उत्तराखंड के सरोवर नगरी नैनीताल स्थित तल्लीताल के कृष्णापुर इलाके में रहने वाले नागरिक लंबे समय से बुनियादी सड़क सुविधा की राह देख रहे हैं। घनी आबादी वाले इस क्षेत्र में मोटर मार्ग न होने के कारण स्थानीय निवासियों को प्रतिदिन अनेक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि अब इस इलाके में सड़क निर्माण की मांग के बीच एक गंभीर भूगर्भीय चुनौती उभरकर सामने आई है। भूगर्भ विज्ञान विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बालियानाला की अत्यधिक संवेदनशील पहाड़ी पर जल्दबाजी में सड़क बनाना या गाड़ियों की आवाजाही शुरू करना किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। पहाड़ की कमजोर बनावट को देखते हुए सुरक्षा आकलन के बिना निर्माण कार्य को आगे बढ़ाना बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है।
तीन हजार की आबादी और तीन किलोमीटर का कठिन पैदल सफर
कृष्णापुर क्षेत्र की कुल आबादी तीन हजार से अधिक है। इतने बड़े रिहायशी इलाके में पक्की सड़क की सुविधा उपलब्ध न होने के कारण रोजमर्रा की जिंदगी बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। क्षेत्रवासियों को अपने दैनिक कार्यों, दफ्तर, बाजार या अन्य स्थलों तक पहुंचने के लिए मुख्य मार्ग तक कम से कम तीन किलोमीटर से ज्यादा की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। इस पैदल मार्ग पर सबसे अधिक समस्या स्कूली बच्चों, वयोवृद्ध नागरिकों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को झेलनी पड़ती है। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक ले जाना एक बेहद जटिल और जोखिम भरा कार्य साबित होता है। अपनी इस मूलभूत आवश्यकता को पूरा कराने के लिए स्थानीय नागरिक लगातार आवाज उठा रहे हैं और शासन व प्रशासन का ध्यान खींचने के लिए धरना-प्रदर्शन का सहारा ले रहे हैं।
भूगर्भीय सर्वेक्षण में सामने आई चट्टानों की बेहद खस्ता हालत
नागरिकों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए भूगर्भ विज्ञानी डॉ. भास्कर पाटनी ने प्रभावित बालियानाला क्षेत्र का बारीक निरीक्षण किया। भूगर्भीय दृष्टिकोण से किए गए इस अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय लोगों को सड़क सुविधा मिलना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन बालियानाला पहाड़ की आंतरिक संरचना बेहद कमजोर और अस्थिर हो चुकी है। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के दौरान और शुरुआती सर्वेक्षणों के समय पहाड़ के अंदरूनी हिस्सों की चिंताजनक स्थिति उजागर हुई थी। पहाड़ी की अंदरूनी चट्टानें कई जगहों पर पूरी तरह टूटकर बिखर चुकी हैं और भारी दबाव के कारण वे मिट्टी तथा चूरे में तब्दील हो गई हैं। ऐसी स्थिति में बिना पहाड़ का उपचार किए किसी भी प्रकार का पक्का निर्माण बेहद घातक सिद्ध हो सकता है।
नब्बे प्रतिशत पूरा हुआ जटिल पहाड़ी को स्थिर करने का काम
बालियानाला पहाड़ी को ढहने से बचाने और उसकी स्थिरता बहाल करने के लिए एक बहु-एजेंसी परियोजना पर काम शुरू किया गया। इस चुनौतीपूर्ण अभियान में सिंचाई विभाग के साथ-साथ परियोजना प्रबंधन सलाहकार यानी पीएमसी और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी की विशेषज्ञ टीमों को शामिल किया गया। पहाड़ी को खिसकने से रोकने के लिए उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों का प्रयोग किया गया है। इसमें केबल एंकरिंग, रॉक एंकरिंग और दरारों में कंक्रीट भरने वाली ग्राउटिंग प्रणाली जैसे तकनीकी उपायों को अपनाया गया। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार इस कठिन उपचार कार्य का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य कमजोर हो चुकी चट्टानों को आपस में बांधकर पहाड़ को स्थिरता प्रदान करना था।
वाहनों की आवाजाही और कंपन से बढ़ सकता है भूस्खलन का जोखिम
उपचार कार्य के दौरान बालियानाला में मशीनों और सामग्री की आवाजाही के लिए जो अस्थायी मार्ग तैयार किया गया था, उस पर सीधे आम वाहनों का परिचालन शुरू करने को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर आपत्ति जताई है। एक्सपर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि यदि इस अस्थायी रास्ते को नियमित यातायात के लिए खोल दिया जाता है तो इससे पहाड़ी पर भारी अतिरिक्त भार पड़ेगा। सड़कों पर चलने वाले वाहनों से उत्पन्न होने वाला निरंतर कंपन और गतिशील बल कमजोर हो चुकी चट्टानों के संतुलन को दोबारा बिगाड़ सकता है। इससे पहाड़ में नई दरारें आ सकती हैं, स्थापित किए गए एंकर ढीले पड़ सकते हैं और अचानक बड़े भूस्खलन की घटना घट सकती है। इसलिए बिना संपूर्ण भार-वहन क्षमता परीक्षण के यातायात की अनुमति देना खतरनाक होगा।
सुरक्षित विकल्पों की तलाश और भावी समाधान की दिशा में मंथन
स्थानीय निवासियों की समस्याओं को स्वीकार करते हुए विशेषज्ञ ऐसे सुरक्षित समाधान खोजने पर बल दे रहे हैं जिससे किसी संभावित आपदा को रोका जा सके। बालियानाला में निर्माण कार्य के लिए तैयार की गई कंक्रीट बेंचों को और अधिक मजबूत करने के तकनीकी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही कृष्णापुर तक पहुंचने के लिए बालियानाला की मुख्य संवेदनशील पहाड़ी को छोड़कर किसी अन्य वैकल्पिक मार्ग की संभावनाओं का भी पता लगाया जा रहा है। भूशास्त्रियों का कहना है कि तीन किलोमीटर से अधिक पैदल चलने वाले ग्रामीणों की तकलीफ जायज है, परंतु राहत देने के चक्कर में ऐसा कदम नहीं उठाया जा सकता जो भविष्य में पूरे तल्लीताल क्षेत्र के लिए बड़े खतरे का सबब बन जाए।



















