उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इस साल विजयादशमी का उत्सव बिल्कुल नए अंदाज में मनाया जा रहा है। पिछले वर्ष अचानक हुई बारिश की वजह से पुतला दहन के दौरान काफी अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उसी अनुभव से सबक लेते हुए आयोजन समिति ने इस बार मौसम के मिजाज को देखते हुए पहले से पुख्ता तकनीकी कदम उठाए हैं। परेड ग्राउंड में पहली बार पूरी तरह वाटरप्रूफ रावण स्थापित किया जा रहा है, ताकि बूंदाबांदी या तेज बौछारें भी उत्सव के रंग में कोई खलल न डाल सकें।
फाइबरग्लास और खास कपड़ों से तैयार हुआ ढांचा
पुतलों को नमी और पानी से सुरक्षित रखने के लिए निर्माण सामग्री में बड़ा बदलाव किया गया है। कारीगरों ने इस बार पारंपरिक कागजों के स्थान पर उच्च गुणवत्ता वाले फाइबरग्लास और खास वाटरप्रूफ कपड़ों की कई परतें इस्तेमाल की हैं। इस सुरक्षात्मक आवरण के चलते बारिश का पानी पुतले के भीतरी हिस्से में नहीं जा सकेगा। अगर दहन के समय बारिश शुरू भी हो जाती है, तो भी पुतले को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और आतिशबाजी तथा दहन की प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के पूरी हो सकेगी।
ऊंचाई में 50 फीट का इजाफा, मेघनाद और कुंभकर्ण भी तैयार
इस बार रावण का कद भी पिछले वर्षों की तुलना में काफी बड़ा रखा गया है। बन्नू बिरादरी के महामंत्री और दशहरा कमेटी के प्रधान संतोख नागपाल के अनुसार, परेड ग्राउंड में पिछले 78 सालों से दशहरे का पारंपरिक आयोजन बेहद धूमधाम से किया जा रहा है। आम तौर पर यहां 131 फीट ऊंचा रावण बनाया जाता था, लेकिन इस बार इसकी ऊंचाई बढ़ाकर 181 फीट कर दी गई है। रावण के दोनों ओर मेघनाद और कुंभकर्ण के 70-70 फीट ऊंचे पुतले भी खड़े किए गए हैं, जिन्हें देखने के लिए पूरे शहर से दर्शकों की भारी भीड़ जुटने की उम्मीद है।
41 वर्षों का अनुभव और लिम्का बुक का रिकॉर्ड
इन भव्य पुतलों को आकार देने का काम हरियाणा के जाने-माने शिल्पकार तेजिंदर सिंह चौहान और उनकी 40 कारीगरों की टीम ने संभाला है। तेजिंदर सिंह चौहान पिछले 41 साल से रावण के विशालकाय पुतले बनाने के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी कला और असाधारण ऊंचाइयों वाले पुतलों को कई रिकॉर्ड बुक्स में दर्ज किया जा चुका है। साल 2013 में उनके काम को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी आधिकारिक रूप से शामिल किया गया था। इस बार देहरादून में तीनों पुतलों को तैयार करने में इस टीम को लगातार 45 दिनों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी है।
सांझा भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल
पुतला निर्माण के इस बड़े प्रकल्प की एक खास खूबी इसका सामाजिक ताना-बाना भी है। तेजिंदर सिंह चौहान के दल में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के हुनरमंद कारीगर कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। वे सभी मिलकर इन विशालकाय आकृतियों को अंतिम रूप देते हैं। तेजिंदर सिंह चौहान के लिए यह कार्य केवल एक पेशेवर शिल्पकारी नहीं है, बल्कि वह इसे विभिन्न समुदायों के लोगों को आपस में जोड़ने और समाज में आपसी सौहार्द और भाईचारे का मजबूत संदेश देने का एक माध्यम भी मानते हैं।
31 लाख रुपये का कुल खर्च और 20 अक्टूबर को दहन
रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के इन तीनों पुतलों के निर्माण पर कुल 31 लाख रुपये की लागत आई है। पुतलों के साथ ही मैदान में एक भव्य लंका का ढांचा भी तैयार किया गया है, जिसे जल्द ही मैदान में अंतिम रूप देकर स्थापित कर दिया जाएगा। तय कार्यक्रम के अनुसार 20 अक्टूबर को शाम 6:30 बजे पुतला दहन की मुख्य रस्म अदा की जाएगी। इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन के साक्षी बनने के लिए देहरादून शहर के अलावा उत्तराखंड के दूर-दराज के इलाकों से भी भारी संख्या में लोग परेड ग्राउंड पहुंचेंगे।



















