देवभूमि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में आस्था और लोकपरंपराओं के कई ऐसे केंद्र हैं, जिनकी रीति-रिवाज सदियों से समाज को बांधे हुए हैं। कुमाऊं मंडल के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की सुरम्य वादियों में स्थित मां कोटगाड़ी देवी का मंदिर ऐसा ही एक अनूठा धार्मिक स्थल है। स्थानीय समाज में इस पावन धाम को मां कोकिला देवी के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पुकारा जाता है। आम देवालयों में जहां लोग सुख, समृद्धि और पारिवारिक मंगलकामना की प्रार्थना लेकर पहुंचते हैं, वहीं इस मंदिर की पहचान न्याय की अलौकिक अदालत के रूप में है। जब लोगों को सांसारिक व्यवस्थाओं, प्रशासनिक तंत्र या अदालतों से राहत नहीं मिलती, तब वे अपनी अंतिम गुहार लेकर मां कोटगाड़ी की चौखट पर माथा टेकते हैं। यहां आने वाले पीड़ित कानूनी फैसलों की प्रतियों और स्टांप पेपर पर लिखी अर्जियों के माध्यम से अपनी फरियाद देवी के चरणों में समर्पित करते हैं।
न्याय की देवी के रूप में स्थापित अटूट लोकमान्यता
कुमाऊं की लोकसंस्कृति में देवी कोटगाड़ी को सर्वोच्च न्यायदात्री माना गया है। समाज में यह गहरा विश्वास रचा-बसा है कि देवी के दरबार में कभी किसी के साथ छल या पक्षपात नहीं हो सकता। स्थानीय जनमानस में इस बात की प्रबल मान्यता है कि यदि किसी परिवार या व्यक्ति के साथ पांच पीढ़ी पूर्व भी कोई गंभीर अन्याय हुआ हो, तो उसकी फरियाद भी यहां सुनी जाती है। जब पारिवारिक विवाद, भूमि से जुड़े झगड़े या सामाजिक अत्याचार आम कानूनी प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाते हैं, तब लोग मंदिर परिसर में लिखित दस्तावेज जमा करते हैं। श्रद्धालु बाकायदा स्टांप पेपर पर पूरे घटनाक्रम का ब्योरा लिखते हैं और साथ में न्यायालय के आदेशों की प्रतियां संलग्न कर देवी से निष्पक्ष फैसले की प्रार्थना करते हैं। लोगों का मानना है कि देवी की अलौकिक शक्ति सत्य और असत्य का निर्णय कर पीड़ितों को मानसिक शांति और न्याय प्रदान करती है।
इतिहास की पुस्तकों में दर्ज है मंदिर की परंपरा
मां कोटगाड़ी देवी धाम की यह विलक्षण न्याय परंपरा केवल मौखिक लोककथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक शोध ग्रंथों में भी इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। विख्यात इतिहासकार प्रो. अजय रावत ने अपनी चर्चित पुस्तक उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास में इस धाम की परंपराओं और सामाजिक प्रभाव का गहराई से वर्णन किया है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. डी.डी. शर्मा के शोध और निष्कर्षों का भी उल्लेख किया है। ऐतिहासिक विश्लेषण में इस मंदिर में न्याय मांगने की परंपरा की तुलना कुमाऊं के ही अल्मोड़ा स्थित चितई और नैनीताल जिले के घोड़ाखाल में स्थित गोलू देवता के मंदिरों से की गई है। जिस प्रकार गोलू देवता को न्याय का देवता मानकर लोग चिट्ठियों के जरिए अपनी विपदा बताते हैं, ठीक उसी तरह मां कोटगाड़ी के दरबार में लिखित अर्जियां प्रस्तुत करने की सदियों पुरानी परिपाटी चली आ रही है।
स्वप्न आदेश और कोटगाड़ा समाज से जुड़ी स्थापना कथा
मंदिर की ऐतिहासिक स्थापना को लेकर क्षेत्र में एक अत्यंत रोचक लोककथा प्रचलित है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और लोकश्रुतियों के अनुसार, बहुत समय पहले कोटगाड़ा जाति के एक व्यक्ति को स्वप्न में साक्षात देवी के दर्शन हुए थे। उस दिव्य स्वप्न में देवी ने उस स्थान विशेष पर अपनी स्थापना और पूजन की इच्छा व्यक्त की थी। देवी के उस आदेश और प्रेरणा के बाद वहां विधिवत मंदिर का निर्माण कराया गया और पूजा-अर्चना की शुरुआत हुई। कोटगाड़ा समुदाय से जुड़े इस दैवीय संकेत के कारण ही कालांतर में इस पवित्र स्थल का नाम कोटगाड़ी देवी धाम के रूप में विख्यात हुआ। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती यह कथा आज भी श्रद्धालुओं के मन में इस तीर्थ के प्रति गहरी श्रद्धा का संचार करती है।
पिथौरागढ़ से पांखू तक का दुर्गम पहाड़ी मार्ग
यह प्रसिद्ध धाम पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए यात्रियों को पहले पिथौरागढ़ से थल होते हुए पांखू गांव तक का सफर तय करना पड़ता है। पांखू पहुंचने के पश्चात मुख्य सड़क मार्ग समाप्त हो जाता है और श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर तक पहुंचने के लिए लगभग दो किलोमीटर का पैदल मार्ग तय करना होता है। चारों तरफ से प्राकृतिक सौंदर्य, बांज और बुरांश के जंगलों से घिरा यह रास्ता श्रद्धालुओं को शांति का अनुभव कराता है। दुर्गम भौगोलिक स्थिति के बावजूद साल भर उत्तराखंड सहित देश के कोने-कोने से भक्त मां के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।
नवरात्र की अष्टमी और प्रमुख पर्वों पर विशेष लोकोत्सव
मां कोटगाड़ी मंदिर में वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते रहते हैं, लेकिन नवरात्र की अवधि में यहां का वातावरण अत्यंत भक्तिमय हो जाता है। चैत्र और आश्विन दोनों ही नवरात्र के दौरान अष्टमी तिथि पर यहां एक विशाल लोकोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। इसके अतिरिक्त भाद्रपद मास की ऋषि पंचमी, कार्तिक मास की पंचमी, कार्तिक पूर्णिमा तथा बैसाखी के पावन पर्व पर भी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना संपन्न होती है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर, जिसे स्थानीय परंपरा में त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान भी कहा जाता है, दूर-दराज से आए भक्त विशेष धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। यह पावन धाम आज भी हिमालयी समाज में सत्य, नीति और लोकविश्वास का सबसे मजबूत संबल बना हुआ है।

















