें किसी भी तरह का ठोस आहार नहीं दिया जाता। इस एक दिन के उपवास से जानवरों की आंतों को आराम मिलता है और उनका मेटाबॉलिज्म सुचारू रूप से काम करता रहता है। डॉ. पांगती का कहना है कि चिड़ियाघर का माहौल जंगल जैसा नहीं हो सकता, इसलिए वैज्ञानिक आहार प्रबंधन ही इन बेजुबानों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने का सबसे कारगर जरिया है।
उम्र और वजन के हिसाब से मापी जाती है खुराक
चिड़ियाघर प्रशासन प्रत्येक जानवर की व्यक्तिगत शारीरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर भोजन की मात्रा निर्धारित करता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एक वयस्क बाघ को प्रतिदिन औसतन लगभग आठ किलोग्राम मांस दिया जाता है। वहीं तेंदुए या गुलदार की बात करें तो एक बड़े गुलदार को रोजाना करीब पांच किलोग्राम आहार मिलता है, जबकि छोटे तेंदुए को लगभग ढाई किलोग्राम भोजन परोसा जाता है।
वर्तमान में नैनीताल जू और रानीबाग रेस्क्यू सेंटर में रखे गए इन मांसाहारी जीवों की उम्र दो वर्ष से लेकर 12 वर्ष के बीच है। पशु चिकित्सक नियमित रूप से उनके वजन, चलने-फिरने की सक्रियता और स्वास्थ्य के अन्य पैमानों की निगरानी करते हैं। यदि किसी जीव में बीमारी, कमजोरी या अन्य स्वास्थ्य संबंधी बदलाव नजर आते हैं, तो उसकी खुराक में उसी अनुसार फेरबदल किया जाता है। भोजन की शुद्धता, ताजगी और पोषक तत्वों की गुणवत्ता की भी हर दिन जांच की जाती है।
नैनीताल जू और रेस्क्यू सेंटर का मौजूदा कुनबा
नैनीताल चिड़ियाघर में वर्तमान समय में तीन बाघ मौजूद हैं, जिनमें दो नर और एक मादा बाघ शामिल हैं। इसके अलावा यहां छह तेंदुए भी अपनी रिहाइश बनाए हुए हैं। दूसरी तरफ, रानीबाग में संचालित रेस्क्यू सेंटर में एक बाघिन और अन्य गुलदार रखे गए हैं, जिन्हें विभिन्न रेस्क्यू ऑपरेशनों के तहत सुरक्षित स्थानों से यहां लाकर रखा गया है।
इन सभी वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास जैसा सुरक्षित माहौल देने के लिए बाड़ों में विशेष प्रबंध किए जाते हैं। इनके बाड़ों में पत्थर, पेड़ और पानी की उचित व्यवस्था रखी जाती है ताकि वे शारीरिक रूप से सक्रिय रह सकें। खानपान में यह अनुशासन सुनिश्चित करता है कि पिंजरे या बाड़े में रहने के बावजूद वे शारीरिक रूप से सुस्त न पड़ें।
प्राकृतिक जंगल और बाड़े में जीवन प्रत्याशा का फर्क
नैनीताल चिड़ियाघर के रेंजर आनंद लाल ने जंगल और चिड़ियाघर के जीवन में जीवन प्रत्याशा के बड़े अंतर को रेखांकित किया है। जंगल में रहने वाले बाघ और गुलदार को जीवन के हर मोड़ पर कड़े संघर्षों से गुजरना पड़ता है। भोजन की अनिश्चितता, क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर होने वाले जानलेवा संघर्ष, मौसमी मार, शिकारियों का खतरा और बीमारियों का बिना इलाज रह जाना उनकी औसत उम्र को कम कर देता है। जंगल में एक बाघ की औसत उम्र आमतौर पर 15 से 16 वर्ष और गुलदार की 14 से 15 वर्ष के आसपास होती है।
इसके विपरीत, चिड़ियाघर और मान्यता प्राप्त रेस्क्यू सेंटरों में वन्यजीवों को समय पर संतुलित पोषण, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और आपात स्थिति में तत्काल आधुनिक चिकित्सा उपचार मिल जाता है। किसी भी तरह का संक्रमण होने पर चिकित्सक तुरंत दवाएं उपलब्ध कराते हैं। इस निरंतर देखभाल और संतुलित आहार दिनचर्या का सीधा सकारात्मक प्रभाव उनकी जीवन अवधि पर पड़ता है। चिड़ियाघर में सुरक्षित रहने वाले बाघ और तेंदुए औसतन 18 से 20 वर्ष की लंबी उम्र तक जीवित रह सकते हैं।
संतुलित आहार ही बेहतर वन्यजीव प्रबंधन की कुंजी
नैनीताल चिड़ियाघर का यह आहार प्रबंधन मॉडल स्पष्ट करता है कि वन्यजीवों के संरक्षण का मतलब सिर्फ उन्हें पेट भरकर भोजन देना नहीं है। कैद में रहने वाले वन्यजीवों के शरीर विज्ञान, उनकी दैनिक ऊर्जा खपत और पाचन तंत्र की प्राकृतिक जरूरतों को समझना बेहद आवश्यक है। सप्ताह में एक दिन का यह उपवास कोई दंड या कमी नहीं, बल्कि उनके शरीर को सक्रिय, छरहरा और बीमारियों से मुक्त बनाए रखने का एक प्रमाणित चिकित्सा दृष्टिकोण है। सही मात्रा, उचित अंतराल और गुणवत्तापूर्ण पोषण ही इन शानदार शिकारियों को इंसानी देखरेख में भी लंबा और स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है।























