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नीम करौली बाबा की बेहद खास शिष्या सिद्धि मां, जिनके जीवन से जुड़ी हैं कई आध्यात्मिक बातेंउत्तराखंड
10 सित॰ 2026, 3:23 pm (50 मिनट पहले)· 2

नीम करौली बाबा की बेहद खास शिष्या सिद्धि मां, जिनके जीवन से जुड़ी हैं कई आध्यात्मिक बातें

नीम करौली बाबा की परम शिष्या रहीं सिद्धि मां को लेकर भक्तों में गहरी आस्था है। जानिए उनके जीवन, कैंची धाम से जुड़ाव और बाबा की विरासत को आगे बढ़ाने की पूरी कहानी।

अध्यात्म की दुनिया में नीम करौली बाबा के चमत्कारों और उनकी महिमा के चर्चे देश-विदेश में फैले हुए हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस शख्सियत के बारे में जानते हैं जिन्हें बाबा की परम शिष्या माना जाता था। जी हां, हम बात कर रहे हैं सिद्धि मां की, जिन्हें उनके चाहने वाले बेहद प्रेम और आदर के साथ श्री मां या सिद्धि माई कहकर पुकारते थे। जब बाबा ब्रह्मलीन हुए, तो उसके बाद कैंची धाम की पूरी आध्यात्मिक व्यवस्था और परंपरा को संभालने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। श्रद्धालुओं के मन में उनके प्रति वैसा ही सम्मान था जैसा खुद नीम करौली बाबा के लिए था।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा से नैनीताल तक का सफर

सिद्धि मां की शुरुआती जिंदगी उत्तराखंड की वादियों से जुड़ी हुई थी। उनका जन्म अल्मोड़ा जिले में हुआ था और वह सात बहनों में से एक थीं। विवाह के बाद उनका जीवन नैनीताल की तरफ बढ़ा, जहां उनका रिश्ता तुलाराम साह के साथ तय हुआ। उनके पति नीम करौली बाबा के पक्के भक्तों में गिने जाते थे। पति के इसी जुड़ाव के चलते सिद्धि मां भी बाबा के संपर्क में आईं और धीरे-धीरे उनकी अनन्य भक्त बन गईं। इसके बाद उनका पूरा जीवन बाबा की सेवा और उनकी भक्ति में ही रम गया।

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गृहस्थी से लेकर संत जीवन तक का सफर

शादी के शुरुआती दिनों में सिद्धि मां नैनीताल में ही अपना जीवन बिता रही थीं। माल रोड स्थित इंडिया होटल में भी उनका निवास रहा था, जहां से जुड़ी कई यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। जब उनके पति का निधन हुआ, तो उन्होंने मोह-माया और सांसारिक बंधनों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। अपना सारा समय उन्होंने बाबा की सेवा में लगा दिया। आज भी नैनीताल के पुराने लोग और स्थानीय निवासी श्री मां से जुड़े संस्मरणों को बड़े चाव से याद करते हैं।

कैंची धाम और हनुमानगढ़ी से जुड़ा इतिहास

कैंची धाम के सेवादार तेज सिंह के अनुसार, करीब 1940 के दशक के आसपास नीम करौली महाराज पहली बार नैनीताल पहुंचे थे। बाबा और सिद्धि मां की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, बाबा उन्हें कात्यायनी देवी कहकर पुकारते थे। ऐसा कहा जाता है कि बाबा ने पाषाण देवी मंदिर के पास खड़े होकर इंडिया होटल की तरफ इशारा करते हुए यह भविष्यवाणी भी की थी कि वहां कात्यायनी का वास है।

आध्यात्मिक विरासत और कात्यायनी का स्वरूप

भक्तों के बीच सिद्धि मां को लेकर एक अटूट विश्वास यह भी है कि वे सीधे तौर पर मां कात्यायनी का ही रूप थीं। यह बातें केवल किंवदंतियां नहीं हैं, बल्कि कैंची धाम से जुड़े लोगों की गहरी आस्था और स्मृतियों का हिस्सा हैं। अनुयायी उन्हें सिर्फ एक साधारण शिष्या नहीं मानते थे, बल्कि वे उन्हें बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली मुख्य धुरी मानते थे। जब 1973 में नीम करौली बाबा ब्रह्मलीन हुए, तो भक्तों में यह मान्यता जोर पकड़ गई कि बाबा ने अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियां सिद्धि मां को सौंप दी थीं। हालांकि यह पूरी तरह आस्था का विषय है, लेकिन उनके देहावसान के बाद सिद्धि मां ने ही कैंची धाम आने वाले हर श्रद्धालु को संभाला और उन्हें बाबा के विचारों से जोड़े रखा।

वह विशेष आशीर्वाद और मंगलवार-शनिवार के दर्शन

सिद्धि मां के बारे में एक और प्रसंग बहुत मशहूर है। ऐसा बताया जाता है कि अपने शरीर छोड़ने से पहले बाबा ने उनके लिए एक बहुत बड़ी बात कही थी कि जहां भी वह रहेंगी, वहीं मंगल हो जाएगा। भक्त इसी बात को उनके प्रति बाबा के असीम स्नेह का प्रमाण मानते हैं। अपनी जीवनशैली में सिद्धि मां हर हफ्ते विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन कैंची धाम आने वाले भक्तों से मुलाकात करती थीं। उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और लोगों का मानना था कि मां के आशीर्वाद मात्र से उनके सारे संकट टल जाते थे।

महाप्रयाण और कैंची धाम में उनकी स्मृतियां

28 दिसंबर 2017 को लगभग 92 वर्ष की आयु में नैनीताल के मल्लीताल स्थित आवास पर सिद्धि मां ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के बाद कैंची धाम परिसर में उनकी एक सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई और उनके लिए एक अलग पूजा कक्ष भी तैयार किया गया। हर साल 28 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि पर एक बड़े भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त हिस्सा लेते हैं। कैंची धाम की पहचान सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां की गुरु-शिष्य परंपरा इस जगह को और खास बनाती है, जिसमें सिद्धि मां का अध्याय हमेशा अमर रहेगा।

सवाल-जवाब

सिद्धि मां कौन थीं?
सिद्धि मां को नीम करौली बाबा की परम शिष्या माना जाता है, जिन्हें भक्त प्रेम से श्री मां या सिद्धि माई कहते थे।
सिद्धि मां का जन्म कहां हुआ था?
सिद्धि मां का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा में हुआ था और वह सात बहनों में से एक थीं।
सिद्धि मां के पति का क्या नाम था?
उनके पति का नाम तुलाराम साह था जो नैनीताल के निवासी और नीम करौली बाबा के भक्त थे।
नीम करौली बाबा सिद्धि मां को किस नाम से पुकारते थे?
भक्तों की मान्यताओं के अनुसार, बाबा उन्हें कात्यायनी देवी कहकर संबोधित करते थे।
सिद्धि मां का महाप्रयाण कब हुआ था?
28 दिसंबर 2017 को लगभग 92 वर्ष की आयु में नैनीताल के मल्लीताल स्थित आवास पर उनका महाप्रयाण हुआ था।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·38 मिनट पहले

यह आलेख नीम करौली बाबा और सिद्धि मां के आध्यात्मिक सफर को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करता है। हालांकि, पत्रकार और जांच के दृष्टिकोण से, ऐसे ऐतिहासिक और आस्था से जुड़े मामलों में मौखिक परंपराओं के साथ-साथ संस्थागत दस्तावेजों और पुख्ता अभिलेखों का होना भी आवश्यक है, ताकि कैंची धाम की संपत्ति, प्रबंध व्यवस्था और उसकी कानूनी स्थिति पारदर्शी बनी रहे। भविष्य में इस विरासत के कानूनी और प्रशासनिक संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·37 मिनट पहले

यह आलेख आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, लेकिन एक वरिष्ठ संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि उत्तराखंड के इन पहाड़ी क्षेत्रों में धार्मिक ट्रस्टों, परिसंपत्तियों और भूमि प्रबंधन से जुड़े प्रशासनिक पहलुओं पर भी गहरी नजर रखनी होगी। जब इस प्रकार के बड़े आध्यात्मिक केंद्र असीम श्रद्धा के साथ चलते हैं, तो उनके सुचारू संचालन, स्थानीय प्रशासन के समन्वय और भविष्य की कानूनी व्यवस्थाओं को लेकर एक पारदर्शी तंत्र की आवश्यकता होती है, जिससे तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों के हितों का संतुलन बना रहे।

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