उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित भगवान बद्री विशाल के कपाट बंद होने की आधिकारिक तिथि सामने आ चुकी है। विजयदशमी के पवित्र पर्व पर मंदिर के मुख्य पुजारी रावल जी ने इस बात का ऐलान किया कि इस बार कपाट 16 नवंबर की रात 9 बजकर 37 मिनट पर कर्क लग्न में शीतकाल के वास्ते बंद किए जाएंगे। इस धार्मिक अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद राज्य में चल रही चारों धाम की ग्रीष्मकालीन यात्रा का भी समापन हो जाएगा।
परंपरागत तरीके से हुई घोषणा और पगड़ी रस्म
हर साल की तरह इस बार भी विजयदशमी के खास मौके पर ही कपाट बंद होने की तिथि तय करने की परंपरा निभाई गई। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण में एक भव्य उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला, जहां बामणी गांव के निवासी अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर पहुंचे थे। इस दौरान एक बेहद खास रस्म निभाई जाती है, जिसमें आगामी वर्ष की यात्रा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों का चयन किया जाता है। पांडुकेश्वर और बामणी गांव के भंडारी थोक, मेहता थोक और भट्ट थोक से कुल चार लोगों को चुना जाता है। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति द्वारा इन सभी को विधि-विधान के साथ पगड़ी बांधी जाती है और मंदिर परिसर की पूरी व्यवस्थाओं का जिम्मा सौंपा जाता है, और जब यह घोषणा की जा रही थी तब सभा मंडप में तमाम ग्रामीण मौजूद रहे।
कपाट बंद होने से पहले के जरूरी धार्मिक अनुष्ठान
शीतकाल के लिए कपाट बंद होने की प्रक्रिया कई दिन पहले से ही चरणबद्ध तरीके से शुरू हो जाती है। सबसे पहले 12 नवंबर को भगवान श्री गणेश जी के कपाट बंद किए जाएंगे। इसके अगले दिन यानी 13 नवंबर को आदि केदारेश्वर जी के कपाट बंद होंगे। इसके बाद 14 नवंबर को खड्ग-पुस्तक का वाचन और वेदों का पाठ बंद कर दिया जाएगा। अनुष्ठान की कड़ी में 15 नवंबर को माता लक्ष्मी जी को गर्भगृह में पुनः विराजमान होने के लिए निमंत्रण दिया जाएगा और अंत में 16 नवंबर को रात 9 बजकर 37 मिनट पर मुख्य कपाट शीतकाल के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे।
इस साल टूटे सारे पुराने तीर्थाटन रिकॉर्ड
इस बार की बद्रीनाथ यात्रा ने श्रद्धालुओं की संख्या के मामले में पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अब तक लगभग 21 लाख भक्त भगवान बद्री विशाल के दर्शन कर चुके हैं, जो कि अपने आप में एक ऐतिहासिक और अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। अभी भी कपाट बंद होने में लगभग 27 से 28 दिन का समय बाकी बचा हुआ है, जिसे देखते हुए अधिकारियों और समिति का अनुमान है कि दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की यह कुल संख्या और भी अधिक बढ़ सकती है।























