भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में किसी एक याचिकाकर्ता या अधिकारी के मुकदमों की सुनवाई से न्यायाधीशों का खुद को अलग कर लेना (रिक्यूजल) एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. आमतौर पर ऐसा तब होता है जब किसी मामले में न्यायाधीश का कोई निजी या व्यावसायिक हित जुड़ा हो. लेकिन जब यह घटना किसी एक ही प्रशासनिक अधिकारी के मामलों में बार-बार और लगातार कई वर्षों तक होती रहे, तो यह कानूनी गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बन जाती है. भारतीय वन सेवा (IFS) के उत्तराखंड कैडर के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के कानूनी मामलों में कुछ ऐसा ही अनोखा सिलसिला देखने को मिला है. सरकारी सेवा के दौरान उनके द्वारा दायर किए गए विभिन्न मुकदमों की सुनवाई से अब तक कुल 17 न्यायिक अधिकारी खुद को अलग कर चुके हैं. इस लंबी सूची में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों से लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट के चार न्यायाधीश, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के नौ न्यायिक सदस्य और जिला न्यायपालिका के दो जज शामिल हैं. इस सिलसिले का सबसे हालिया मामला दिल्ली स्थित केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण से सामने आया है.
दिल्ली की केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण पीठ में हालिया घटनाक्रम
इस अभूतपूर्व सिलसिले की सबसे नई कड़ी 21 सितंबर को सामने आई, जब केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की दिल्ली पीठ के सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने संजीव चतुर्वेदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का निर्णय लिया. यह मामला उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के एक आधिकारिक आदेश से चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था, जिसमें IFS अधिकारियों की वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करने से संबंधित नियमों और प्रावधानों को चुनौती दी गई थी. अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, इस याचिका पर कुछ समय तक प्राथमिक सुनवाई की गई, जिसके तुरंत बाद सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने घोषणा की कि वे इस मामले की आगे की सुनवाई नहीं करेंगे. इसके बाद कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश जारी किए गए कि इस संवेदनशील मामले को किसी अन्य उचित पीठ के समक्ष विचार के लिए सूचीबद्ध किया जाए और इसकी जानकारी संबंधित पक्षों को दी जाए. हालांकि, इस तरह के सामान्य न्यायिक आदेशों की तरह ही, इस फैसले में भी न्यायाधीश के सुनवाई से हटने का कोई विस्तृत या व्यक्तिगत कारण दर्ज नहीं किया गया था.
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में वर्ष 2025 के दौरान हुए दो बड़े रिक्यूजल
न्यायाधीशों के इस तरह मुकदमों से अलग होने का दौर केवल न्यायाधिकरणों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उच्च न्यायालयों में भी देखा गया है. वर्ष 2025 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से दो ऐसे बड़े मामले सामने आए जो काफी चर्चा में रहे. सितंबर और अक्टूबर 2025 के दौरान, उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक वर्मा और जस्टिस रविंद्र मैथानी ने संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर की गई एक अवमानना याचिका की सुनवाई से खुद को दूर कर लिया. यह अवमानना याचिका वास्तव में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के ही कुछ सदस्यों और इसकी रजिस्ट्री के खिलाफ दायर की गई थी. संजीव चतुर्वेदी का आरोप था कि हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में जारी किए गए स्थगन आदेशों की जानबूझकर और सचेत रूप से अनदेखी की गई थी. इस गंभीर कानूनी विवाद की सुनवाई के दौरान दोनों उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने एक-एक करके खुद को इस प्रक्रिया से बाहर कर लिया. उपलब्ध अदालती दस्तावेजों में इन दोनों न्यायाधीशों के इस फैसले के पीछे के किसी भी व्यक्तिगत या स्पष्ट कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है.
वर्ष 2024 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में न्यायिक दूरी
इससे ठीक एक साल पहले, फरवरी 2024 में भी इसी तरह का एक मामला सामने आया था जब उत्तराखंड उच्च न्यायालय के जस्टिस मनोज तिवारी ने संजीव चतुर्वेदी से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मुकदमे की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. यह विवाद संजीव चतुर्वेदी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से संबंधित था, जिसमें उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और अपनी पोस्टिंग के संदर्भ में केंद्रीय कैबिनेट की नियुक्ति समिति से जुड़े कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेजों की मांग की थी. जब यह मामला अदालत के समक्ष सुनवाई के लिए आया, तो जस्टिस मनोज तिवारी ने इस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. इस घटना के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई कि आखिर क्यों इस अधिकारी के मामलों से न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्य लगातार दूरी बना रहे हैं. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सुनवाई से अलग होने की घटनाओं के आधार पर किसी भी अधिकारी या न्यायाधीश के इरादों पर सवाल उठाना न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि प्रत्येक मामले की पृष्ठभूमि और परिस्थितियां पूरी तरह भिन्न हो सकती हैं.
सुप्रीम कोर्ट में साल 2013 और 2016 के ऐतिहासिक फैसले
संजीव चतुर्वेदी के कानूनी सफर में जजों के हटने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें साल 2013 तक जाती हैं. इसकी शुरुआत नवंबर 2013 में हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने संजीव चतुर्वेदी के एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. यह मामला चतुर्वेदी द्वारा अपने करियर के दौरान झेले गए कथित उत्पीड़न और विभिन्न विभागों में फैले भ्रष्टाचार की CBI जांच कराने की मांग से जुड़ा था. जस्टिस रंजन गोगोई के इस फैसले के लगभग तीन साल बाद, अगस्त 2016 में, देश की सर्वोच्च अदालत के एक और वरिष्ठ न्यायाधीश, जस्टिस यूयू ललित ने भी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े एक मुकदमे की सुनवाई से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया था. इस प्रकार, देश की सबसे बड़ी अदालत के दो अत्यंत प्रतिष्ठित और बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले न्यायिक अधिकारियों का इस मामले से अलग होना इस विवाद की जटिलता को दर्शाता है.
कौन हैं संजीव चतुर्वेदी और क्या है इस कानूनी लड़ाई का आधार
संजीव चतुर्वेदी उत्तराखंड कैडर के भारतीय वन सेवा (IFS) के एक बेहद चर्चित अधिकारी रहे हैं. वे अपनी ईमानदारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े रुख और प्रशासनिक सुधारों के लिए जाने जाते हैं. अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई, जिसके कारण उन्हें कई कानूनी और प्रशासनिक लड़ाइयों का सामना करना पड़ा. उनके सेवा संबंधी मामले, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के विवाद, वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन और प्रशासनिक अवमानना जैसे मुद्दों को लेकर लगातार अदालतों के चक्कर काटते रहे हैं. अब तक कुल 17 न्यायिक अधिकारियों द्वारा उनके मामलों से दूरी बनाने का यह अनूठा आंकड़ा सामने आया है, जिसमें 2 सुप्रीम कोर्ट जज, 4 उत्तराखंड उच्च न्यायालय के जज, 9 केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के सदस्य और 2 जिला अदालतों के न्यायाधीश शामिल हैं. कानून के जानकारों का कहना है कि न्यायाधीशों का किसी मामले से हटना न्यायिक शुचिता और निष्पक्षता बनाए रखने की एक स्थापित परंपरा का हिस्सा है, ताकि किसी भी पक्ष को यह न लगे कि सुनवाई में कोई पूर्वाग्रह था. इसलिए, इस संख्या को किसी नकारात्मक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.



















