अध्यात्म की दुनिया में नीम करौली बाबा के चमत्कारों और उनकी महिमा के चर्चे देश-विदेश में फैले हुए हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस शख्सियत के बारे में जानते हैं जिन्हें बाबा की परम शिष्या माना जाता था। जी हां, हम बात कर रहे हैं सिद्धि मां की, जिन्हें उनके चाहने वाले बेहद प्रेम और आदर के साथ श्री मां या सिद्धि माई कहकर पुकारते थे। जब बाबा ब्रह्मलीन हुए, तो उसके बाद कैंची धाम की पूरी आध्यात्मिक व्यवस्था और परंपरा को संभालने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। श्रद्धालुओं के मन में उनके प्रति वैसा ही सम्मान था जैसा खुद नीम करौली बाबा के लिए था।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा से नैनीताल तक का सफर
सिद्धि मां की शुरुआती जिंदगी उत्तराखंड की वादियों से जुड़ी हुई थी। उनका जन्म अल्मोड़ा जिले में हुआ था और वह सात बहनों में से एक थीं। विवाह के बाद उनका जीवन नैनीताल की तरफ बढ़ा, जहां उनका रिश्ता तुलाराम साह के साथ तय हुआ। उनके पति नीम करौली बाबा के पक्के भक्तों में गिने जाते थे। पति के इसी जुड़ाव के चलते सिद्धि मां भी बाबा के संपर्क में आईं और धीरे-धीरे उनकी अनन्य भक्त बन गईं। इसके बाद उनका पूरा जीवन बाबा की सेवा और उनकी भक्ति में ही रम गया।
गृहस्थी से लेकर संत जीवन तक का सफर
शादी के शुरुआती दिनों में सिद्धि मां नैनीताल में ही अपना जीवन बिता रही थीं। माल रोड स्थित इंडिया होटल में भी उनका निवास रहा था, जहां से जुड़ी कई यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। जब उनके पति का निधन हुआ, तो उन्होंने मोह-माया और सांसारिक बंधनों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। अपना सारा समय उन्होंने बाबा की सेवा में लगा दिया। आज भी नैनीताल के पुराने लोग और स्थानीय निवासी श्री मां से जुड़े संस्मरणों को बड़े चाव से याद करते हैं।
कैंची धाम और हनुमानगढ़ी से जुड़ा इतिहास
कैंची धाम के सेवादार तेज सिंह के अनुसार, करीब 1940 के दशक के आसपास नीम करौली महाराज पहली बार नैनीताल पहुंचे थे। बाबा और सिद्धि मां की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, बाबा उन्हें कात्यायनी देवी कहकर पुकारते थे। ऐसा कहा जाता है कि बाबा ने पाषाण देवी मंदिर के पास खड़े होकर इंडिया होटल की तरफ इशारा करते हुए यह भविष्यवाणी भी की थी कि वहां कात्यायनी का वास है।
आध्यात्मिक विरासत और कात्यायनी का स्वरूप
भक्तों के बीच सिद्धि मां को लेकर एक अटूट विश्वास यह भी है कि वे सीधे तौर पर मां कात्यायनी का ही रूप थीं। यह बातें केवल किंवदंतियां नहीं हैं, बल्कि कैंची धाम से जुड़े लोगों की गहरी आस्था और स्मृतियों का हिस्सा हैं। अनुयायी उन्हें सिर्फ एक साधारण शिष्या नहीं मानते थे, बल्कि वे उन्हें बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली मुख्य धुरी मानते थे। जब 1973 में नीम करौली बाबा ब्रह्मलीन हुए, तो भक्तों में यह मान्यता जोर पकड़ गई कि बाबा ने अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियां सिद्धि मां को सौंप दी थीं। हालांकि यह पूरी तरह आस्था का विषय है, लेकिन उनके देहावसान के बाद सिद्धि मां ने ही कैंची धाम आने वाले हर श्रद्धालु को संभाला और उन्हें बाबा के विचारों से जोड़े रखा।
वह विशेष आशीर्वाद और मंगलवार-शनिवार के दर्शन
सिद्धि मां के बारे में एक और प्रसंग बहुत मशहूर है। ऐसा बताया जाता है कि अपने शरीर छोड़ने से पहले बाबा ने उनके लिए एक बहुत बड़ी बात कही थी कि जहां भी वह रहेंगी, वहीं मंगल हो जाएगा। भक्त इसी बात को उनके प्रति बाबा के असीम स्नेह का प्रमाण मानते हैं। अपनी जीवनशैली में सिद्धि मां हर हफ्ते विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन कैंची धाम आने वाले भक्तों से मुलाकात करती थीं। उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और लोगों का मानना था कि मां के आशीर्वाद मात्र से उनके सारे संकट टल जाते थे।
महाप्रयाण और कैंची धाम में उनकी स्मृतियां
28 दिसंबर 2017 को लगभग 92 वर्ष की आयु में नैनीताल के मल्लीताल स्थित आवास पर सिद्धि मां ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के बाद कैंची धाम परिसर में उनकी एक सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई और उनके लिए एक अलग पूजा कक्ष भी तैयार किया गया। हर साल 28 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि पर एक बड़े भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त हिस्सा लेते हैं। कैंची धाम की पहचान सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां की गुरु-शिष्य परंपरा इस जगह को और खास बनाती है, जिसमें सिद्धि मां का अध्याय हमेशा अमर रहेगा।





















