राजस्थान के पाली जिले के अंतर्गत आने वाले रोहट क्षेत्र में इस बार मानसून की बेरुखी ने खेतों को बंजर बना दिया है। महीनों से आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे किसानों के हिस्से में सिर्फ निराशा आई है। कम बारिश होने के कारण इस इलाके की हरी-भरी फसलें अब पूरी तरह सूख चुकी हैं। विशेष रूप से रोहट पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाले खांडी और खाड़ी इलाकों में हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। यहां के दर्जनों गांवों में फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं, जिससे अन्नदाता के सामने अपनी आजीविका चलाने का एक गंभीर संकट पैदा हो गया है। स्थानीय किसानों की मेहनत पर पूरी तरह पानी फिर चुका है और उनके खेतों में केवल सूखी मिट्टी नजर आ रही है।
खांडी पंचायत, डूंगरपुर विश्नोईयान की ढाणी और नेनाराम विश्नोई की ढाणी जैसी जगहों पर हालात बहुत विकट हैं। खेतों में लगाई गई मूंग, तिल और ज्वार की फसलें पानी के अभाव में समय से पहले ही सूखकर काली पड़ गई हैं। किसानों के अनुसार, लगभग 90 से 100 प्रतिशत तक खड़ी फसलें पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं। यह तबाही केवल अनाज की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर क्षेत्र के पशुधन पर भी पड़ रहा है। पशुओं के खाने के लिए चारे की भारी किल्लत हो गई है, जिससे आने वाले दिनों में मवेशियों को बचाना भी एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
महंगी मजदूरी और दोहरी आर्थिक मार
इस भीषण संकट के बीच किसानों पर अब दोहरी मार पड़ रही है। खेतों में जो थोड़ी-बहुत सूखी फसल बची हुई है, उसे भी सहेजने के लिए किसानों को अपनी जेब से भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है। इस समय खेतों में कटाई का काम करने के लिए मजदूरों को 600 रुपये रोजाना की दर से दिहाड़ी देनी पड़ रही है। विडंबना यह है कि जिन खेतों से केवल 50 से 100 किलोग्राम मूंग की पैदावार होने की उम्मीद बची है, वहां कटाई का खर्च ही उसकी वास्तविक कीमत से कई गुना ज्यादा हो गया है। इसके बावजूद किसान इस उम्मीद में कर्ज लेकर मजदूरों को भुगतान कर रहे हैं कि कम से कम उनके मवेशियों के लिए कुछ सूखा चारा और घर के लिए थोड़ा-बहुत अनाज मिल सके।
कर्ज के दलदल में फंसे किसान और बच्चों की शिक्षा पर संकट
रोहट के ग्रामीण इलाकों की पूरी अर्थव्यवस्था मानसून पर आधारित पारंपरिक खेती के इर्द-गिर्द घूमती है। इस साल की शुरुआत में स्थानीय किसानों ने इस उम्मीद के साथ बैंकों से KCC लोन लिया था और कुछ साहूकारों से भी मोटी ब्याज दरों पर पैसे उधार लिए थे कि अच्छी पैदावार होने पर वे इस कर्ज को चुका देंगे। उन्होंने इसी कर्ज की रकम से महंगे बीज और रासायनिक खाद खरीदे थे। किसानों का इरादा था कि फसल बेचकर वे अपने बच्चों के स्कूल की फीस भरेंगे और अपनी रसोई का राशन लाएंगे। लेकिन अब जब फसलें पूरी तरह तबाह हो चुकी हैं, तो कर्ज चुकाना तो दूर, उनके सामने दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी दूभर हो गया है। ग्रामीण अब कर्ज के ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुके हैं जिससे बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।
खुली चौपाल में गिरदावरी कराने की मांग
किसानों की इस दयनीय स्थिति को देखते हुए किसान संगठनों ने भी अब अपनी आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के जिलाध्यक्ष मदन सिंह ने हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और जमीनी हकीकत का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता और उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए। मदन सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा, "अगर प्रशासनिक अधिकारी बंद कमरों में कागजी आकलन करेंगे, तो किसानों को बीमा या सरकारी अनुदान नहीं मिल पाएगा।"
किसान नेता ने पाली के जिला कलेक्टर से पुरजोर मांग की है कि फसल के नुकसान का आकलन करने के लिए पटवारियों को सीधे खेतों में भेजा जाए। यह पूरी प्रक्रिया किसानों की मौजूदगी में खुली चौपाल लगाकर होनी चाहिए ताकि किसी भी तरह की धांधली की गुंजाइश न रहे। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार से इस पूरे क्षेत्र को तुरंत अकाल पीड़ित घोषित करने और किसानों के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा करने की अपील की है ताकि इस संकट काल में उन्हें थोड़ी आर्थिक राहत मिल सके।


















